Sunday, November 02, 2014

ए चाँद मेरे मुझे मिला भी तो वहीं जाते - जाते...

तुझे देख मैं निकल पड़ी अपने रास्ते
जिधर ले जाता चले वहीं हम आते 
कभी पेड़ों के पीछे तो कभी बादल आ जाते
ढूंडती हुई निकल पड़ी सवारी जाते-जाते
देखा मेरी ज़िंदगी "रेडियो ज़िंदगी" के आते-आते
मुझे मिला मेरा साजन  ज़िंदगी के रास्ते
ए चाँद मेरे मुझे मिला भी तो वहीं जाते - जाते
जहां शाम ज़िंदगी की करने निकले थे समा सजाते 
~ फ़िज़ा 

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उसके जाने का ग़म गहरा है

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