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मुस्कुराते रहो तुम यूँ ही जीवन भर !

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  कभी हाथों में समा जाते थे तुम नन्हे से हर रास्ते, आज गोद में भी न समाओ — बड़े हो गए हर रास्ते। माँ का दिल तब भी धड़कता था फ़िक्र के साये में, कहीं भूल न हो जाए मुझसे इस डर में हर रास्ते। मुत्तासी हँसकर कहती थी मेरी चिंता सुनकर, “बच्चे एक से ही होते हैं दुनिया में हर रास्ते।” सबसे छोटे थे तुम घर के प्यारे आँगन में, लाड़-प्यार भी बरसा तुम पर खुलकर हर रास्ते। पर तुमने कभी उस स्नेह का अभिमान न किया, सादगी ही रही तुम्हारे स्वभाव में हर रास्ते। खुश रहो सदा, किसी को दुःख न देना जीवन में, इंसानियत का हाथ बढ़ाना तुम भी हर रास्ते। 'फ़िज़ा' की दुआ है माँ के दिल की गहराइयों से, मुस्कुराते रहो तुम यूँ ही जीवन भर हर रास्ते। ~ फ़िज़ा 

अदा है उसकी ..!

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  ज़िन्दगी है या ज़िंदादिली — अदा है उसकी, दोस्ती है या दोस्ताना — वफ़ा है उसकी। मुस्कराहट से जगमग करता हर एक चेहरा, नवदीप सी रोशन हर दिशा है उसकी। न केवल परिवार को प्रेम से जोड़े, दोस्तों में भी अलग ही जगह है उसकी। आओ आज नवी को दिल से हम मनाएँ, जन्मदिन की घड़ी को यादगार बनाएँ। दुआओं से भर दें हम उसकी ज़िंदगानी, खुशियों के फूल हर राह में सजाएँ। ~ फ़िज़ा 

सीमा !!

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 हर चीज़ की एक सीमा होती है— अच्छाई की भी, बुराई की भी, ख़ूबसूरती और बदसूरती की भी। सुनने की, देखने की, सहने की भी एक हद होती है। हर इंसान के भीतर एक ख़ामोश रेखा खिंची होती है। किसी को हक़ नहीं कि वह शब्दों से ज़ख़्म दे, सलाह के नाम पर चोट करे, या ऊँची आवाज़ को ताक़त समझे। कहते हैं न— ज़्यादा मिठास भी कभी-कभी कड़वी हो जाती है। सभ्य होने का मतलब यह नहीं कि कोई आपको शासित करे। नर्मी भी एक शक्ति है। और कभी-कभी— चले जाना, छोड़ देना, सबसे बड़ा साहस होता है। ~ फ़िज़ा 

अब और नहीं

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ज़िंदगी तानाशाही से — नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! सत्ता की भूख में, लालच की आग में— इंसानियत जले तो हुकूमत नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! जब रक्षक ही गोली चलाएँ, तो बताओ— जनता किसके हवाले जाए? नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! पहले रंग के नाम पर— दम! अब नागरिकता के नाम पर— दम! कितना ख़ून बहेगा और? कितना और सहेंगे हम? बस अब नहीं चलेगी! पलटो तख़्त— अभी! पलटो तख़्त— अभी! नहीं चलेगी तानाशाही! नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! ~ फ़िज़ा