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कली ने लिया था नूर

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  नाज़ों से जो लाए थे हम एक गमला-ए-हयात, वक़्त ने सिखाया कि सब्र ही असली ज़ात। पत्तों में भी छुपा होता है इक राज़-ए-रहमत, हर ख़ामोशी में होती है ख़ुदा की कोई बात। माली बनकर करते रहे हम ख़िदमत-ए-इश्क़, पानी भी, दुआ भी दी—बस वही थी हमारी सौग़ात। जब दिल ने छोड़ दी थी हर उम्मीद-ए-बहार, तब रब ने चुपके से दिखलाई अपनी करामात। बैंगनी फूलों में जो कली ने लिया था नूर, ‘फ़िज़ा’ समझ आई—सब्र में ही है उसकी मुलाक़ात। फ़िज़ा 

कली का जीवन भुला नहीं ...!

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था कली के रूप में मैं भी  फूल बनने से पहले ही  छू लिया था किसी ने  तोड़ मगर नहीं सका मुझे  सोच मगर थी कली जैसी  सो हुआ नहीं मेरा फूल  फूल बनकर जब आयी मैं  कली का जीवन भुला नहीं  लोग देखें फूल को मगर  फूल को देखा किसी ने नहीं  था कली के रूप में मैं भी  अक्स न देख पाया कोई भी  खुशबु थी बस मुस्कान जैसी  खुशबु मगर ली किसी ने नहीं  था कली के रूप में मैं भी  फूल बनने से पहले ही  छू लिया था किसी ने  तोड़ मगर नहीं सका मुझे ! ~ फ़िज़ा 

मंडराते भँवरे ने कहा कुछ ...!

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झूमते फूंलों की डालियों पर मंडराते भँवरे ने कहा कुछ जाने क्या सुना कलियों ने मुँह छिपकर हँसने लगीं फूलों को शर्माते देख माली डंडी लेकर भागा भँवरे ने भी कसर नहीं छोड़ी लगा मंडराने माली के कानों में वही गीत जिसे सुनकर फूल शर्मायी कहाँ कोई रोक सका है दीवानों को जहाँ प्यार है वहां मस्तियाँ भी हैं बगीया में कुछ इसी तरह का जश्न फूलों के बीच चल रहा है ! ~ फ़िज़ा  #happypoetrymonth

उसने फूल भेजे थे पिछले इतवार

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उसने फूल भेजे थे पिछले इतवार  मैंने सोचा चलो नयी है शुरुवात  हर पल यही दुआ रही रहे साथ  न हो खट -पट न हो बुरी बात  जैसे गुज़रा दिन डर भी रहा साथ  सोमवार से शुक्र तक गुज़री ये रात  आया शनिवार बदला मौसम हुई बरसात  फिर आया इतवार तब समझी ये बात  पुष्पांजलि लेके आये थे देने मुझे इस बार  मैं ही पागल थी, समझी नहीं पुष्पांजलि है मेरी सौगात ! ~ फ़िज़ा