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Showing posts from 2007

मेरे सपनों की बुनी एक किताब

तेरी आँखें क्‍यों उदास रेहती हैं?

हमें विरानों में रेहने की आदत पड गई

वक्‍त-वक्‍त की बात है

एक नया बीज़ बन के कोई अरमान