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हिंसा नहीं आवाज़ से विरोध करते हैं !

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सहने को तो लोग यूँ भी दर्द सहते हैं एक हद्द से ज्यादा हो तो काट देते हैं  इलाज़ भी देखिये कभी ऐसा होता है ! जुल्म का आलम देखिए कैसा होता है  सहते तो सब हैं मगर उसकी भी हद्द है  हिंसा नहीं आवाज़ से विरोध करते हैं ! जानें, शासन करने वाला भी इंसान हैं  शासन में लाने वाला भी इंसान ही है  देखिये,एकता में सत्ता पलटने की ताक़त है ! अनपढ़ शासक अन्धविश्वास जैसा है  सच को छुपाना और सब बहकावा है  पढ़े-लिखे बेहके दुःख इसी बात का है ! वक़्त आगया अब एकजुट हो जाना है  खुली आँख है मगर हकीकत दिखाना है  खाली करो सिंहासन जनता को जगाना है ! इंसान बनकर इंसान को शासन करना है  जब शासक ही शोषण करें तो डटना है  निडरता से आज़ादी का नारा लगाना है ! हम देखेंगे किसका पलड़ा अभी भारी है  क्रांति भी क्या इसी विरोध का चेहरा है  अब बहुत हुआ, शासन नए नस्ल की है  नयी सोच से सबका भला होना है ! ~ फ़िज़ा

क्यों न हम जानें प्यार की ज़ुबान

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मुझे छूह लेतीं हैं उसकी यादें  कुछ यूँ जिस तरह हवा में जल  मेहकाते हुए उन पलों की यादें  जैसे रेहतीं हैं खुशबु और फूल  हो न हों अजीब मिलन की यादें  के सिर्फ यादों से जी लें वो पल  मानों अब भी हैं साथ उनकी यादें  जैसे चाँद गगन में बीच में बादल  खुली आँख इन यादों से लेकिन  आँखों ने जो बस देखा वो दलदल  लगे मोर्चे हर तरफ खून-खलबल   मरने-मारने की धमकियों के बल  मन हुआ जाता है प्यार से दुर्बल जो जान से भी प्यारे साथी निर्बल  आज लगे उगलने नफरत फ़िज़ूल  क्यों न हम जानें प्यार की ज़ुबान  है सभी के लिए सहज और सरल  मिलजुल कर रहना था संस्कार कभी  आज वोही सीखने आये लेकर ढाल  धर्म-जाती का अंतर बताकर हाल  क्यों सीखते नहीं देखकर गुलाल  कई रंगों से भरे हैं न कोई मलाल  क्यों इंसान भेद करे अपनों के संग  मुझे छूह लेतीं हैं उसकी यादें  कुछ यूँ जिस तरह हवा में जल  मेहकाते हुए उन पलों की यादें  जैसे रेहतीं हैं खुशबु और फूल  ...