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कमरों से कमरों का सफर

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सेहर से शाम शाम से सेहर तक  ज़िन्दगी मानों एक बंद कमरे तक  कभी किवाड़ खोलकर झांकने तक  तो कभी शुष्क हवा साँसों में भरने तक  ज़िन्दगी मानों अपनी सीमा के सीमा तक  बहुत त्याग मांगती  रहती हैं जब तक  है क्या इस ज़िन्दगी का लक्ष्य अब तक  इसके मोल भी चुकाएं हो साथ जब तक  ये जीना भी कोई जीना सार्थक कब तक  खिलने की आरज़ू बिखरने का डर कब तक  एहसासों की लड़ियों में उलझा सा मन कब तक  आखिर नियति का ये खेल कोई खेले कब तक? तोड़ बेड़ियों को सीखा स्वतंत्र जीना अब तक  इस नये मोड़ के ज़ंजीरों में जकड कर कब तक  यूँहीं आखिर कमरों से कमरों का सफर कब तक? ~ फ़िज़ा  #हिंदीदिवस #१४सितम्बर१९४९   

रास्ते के दो किनारे

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  रास्ते के दो किनारे संग चलते मिल न पाते मगर साथ रेहते   मैं इन दोनों के बीच चलती  भीड़ में रहकर तनहा सा लगे  किसी अनदेखे खूंटी से जैसे  अपने आपको बंधा सा पाती  छूटने की कोशिश कभी करती  फिर ख़याल आता किस से? बहुत लम्बा है ये सफर मेरा  कब ख़त्म होगा कहाँ मिलेगी  ये राहें कहीं मिलेंगी भी कभी? थकान सा हो चला है अब तो  किसी तरुवर की छाया में अब  विश्राम ही का हो कोई उपाय   निश्चिन्त होकर निद्रा का सेवन  यही लालसा रेहा गयी है मन में  तब तक चलना है अभी और  जाने कहाँ उस तरुवर का पता    जिसके साये में निवारण शयन का ! ~ फ़िज़ा 

आज़ादी की मुबारकबाद !

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स्वतंत्रता के ७३ वर्षों के बावजूद मन अशांत है  क्यों लगता है के पहले से भी अधिक बंधी हैं विचारों से मन-मस्तिष्क से अभिप्राय से बंधे हैं  जब लड़े थे आज़ादी के लिए एक जुट होकर  हर किसी के लिए चाहते थे मिले आज़ादी  उन्हें न सही उनकी आनेवाली नस्ल को सही  एक इंसानियत का जस्बा था जो हमें दे गयी  स्वंत्रता अंग्रेज़ों से उनके अत्याचारों से मुक्ति  मगर फिर आपस में ही लड़ते रहे आजीवन  स्वार्थ और खोखली राजनीती और गुंडागर्दी  कैसे कहें स्वंतंत्रादिवस की शुभकामनाएं जब  आज भी हम आधीन हैं ईर्षा और नफरत के  देश रह गया पीछे मगर सब हैं जीतने आगे  धीरे-धीरे आनेवाला कल भी भूल जायेगा  आज़ादी का संघर्ष और मूल्य शहीदों का  एक ख्वाब तब था और एक अब भी है  चाहे पाक हो या हिंदुस्तान दोनों को है  आज़ादी की मुबारकबाद ! ~ फ़िज़ा 

सेहर होने का वादा...!

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शाम जो ढलते हुए ग़म की चादर ओढ़ती है  वहीं सेहर होने का वादा भी वोही करती है  आज ये दिन कई करीबियों को ले डूबा है  दुःख हुआ बहुत गुज़रते वक़्त का एहसास है  दिन अच्छा गुज़रे या बुरा साँझ सब ले जाती है  ख़ुशी-ग़म साथ हों हमेशा ये भी ज़रूरी नहीं है  सेहर क्या लाये कल नया जैसे आज हुआ है  एक पल दुआ तो अगले पल श्रद्धांजलि दी है  इस शाम के ढलते दुःख के एहसास ढलते हैं  राहत को विदा कर 'फ़िज़ा' दिल में संजोती हैं  ~ फ़िज़ा 

उम्मीदों से भरा...

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महीना अगस्त का मानों उम्मीदों से भरा  शिकस्त चाहे उस या फिर इस पार ज़रा   वैसे भी कलियों के आने से खुश है गुलदान  फूल खिले न न खिले उम्मीद रहती है बनी  हादसे कई हो जाते हैं फिर भी आँधिंयों से  लड़कर भी वृक्ष नहीं हटते अपनी जड़ों से  कली को देख उम्मीद तो है गुलाब का रंग  खिलकर बदल जाए तो क्या उम्मीद तो है  कम से कम ! ~ फ़िज़ा 

क्यों जुड़ जाते हैं हम ...!

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कोरोना के दिन हैं और उस पर आज शुक्रवार की शाम, इरफ़ान खान की फिल्म "क़रीब क़रीब सिंगल" देखी, जो फिल्म पहली बार में हंसी-मज़ाक ले आयी थी वही दोबारा देखने पर हंसी तो ले आयी मगर दो आंसूं भी.. ! इस ग़म को भगाने के लिए दिल बेचारा - सुशांत सींग राजपूत की फिल्म भी देख ली ! अलविदा बहुत ही मुश्किल होता है, मगर लिखना आसान !!!! ये कविता उन सभी के नाम जो अपनों को खोकर अलविदा नहीं कह पाते !!! क्यों जुड़ जाते हैं हम  जाने-अनजाने लोगों से  न कोई रिश्ता न दोस्ती  फिर भी घर कर लेते हैं  दिल में जैसे कोई अपने  ख़ुशी देते हैं जैसे सपने  चंद फिल्में ही देखीं थीं  बस दिल से अपना लिया  कहानी को सच समझ कर  उनके साथ हंस-रो लिया  हकीकत की ज़िन्दगी सब  अलग अपनी-अपनी होती हैं  आज उनकी फिल्मों को देख  उनके अपनों को सोच कर  उनकी ज़िन्दगी के खालीपन  और उनके बीते गुज़रे कल  की यादों में रहकर जीने वाले  सोचकर बहुत रो दिए! ~  फ़िज़ा 

करें मुस्तकबिल बगावत का ...!

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चलती तो हूँ मैं सीना तानकर  मगर दिल में अब भी है वो डर  कहीं खानी न पड़ जाए ठोकर  दर ब दर ! क्यों न इस पल के हम हो जाएं  शुक्रगुज़ार, जी लें उस पल को  क्यों ख्वामखा करती है परेशान  किसी अनहोनी का ! न तो जी भर के खुश भी हो सकें  न ही ग़मगीन हों उस बात की जो  अभी हुआ नहीं हैं बस फिर भी  लगा रहता है डर ! आँखों के सामने अनीति नज़र आती है  सर पे है हाथ किसी का जो करे मनमानी  सोचते रेह जाते हैं क्या सिर्फ देखें ये सब  या करें मुस्तकबिल बगावत का ! ~ फ़िज़ा