Posts

Showing posts with the label Zindagi

एक शाम—चाय की चुस्की और दोस्ती के नाम।

Image
  दोस्ती भी चाय की तलब-सी है, जब लगे तो मिले बिना कहाँ रहती है। झटपट फोन घुमाया, मिलने का वक्त और जगह तय हो आई, फिर फोन रखने की देर थी बस— एक प्यारी-सी शाम चली आई। चाय की चुस्कियों में कुछ बातें घुलीं, कुछ हँसी की फुहारें खुलीं, कुछ पुरानी यादें फिर मुस्कुराईं, कुछ अनकही बातें दिल तक उतर आईं। न कोई खास वजह, न कोई बहाना, बस दोस्तों का साथ और चाय का प्याला, हर घूँट में अपनापन, हर पल में पुराना-सा अफसाना… कुछ रिश्ते ऐसे ही तो खास होते हैं, चाय की तरह— कम हों तो याद आते हैं, मिलें तो दिल भर जाते हैं। एक शाम—चाय की चुस्की और दोस्ती के नाम। ~ फ़िज़ा

जड़ों की पुकार

Image
  उम्र की सीढ़ियाँ चाहे जितनी ऊँची क्यों न हो जाएँ, मन का एक कोना हमेशा लौटना चाहता है— उस बचपन की ओर, जहाँ सपनों ने पहली बार आँखें खोली थीं। वही स्कूल, वही मिट्टी की सौंधी महक, वही आँगन, वही गलियाँ, जहाँ हमारे होने की पहली इबारत लिखी गई थी। जड़ें... कभी हमसे बिछड़ती नहीं। नब्बे वर्ष की उम्र में पिताजी की बस एक ही चाह थी— एक बार फिर वेलियानकोड की धरती को छूना, मूक्कुथला के उस विद्यालय को देखना, जिसकी पाँच एकड़ ज़मीन मेरे पति के पकारावूर परिवार ने सिर्फ़ एक रुपये में सरकार को समर्पित कर दी थी। समय भी कैसे-कैसे रिश्ते बुनता है— मेरे पति के दादाजी मेरे पिताजी के गुरु थे, और वर्षों बाद उसी गुरु के पोते ने अपने शिष्य की बेटी का हाथ थाम लिया। जीवन सचमुच एक पूर्ण वृत्त है। गाँव की उन पगडंडियों से गुज़रते हुए पिताजी की स्मृतियाँ बोल उठीं— "हर रोज़ नदी नाव से पार करता था, फिर कई मील पैदल चलकर स्कूल पहुँचता था।" कार की खिड़की से उन रास्तों को देखते हुए मैंने महसूस किया— उस समय शिक्षा सिर्फ़ किताबों का नाम नहीं थी, वह पसीने, संघर्ष और अटूट हौसले का दूसरा नाम थी। विद्यालय का द्वार खुला, ...

अपने हिस्से का सूरज खोजते रहो।

Image
  सड़क यूँ ही चुपचाप चली, जैसे कोई सफ़र अधूरा हो, बादलों ने आसमान ओढ़ लिया, मानो दिल थोड़ा सा भरा हो। धूप कहीं बादलों में छुपकर, धीरे से झाँकना चाहती है, जैसे मुश्किलों के इस मौसम में, उम्मीद अभी भी मुस्काती है। पेड़ों की खामोश कतारें, वक़्त के संग झूम रही हैं, कुछ सूखी शाखें भी शायद, नई बहारें ढूँढ रही हैं। रास्ते खाली सही मगर, मंज़िलें फिर भी रहती हैं, हर धुंधली सी राह के आगे, रोशनियाँ भी बहती हैं। ये मौसम भी कहता जैसे— रुकना नहीं, बस चलते रहो, बादल चाहे जितने घने हों, अपने हिस्से का सूरज खोजते रहो। ~ फ़िज़ा

कप में सजी ये छोटी सी दुनिया

Image
  कप में सजी ये छोटी सी दुनिया, झाग में जैसे फूल खिला, हल्की-सी खुशबू कॉफी की, मन को चुपके से छू गई भला। संगमरमर की मेज़ पे रखी, ये प्याली कितनी प्यारी है, जैसे सुबह की पहली किरण, या माँ की मीठी फटकार सी न्यारी है। हर घूँट में है सुकून छुपा, जैसे घर की गर्माहट हो, थोड़ी-सी कड़वाहट भी इसमें, पर उसी में मिठास की आहट हो। पास रखी वो खाली कुर्सी, किसी अपने का इंतज़ार करे, या खुद से मिलने का मौका, कुछ पल दिल को उपहार करे। ये कॉफी नहीं, एक एहसास है, थोड़ा शहर, थोड़ा गाँव है, भागती दुनिया के बीचों-बीच, ये पल ही तो असली ठहराव है। ~ फ़िज़ा

ज़िन्दगी तेरे खेल भी निराले हैं

Image
  ज़िन्दगी भी क्या ज़िन्दगी है, ये कैसा इसका फ़साना है, हर मोड़ पर संग भी देती, फिर तन्हाई का ठिकाना है। दिल को हर किसी से जोड़ दे, ऐसी इसकी रवानी है, पास लाकर फिर सिखाती, दूरी ही असली कहानी है। जीना ही नहीं, जीने की चाह में हमें लालची बना देती, आदत पड़ते ही फिर ये, सबसे गहरी सीख सुना देती है। “अपनी राह खुद ही चुनो, औरों से थोड़ा जुदा रहो,” अकेले आए थे तुम यहाँ, अकेले ही मुस्कुरा के बहो। ये जीवन का खेल निराला, सबके अपने-अपने नियम हैं, यहाँ कोई किसी का सहारा नहीं, बस चलते अपने कदम हैं। उम्मीदों का बोझ न रखना, दिल को हल्का ही रहने दो, सुने कोई तो ठीक, न सुने—तो भी ख़ामोश ही रहने दो। न समझाने में उम्र गँवाओ, न किसी को मनाने में, ज़िन्दगी के रंग निराले हैं, बस खुद को पहचानने में। ज़िन्दगी तेरे खेल भी निराले हैं, हर मोड़ नया अफ़साना है, हर मोड़ पर संग भी देती, फिर तन्हाई का ठिकाना है। ~ फ़िज़ा 

ज़िन्दगी का ऐलान है।

Image
  ज़िन्दगी भी क्या ज़ोरदार है, हर साँस का यहाँ क़रार है, जीने के लिए हर पल मेहनत, यही इसका असली सार है। इंसान हो या कोई जीव, सबका एक ही व्यवहार है, हर साँस के पीछे छुपा, खुद की कोशिशों का आधार है। यहाँ हर किसी को अपना बोझ, खुद ही उठाना पड़ता है, इस सफ़र में हर राही को, खुद ही बनना हमसफ़र है। ज़िन्दगी किसी को नहीं बख़्शे, ये कैसा उसका व्यवहार है, हर किसी को देना पड़ता, साँसों का भी जैसे किरदार है। मेहनत की धूप में जलकर ही, मिलता सुकून का उपहार है, ये जीवन एक इम्तिहान है, और जीना ही इसका स्वीकार है। मैं भी इस राह का मुसाफ़िर, करता हर दिन संघर्ष अपार है, जीना है तो जीना होगा, यही ज़िन्दगी का ऐलान है। ~ फ़िज़ा 

अच्छा लगता है।

Image
  अपने संग रहना, अपने संग वक़्त बिताना अच्छा लगता है, ख़ुद से बातें करना, ख़ुद को समझाना अच्छा लगता है। जगह नई हो या पुरानी, अनजानों का भी साथ कभी, भीड़ में खोकर भी दिल को बहलाना अच्छा लगता है। चारों ओर नफ़रत, द्वेष की आग भले ही फैली हो, दिल में थोड़ी सी मोहब्बत बचाना अच्छा लगता है। सिर्फ़ बेजान पुतलों में ढूँढें जब लोग दोस्ती, ऐसे रिश्तों से दूरी बनाना अच्छा लगता है। कैसा वक़्त ये आ पहुँचा है दुनिया के आँगन में, सच को कह देना भी अब तो सताना अच्छा लगता है। खुशहाली, साफ़दिल और प्यार अगर हो दरमियाँ, एक-दूजे के लिए दिल से निभाना अच्छा लगता है। ‘फ़िज़ा’ जाने क्यों आजकल इंसानों से ज़्यादा, ख़ामोश पुतलों का साथ निभाना अच्छा लगता है। ~ फ़िज़ा

पाँच बजे का इंतज़ार

Image
  रास्तों की गलियों की आवाज़ें जगाकर रखती हैं पहरेदार, जब घर में सब चले जाते हैं अपने काम और अपने विचार। उनके आने का इंतज़ार बेसब्री से रहता है हमेशा, आते-जाते, और कुत्ते भी नज़र आते हैं, जो मेरी राह में चिड़ा कर जाते हैं। मगर मैं भी तो इंतज़ार करती हूँ  अपने समय का, अपने पल का। शाम होती है, पाँच बजे… मुझे भी लीश डाल कर ले जाते हैं घूमने, हवा में सांस लेने। कब बजेंगे पाँच के घंटे? कब आएंगे मुझे घुमाने वाले? ये सवाल हर दिन के साथ मेरे दिल में गूँजते रहते हैं। ~ फ़िज़ा

ये इश्क़ चाँद से

Image
  ज़िंदगी की चाह ने कुछ ऐसा कर दिया है, चाँद को बचपन से ही अपना हमसफ़र बना लिया है। किसी की दोस्ती का हो या न हो एहसास, चाँद के  मोहब्बत ने रूह तक छू लिया है। बचपन बीता, जवानी आई, बढ़ती रही ये लगन, हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा उसे दिल में बसा लिया है। आज वो आधा सा क्यों नज़र आता है मुझे, लगता है उसका आधा दिल मैंने ही ले लिया है। उम्मीद है एक दिन वो खुद चले आएगा यहाँ, जैसे मैं हर गली-नुक्कड़ उसका पीछा करती आई हूँ। ‘फ़िज़ा’ ये इश्क़ चाँद से यूँ ही नहीं हुआ, हर रात उसे देखकर दिल को समझा लिया है। ~ फ़िज़ा 

कली ने लिया था नूर

Image
  नाज़ों से जो लाए थे हम एक गमला-ए-हयात, वक़्त ने सिखाया कि सब्र ही असली ज़ात। पत्तों में भी छुपा होता है इक राज़-ए-रहमत, हर ख़ामोशी में होती है ख़ुदा की कोई बात। माली बनकर करते रहे हम ख़िदमत-ए-इश्क़, पानी भी, दुआ भी दी—बस वही थी हमारी सौग़ात। जब दिल ने छोड़ दी थी हर उम्मीद-ए-बहार, तब रब ने चुपके से दिखलाई अपनी करामात। बैंगनी फूलों में जो कली ने लिया था नूर, ‘फ़िज़ा’ समझ आई—सब्र में ही है उसकी मुलाक़ात। फ़िज़ा 

जीते रहो।

Image
  ज़िंदगी— कोई किताब नहीं जो एक बार पढ़ ली और सब समझ आ गया। हम सोचते थे— स्कूल, कॉलेज, डिग्री… बस, यहीं तक है सीखना। लेकिन— ज़िंदगी ने सिखाया, कि असली क्लासरूम तो हर दिन है। हर गिरना— एक लेसन। हर संभलना— एक जवाब। हम बड़े तो हो गए— पर समझदार? अभी भी बन रहे हैं। और हाँ— ये सफ़र रुकता नहीं… जब तक साँस है, सीखना जारी है। मंज़िल? शायद मौत। पर तब तक— सीखते रहो, जीते रहो। ~ फ़िज़ा 

मुस्कुराते रहो तुम यूँ ही जीवन भर !

Image
  कभी हाथों में समा जाते थे तुम नन्हे से हर रास्ते, आज गोद में भी न समाओ — बड़े हो गए हर रास्ते। माँ का दिल तब भी धड़कता था फ़िक्र के साये में, कहीं भूल न हो जाए मुझसे इस डर में हर रास्ते। मुत्तासी हँसकर कहती थी मेरी चिंता सुनकर, “बच्चे एक से ही होते हैं दुनिया में हर रास्ते।” सबसे छोटे थे तुम घर के प्यारे आँगन में, लाड़-प्यार भी बरसा तुम पर खुलकर हर रास्ते। पर तुमने कभी उस स्नेह का अभिमान न किया, सादगी ही रही तुम्हारे स्वभाव में हर रास्ते। खुश रहो सदा, किसी को दुःख न देना जीवन में, इंसानियत का हाथ बढ़ाना तुम भी हर रास्ते। 'फ़िज़ा' की दुआ है माँ के दिल की गहराइयों से, मुस्कुराते रहो तुम यूँ ही जीवन भर हर रास्ते। ~ फ़िज़ा 

अदा है उसकी ..!

Image
  ज़िन्दगी है या ज़िंदादिली — अदा है उसकी, दोस्ती है या दोस्ताना — वफ़ा है उसकी। मुस्कराहट से जगमग करता हर एक चेहरा, नवदीप सी रोशन हर दिशा है उसकी। न केवल परिवार को प्रेम से जोड़े, दोस्तों में भी अलग ही जगह है उसकी। आओ आज नवी को दिल से हम मनाएँ, जन्मदिन की घड़ी को यादगार बनाएँ। दुआओं से भर दें हम उसकी ज़िंदगानी, खुशियों के फूल हर राह में सजाएँ। ~ फ़िज़ा 

सीमा !!

Image
 हर चीज़ की एक सीमा होती है— अच्छाई की भी, बुराई की भी, ख़ूबसूरती और बदसूरती की भी। सुनने की, देखने की, सहने की भी एक हद होती है। हर इंसान के भीतर एक ख़ामोश रेखा खिंची होती है। किसी को हक़ नहीं कि वह शब्दों से ज़ख़्म दे, सलाह के नाम पर चोट करे, या ऊँची आवाज़ को ताक़त समझे। कहते हैं न— ज़्यादा मिठास भी कभी-कभी कड़वी हो जाती है। सभ्य होने का मतलब यह नहीं कि कोई आपको शासित करे। नर्मी भी एक शक्ति है। और कभी-कभी— चले जाना, छोड़ देना, सबसे बड़ा साहस होता है। ~ फ़िज़ा 

अब और नहीं

Image
ज़िंदगी तानाशाही से — नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! सत्ता की भूख में, लालच की आग में— इंसानियत जले तो हुकूमत नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! जब रक्षक ही गोली चलाएँ, तो बताओ— जनता किसके हवाले जाए? नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! पहले रंग के नाम पर— दम! अब नागरिकता के नाम पर— दम! कितना ख़ून बहेगा और? कितना और सहेंगे हम? बस अब नहीं चलेगी! पलटो तख़्त— अभी! पलटो तख़्त— अभी! नहीं चलेगी तानाशाही! नहीं चलेगी! नहीं चलेगी! ~ फ़िज़ा 

बरसाती एहसास

Image
 बारिश की बूंदों में अश्क़ उतर आते है दोस्तों के साथ से ग़म संवर जाते हैं ! आग दिल में जले तो नूर भी साथ लाती है, हद से बढ़े तो ख़ुद को ही राख़ कर जाती है। कभी लम्स बनकर बारिश रूह को छू जाए, कभी सैलाब बनकर हर वहम बहा ले जाए। ज़िंदगी की कश्ती मौजों के दरमियाँ चले, कभी सजदे में झुके, कभी खुद में संभले। बरसाती छाते सी हालत, उलट-पुलट का सफ़र, फिर भी चलती रहती है साँसों की ये डगर। साल आते हैं, जाते हैं, वक़्त का क्या गिला, ज़िंदगी मुख़्तसर सही, इश्क़ से हो सिलसिला। सूरज पैग़ाम-ए-हयात दे, चाँद भी ‘फ़िज़ा’ नूर लुटाए, ज़िंदादिली में जो जी ले, वही मुकम्मल कहलाए। ~ फ़िज़ा 

हर ‘फ़िज़ा’ की पहचान अलग होती है

Image
  हँसता-खिलता एक बीज, पौधे का रूप धर लेता है, और उसी पौधे की गोद से, फिर एक नया बीज जन्म लेता है। बीज से पौधा, पौधे से फिर बीज— यही तो जीवनचक्र का शांत, अनवरत संगीत है। ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही पहेलियों से भरी है, हर मोड़ सरल नहीं होता, हर राह सीधी नहीं होती। पतझड़ भी आता है अपने समय पर, और कभी-कभी टहनियाँ वक़्त से पहले साथ छोड़ जाती हैं। कौन किसका है यहाँ, कौन किसका नहीं — एक ही जड़ से उगकर भी, हर ‘फ़िज़ा’ की पहचान अलग होती है। ~ फ़िज़ा 

क्या हम अंदर से ही मरचुके

Image
देखा तो नन्हे-नन्हे पैर  एक दूसरे पर लदे हुए  मासूम सुन्दर और कोमल से  एक तरफ देखा नन्हे पैर  मैदान में दौड़ते व  खेलते हुए  खिलखिलाते चिल्लाते हुए  बच्चे जो ख़ुशियाँ बिखेरते हैं  हमारा कल हमारे बाद भी रहेगा  वही कल आज लहूलुहान है  खून से रंगे लथपथ शरीर  बेज़ुबान लहुलुहान बेजान  हमारा कल हमीं से बर्बाद  क्या हम अंदर से ही मरचुके  आँखों से देखकर भी नहीं चुके  जानवर भी बच्चों का संरक्षण करते  इंसानियत का क़त्ल हो चला है  स्वार्थ ने जगड़ लिया है जहां  ज़िन्दगी फिर वो बच्चों की सही  नफरत और द्वेष में हम सब  यूँही ख़त्म हो जायेंगे हम  मुर्ख, अपने ही पैर मारे कुल्हाड़ी  मगर ज़िन्दगी? पीढ़ी दर पीढ़ी  क्या सीख हैं आनेवाले कल को  ख़त्म करो सभी को सत्ते के लिए  जब अपने पोते-पोती पूछेंगे तुमसे  क्या जवाब दोगे उनको क्या कहोगे? आँख के लिए आँख लोगे अंधे हो जाओगे !! ~ फ़िज़ा   

जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची !

Image
  तरसती हूँ बचपन की धरती । जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥ धर्म न था तब कोई बँटवारा । सबको मानें एक ही धारा ॥ दीवाली की मिठाई मिलती । ईद की सेवइयाँ भी खिलती ॥ तरसती हूँ बचपन की धरती । जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥ सुनने का था सबमें धैर्य । मन में न था छल कपट न वैर्य ॥ थाली एक, नज़रिया भिन्न । हँसी हटा देती सब क्षुब्ध मन ॥ तरसती हूँ बचपन की धरती । जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥ भाषाएँ अलग, पर मुस्कान । इशारों में मिलता सम्मान ॥ न भय किसी का, न दूरी थी । बस आदर ही आदर छायी थी ॥ तरसती हूँ बचपन की धरती । जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥ चोरी को मजबूरी कहते । करुणा से ही सारे हल लेते ॥ उषा-फ़रज़ाना संग खेल । मानवता का था जीवन मेल ॥ तरसती हूँ बचपन की धरती । जहाँ हँसी थी निर्मल, सच्ची ॥ ~ फ़िज़ा 

करना है आरंभ !

Image
ज़िन्दगी में कुछ हसीन पल  यूँही चले आते हैं बिखेरने   खुशियां ! कभी कुछ सोचकर नहीं  यूँही एक पल में लिया हुआ  फैसला ! वो वक़्त भी आ गया जब  सीखे हुए कला का करना है   प्रदर्शन ! कई भावनायें हैं मन में गुरु दक्षिणा  एवम गुरु के आशीर्वाद से करना है  आरंभ !  ~ फ़िज़ा