Monday, April 09, 2018

काश! लौट आता वो मधुर जीवन !



गगन में खुली आसमान में
पंछियों को उड़ते देखा जब
मधुर बचपन याद आया तब
परिंदों से कभी सीखा था मैंने
नील गगन में उड़ते-फिरते
एक डाल से दूसरे डाल पर
पकड़म-पकड़ाई खेलना और
पास आते ही फुर्र हो जाना
बातों से कुछ और याद आया
पेड़ों पर चढ़कर काली-डंडा
बंदरों की तरह झलांग लगाना
कितने ही विस्मर्णीय थे दिन
शामों को जब घर-आँगन में
दिया जलाते पीछे से बुलावा आये
हाथ-मुंह धोकर हाथ जोड़ लो
सद्बुद्धि के लिए दुआ कर लो
कितने मासूम थे वो पलछिन
आज परिंदों को देख याद आया
काश! लौट आता वो मधुर जीवन !
~ फ़िज़ा
#happypoetrymonth

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