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हर ‘फ़िज़ा’ की पहचान अलग होती है

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  हँसता-खिलता एक बीज, पौधे का रूप धर लेता है, और उसी पौधे की गोद से, फिर एक नया बीज जन्म लेता है। बीज से पौधा, पौधे से फिर बीज— यही तो जीवनचक्र का शांत, अनवरत संगीत है। ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही पहेलियों से भरी है, हर मोड़ सरल नहीं होता, हर राह सीधी नहीं होती। पतझड़ भी आता है अपने समय पर, और कभी-कभी टहनियाँ वक़्त से पहले साथ छोड़ जाती हैं। कौन किसका है यहाँ, कौन किसका नहीं — एक ही जड़ से उगकर भी, हर ‘फ़िज़ा’ की पहचान अलग होती है। ~ फ़िज़ा 

बीज

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  बीज बनकर तू गिरा अब पेड़ बन गया धरा से तू ऊगा है धरा में ही जायेगा  जानकर भी हमेशा देता सभी को साया  आसमां की ऊंचाई भाती उस ओर गया  ऊंचाई तक जाकर तनों को नीचे ले गया  जिस थाली में खाया उसका ऋण चुकाया  इतना ही नहीं अनजानों को भी छाया दिया  एक तू ही है जो इंसान नहीं इंसानियत है  सीखा कर भी इंसान इंसान न बन पाया  ऐ वृक्ष तुझे प्रणाम तू मरकर भी काम आया   अर्थियों के लिए तो ठंड दूर करने के लिए  तू देता रहा हर पल हर दम तू जलता ही रहा ! ~ फ़िज़ा 

वृक्ष की कथा

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  वो पल जब किसी की भी  चाह नहीं  किसी का भी साथ  चाहिए नहीं  वक्त के गुज़रते लम्हों से  कोई वास्ता नहीं  किसीको किसी की भी  फ़िक्र नहीं  चलता है मुसाफिर मंज़िल  पता नहीं  भटकता फिरता है हर जगह  ठिकाना नहीं  अब बहुत देर तक चलते रहे  ख़त्म होता नहीं  थक गया है वृक्ष अब तो तनों में  पत्ते भी नहीं  ले देकर सिर्फ कुछ हड्डियां हैं  बाकि कुछ भी नहीं  मेरे बाद अब तो कोई मुझे  करेगा याद भी नहीं ! ~ फ़िज़ा 

अभी मैं कच्ची हूँ ...

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नीम की निबोरी ने कहा  अभी मैं कच्ची हूँ  खुशबु में सच्ची हूँ  थोड़ा दिन और दो मुझे  पक्की हो जाऊँगी   मीठी बन जाऊँगी  तब खा भी लोगे मुझे  तो नहीं पछताऊंगी  जाते-जाते कुछ  गुण दे जाऊँगी  अभी मैं कच्ची हूँ  खुशबु में सच्ची हूँ ! कड़वी मैं लगती हूँ  सुन्दर भी लगती हूँ  हरियाली है रंग मेरा  गुणवान है अंग मेरा  सभी को न भाऊँ मैं जानते हैं सब लाभ मेरा  रखें सब पास मुझे  या रहते हैं पास मेरे  अभी मैं कच्ची हूँ  खुशबु में सच्ची हूँ ! अभी मैं कच्ची हूँ  खुशबु में सच्ची हूँ ! ~ फ़िज़ा