ऐसा था कभी अपने थे सभी, हसींन लम्हें खुशियों का जहाँ !
राह में मिलीं कुछ तारिखियाँ, पलकों में नमीं आँखों में धुआँ !!
एक आस बंधी हैं, दिल को है यकीन एक रोज़ तो होगी
सेहर यहाँ !
कुछ ख्वाब देखे रखे सिरहाने कुछ दिनों बाद फिर लगे लरजने कुछ-कुछ है याद रूमानी बातें वो सुलझी हुई लटें और बिखरे बादल वो पानी का बरसना ठंड से सिमटना साँसों की गर्मी और फिर रूमानी हो जाना कैसे धुंधले हैं यादें जो कभी रखे थे सिरहाने लगे कुछ गिले जुल्फों के तले आज याद आये वो पल भी गुदगुदाने के बहाने कुछ नज़रें मिलीं कुछ यादें संजोए फिर निकल पड़ी लहरों को सजाने मतवाले चंचल बेज़ुबान दिल ~ फ़िज़ा
ये कविता मैंने तब लिखी थी जब लेबन्न में लडाई छिङ गई थी । जहॉ बच्चों की लाशें गिर रही थीं...और इस तरफ एक मासूम बच्चा अपने पापा की ऊँगलियाँ पकड कर पारकींग लॉट पर चला जा रहा था.... ज़िंदगी तुझ से कोई शिकायत नहीं क्योंकि, तुने वो सब दिया जो कभी मैंने माँगा नहीं और जो कभी मैंने चाहा भी नहीं कितना इंसाफ है तेरी जूस्तज़ू में जो कभी अपना तो क्या पराया भी नहीं जताता मैं सोच में रेहती हूँ ज़िंदगी तू मेरा अपना है या पराया? तू तो हवा का झोंका है जो कभी ठंडी हवा से दिल मचला दे तो कभी तूफान बनकर खडा हो जाऐ। ज़िंदगी तेरे तो खेल निराले हैं तुझे मैं क्या कहूँ - आ देखें तेरी अगली चाल क्या है ।?। ~फ़िज़ा
खूबसूरत हवाओं से कोई कह दो यूँ भी न हमें चूमों के शर्मसार हों माना के चहक रहे हैं वादियों में ये कसूर किसका है न पूछो अब बहारों की शरारत और नज़ाकत कैसे फिर फ़िज़ा न हो बेकाबू अब सजने-संवरने के लाख ढूंढे बहाने दिल की मर्ज़ी कब सुने किसी की आखिर हुस्नवालों बता भी दो वजह फूलों के मुस्कान पे फ़िज़ा डोरे न डालो ~ फ़िज़ा
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