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एक शाम—चाय की चुस्की और दोस्ती के नाम।

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  दोस्ती भी चाय की तलब-सी है, जब लगे तो मिले बिना कहाँ रहती है। झटपट फोन घुमाया, मिलने का वक्त और जगह तय हो आई, फिर फोन रखने की देर थी बस— एक प्यारी-सी शाम चली आई। चाय की चुस्कियों में कुछ बातें घुलीं, कुछ हँसी की फुहारें खुलीं, कुछ पुरानी यादें फिर मुस्कुराईं, कुछ अनकही बातें दिल तक उतर आईं। न कोई खास वजह, न कोई बहाना, बस दोस्तों का साथ और चाय का प्याला, हर घूँट में अपनापन, हर पल में पुराना-सा अफसाना… कुछ रिश्ते ऐसे ही तो खास होते हैं, चाय की तरह— कम हों तो याद आते हैं, मिलें तो दिल भर जाते हैं। एक शाम—चाय की चुस्की और दोस्ती के नाम। ~ फ़िज़ा

जिंजर की अदा ..

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  मासूम सी आँखों में कितनी प्यारी शरारत है, जिंजर की हर अदा में बसती मेरी मोहब्बत है। कानों को यूँ खड़ा करके, जैसे कुछ कहना चाहती, खामोशी में भी उसकी अपनी मीठी इबारत है। छोटी-सी गेंदों संग बैठी, दुनिया से बेख़बर सी, उसकी सादगी में ही छुपी खुशियों की दौलत है। ना ताज चाहिए उसको, ना कोई बड़ी फरमाइश, बस थोड़ा प्यार मिल जाए—यही उसकी हुकूमत है। घर के हर कोने में उसकी मासूम चाल बसती, जिंजर नहीं, वो दिल की धड़कन, मेरी राहत है। ~ फ़िज़ा

अपने हिस्से का सूरज खोजते रहो।

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  सड़क यूँ ही चुपचाप चली, जैसे कोई सफ़र अधूरा हो, बादलों ने आसमान ओढ़ लिया, मानो दिल थोड़ा सा भरा हो। धूप कहीं बादलों में छुपकर, धीरे से झाँकना चाहती है, जैसे मुश्किलों के इस मौसम में, उम्मीद अभी भी मुस्काती है। पेड़ों की खामोश कतारें, वक़्त के संग झूम रही हैं, कुछ सूखी शाखें भी शायद, नई बहारें ढूँढ रही हैं। रास्ते खाली सही मगर, मंज़िलें फिर भी रहती हैं, हर धुंधली सी राह के आगे, रोशनियाँ भी बहती हैं। ये मौसम भी कहता जैसे— रुकना नहीं, बस चलते रहो, बादल चाहे जितने घने हों, अपने हिस्से का सूरज खोजते रहो। ~ फ़िज़ा

ये पकोड़ों की महफ़िल

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  कुरकुरी सी हर अदा में, स्वाद का ऐलान है, ये पकोड़ों की महफ़िल भी क्या ग़ज़ब मेहमान है। मसालों की चादरों में लिपटा हर इक जज़्बात है, हर निवाले में छुपा जैसे दिल का अरमान है। अदरक की वो खुशबुएँ, हरी धनिया का साथ भी, इस सुनहरी थाल में मौसम बड़ा जवान है। चाय की प्याली मिले तो बात कुछ और ही बने, वरना ये तन्हा मज़ा भी अपने आप में शान है। फ़िज़ा कहे—ये स्वाद भी छोटी खुशी का जश्न है, ज़िन्दगी की भागदौड़ में ये सुकूँ की दास्तान है। ~ फ़िज़ा 

ये केक नहीं

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  लाल मखमली सी परतों में, छुपी कोई मीठी दास्तान है, हर तह में जैसे प्यार सजा, हर कौर में छोटा अरमान है। सफेद क्रीम की नरम चादर, जैसे बादल धरती छू आए, थोड़ी शरारत, थोड़ी मिठास, दिल को बच्चे सा बहलाए। कटते ही खुलते राज कई, परतों में यादें मुस्काती हैं, कुछ मीठे लम्हे, कुछ हँसती बातें, हर टुकड़े में जगमगाती हैं। ये केक नहीं बस स्वाद भर, जश्नों की प्यारी पहचान है, ज़िन्दगी भी शायद ऐसी ही— थोड़ी परतदार, पर मेहरबान है। ~ फ़िज़ा

नन्हा सा माली...

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  नन्हा सा माली बना, मुस्कुराता ये जनाब है, हाथों में गुलाबी पानी, क्या प्यारा इसका ख़्वाब है। गमले की छोटी दुनिया में, हरियाली का इंतज़ाम है, खुद तो है खिलौना मगर, पौधों से बड़ा लगाव है। चेहरे पे मासूमियत, जैसे कोई भोला जवाब है, पानी कम हो या ज़्यादा—बस दिल से पूरा हिसाब है। पत्थरों के बीच भी इसने, हरा सा जहाँ बसाया है, लगता है इस छोटे दिल में, बाग़ों का पूरा किताब है। फ़िज़ा भी देख मुस्काए, ये कैसी मीठी आदत है, इतना छोटा माली फिर भी, बाग़बानी में नवाब है। ~ फ़िज़ा

मैंने अपनी एक दुनिया

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ये सच है, मैंने अपनी एक दुनिया बसा ली है, चाँद सितारों की छाँव में खुद को सजा ली है। जहाँ शोर-ए-जंग से दूर है मेरा ये छोटा सा जहाँ, प्रकृति के घेरे में मैंने अपनी जगह बना ली है। इधर दुनिया जल रही है नफरत की ललकार में, उधर मासूमियाँ खोतीं—ये कैसी अंधी गली है। किसी के पास सब कुछ है, फिर भी खालीपन सा, किसी के पास छत नहीं—बस ज़मीं ही बिछा ली है। कोई कार में रातें काटे, कोई आसमान तले, ये फ़ासलों की सच्चाई दिल में उतर चली है। क्या कहें, किससे कहें, कौन सुनेगा यहाँ, हर आवाज़ जैसे खामोशी में ही ढल चली है। तो मैंने भी अपनी एक खामोश दुनिया चुन ली, चाँद सितारों संग ही अब मेरी ये हमसफ़र बनी है। हम सब ढूँढते फिरते हैं कोई सुरक्षित सा कोना, और खुद के ही अंदर कहीं दुनिया समा ली है। ज़िन्दगी भी अजीब है—एक बुलबुला सा सफ़र, पल में बनती-बिखरती, यही उसकी असली कली है। ~ फ़िज़ा 

वो भी क्या शाम थी..

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  वो भी क्या शाम थी, दिल में अजीब सा गुमान था, मैं भी चल पड़ी थी, वो भी कहीं रवाना था। उस पार मुझसे दूर, पर किसी के पास जा रहा था, फ़ासलों में छुपा जैसे कोई अपना सा अफ़साना था। रूठा-सा, खामोश मगर, कदम बढ़ाता जा रहा था, लब चुप थे उसके, पर दिल में शोर पुराना था। मैं बस खड़ी सोचती रही, उस पल की गिरह में, क्यों जाना है उसे, जब लौट कर फिर आना था। शाम की उस धुंध में, कुछ सवाल रह गए यूँ ही, हर जुदाई में छुपा जैसे मिलने का बहाना था। ~ फ़िज़ा

महिला आरक्षण की लौ

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  संसद की दीवारों में गूँजी एक नई सी बात, बराबरी के शब्दों ने छेड़ी फिर से नई शुरुआत। महिला आरक्षण की लौ जली, उम्मीदों का आसमान, पर इसके साये में चलता रहा राजनीति का भी गान। वोटों की गिनती में भी, सपनों का हिसाब हुआ, कभी समर्थन, कभी विरोध—हर रंग का इज़हार हुआ। कागज़ पर लिखे अधिकार, दिल तक कब पहुँचेंगे, ये सवाल अब भी गलियों में धीमे-धीमे गूंजेंगे। नारी की शक्ति कोई नया अध्याय नहीं, वो तो हर दौर में रही—बस पहचान नई। ये बिल एक दरवाज़ा है, मंज़िल नहीं अभी, सफ़र लंबा है आगे, राहें आसान नहीं। सत्ता के गलियारों में चाहे कितनी भी चालें हों, हर आवाज़ के पीछे सच्चाई की मशालें हों। जब नीयत साफ़ होगी, तब बदलाव सच होगा, वरना हर वादा बस एक और शब्द होगा। फिर भी उम्मीदों की डोर थामे चलती नारी, हर संघर्ष में खुद को फिर से लिखती नारी। कानून से आगे बढ़कर जब सोच बदलेगी, तभी ये आज़ादी सच में हर घर तक पहुँचेगी। ~ फ़िज़ा

ओ चाँद

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  चाँद की ये आधी सी मुस्कान, जैसे कोई अधूरी सी जान। खामोशी में भी कितनी बातें, हर रात मुझे ये समझाए। काली रात की गोद में सिमटा, सफेद सा ये कोमल नूर, दूर होकर भी कितना अपना, जैसे दिल के सबसे पास हुज़ूर। तेरी ये आधी सी झलक ही, मेरे पूरे ख्वाब सजा जाती है, ओ चाँद, तू पूरा हो या आधा, मेरी दुनिया तो तुझसे ही जगमगाती है। तेरे दाग भी मुझे प्यारे हैं, तेरी खामोशी भी गीत लगे, तू बोले ना फिर भी हर पल, मुझसे अपनी प्रीत कहे। मैं भी तेरी तरह अधूरी, तू भी मुझ सा थोड़ा सा, शायद इसी अधूरेपन में ही, हमारा रिश्ता है पूरा सा। ~ फ़िज़ा 

ये मतवाला।

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  माइक हाथ में, अंदाज़ निराला, स्टेज पे आते ही छा गया ये मतवाला। बात शुरू करे तो हंसी रुकती नहीं, सीरियस दिखे, पर बातें होती सीधी नहीं। थोड़ा सोचकर, फिर पंचलाइन गिराते, लोग हंस-हंस कर आंसू तक बहाते। चेहरे पे सादगी, दिमाग में तूफ़ान, हर लाइन में छुपा होता मज़ेदार सामान। ये कोई आम इंसान नहीं जनाब, हंसी का चलता-फिरता इंतज़ाम है ये ख़ास। ~ फ़िज़ा 

गरम-गरम डोसे

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  गरम-गरम डोसे में लिपटी सी कहानी, छोटी-छोटी खुशियों की ये प्यारी निशानी। कुरकुरी सी परत में छुपा सुकून सा एहसास, हर निवाले में जैसे मिल जाए दिल को विश्वास। नारियल की चटनी सी सादगी भरी बात, सांभर की गर्माहट में अपनापन साथ। केले के पत्ते पर सजा ये सादा सा स्वाद, भीड़ भरी दुनिया में जैसे अपना सा संवाद। कुछ पल ठहर कर, बस यूँ ही मुस्कुरा लेना, हर छोटे लम्हे में भी ख़ुशी को पा लेना। ज़िन्दगी भी शायद ऐसी ही थाली है, सादा, रंगीन—और हर स्वाद में निराली है। ~ फ़िज़ा 

ये सुरों का वरदान है..

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  साड़ी की लहरों में सजी, सुरों का इक जहान है, हर थाप में धड़कता दिल, जैसे कोई अरमान है। हाथों की हर चोट में, एक लय का बयान है, ढोल की हर गूंज में, छुपा अपना पहचान है। मुस्कान में घुली हुई, रागों की मुस्कान है, हर सुर में बसता जैसे, जीवन का सम्मान है। ये सिर्फ़ ध्वनि नहीं, ये एक पुराना गान है, पीढ़ियों से बहता आया, ये सुरों का वरदान है। हर ताल में सजा हुआ, त्योहारों का सामान है, इस संगीत की धड़कन में, बसता पूरा जहान है। फ़िज़ा कहे इन सुरों में, उसका भी अरमान है, हर थाप में छुपा हुआ, दिल का एक बयान है। ~ फ़िज़ा 

विषु का उत्सव

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  सुनहरी सी ये डाल, जैसे विषु का पैगाम है, कोन्ना के फूलों में बसता केरल का हर अरमान है। सुबह की पहली किरण संग, जब ये आँगन में सजता है, हर घर के कण-कण में तब, खुशियों का ऐलान है। कणिक्कोन्ना की छांव तले, विषुक्कणि जब सजे सवेरा, हर पीली पंखुड़ी में छुपा, समृद्धि का सम्मान है। मंदिरों से आती धुन में, इन फूलों की महक घुली, हर थाली, हर आरती में, इनका ही गुणगान है। बचपन की यादों में भी, ये रंग यूँ ही बस जाते हैं, माँ के हाथों सजा वो दृश्य, आज भी दिल की जान है। ये फूल नहीं, ये परंपरा है, पीढ़ियों का अभिमान है, विषु के हर उत्सव में, कोन्ना का ही स्थान है। ~ फ़िज़ा

जन्मदिन मुबारक हो

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  मेरी प्यारी रिया, मेरी मुस्कान की वजह, तुम्हारे आने से ही तो रोशन हुई मेरी हर सुबह। तुम्हारी हँसी में बसता है मेरा सारा जहाँ, तुम्हारे हर ख्वाब में छुपा है मेरा अरमान। छोटी-सी उँगली थामे जब तुम चलना सीखी थी, आज वही बेटी मेरी, अपने पंखों से उड़ना सीखी है। हर साल के साथ तुम और भी खिलती जाओ, मेरी दुआ है—तुम्हारी ज़िन्दगी खुशियों से भर जाओ। जन्मदिन मुबारक हो मेरी जान, तुम हमेशा यूँ ही मुस्कुराती रहो—यही है मेरी पहचान। ~ माँ ❤️ ~ फ़िज़ा

ये चाय नहीं, एक रिश्ता है..

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  मिट्टी की कुल्हड़ में सजी, ये चाय नहीं एहसास है, पहली चुस्की में जैसे, घर लौट आने का विश्वास है। हल्की-सी भाप में घुली, माँ की रसोई की खुशबू, हर घूँट में मीठी यादें, और थोड़ी-सी बचपन की धूप। सड़क किनारे, ठंडी शाम, या सुबह की नींदी आँखें, ये कुल्हड़ वाली चाय हमेशा, दिल को अपने पास बुला ले। होठों से लगते ही जैसे, सारी थकान पिघल जाए, एक चुस्की और… फिर एक और, मन यूँ ही मुस्कुराए। मिट्टी की सोंधी महक में, छुपा है अपनापन सारा, ये चाय नहीं, एक रिश्ता है, जो हर बार लगे दोबारा। ~ फ़िज़ा

कप में सजी ये छोटी सी दुनिया

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  कप में सजी ये छोटी सी दुनिया, झाग में जैसे फूल खिला, हल्की-सी खुशबू कॉफी की, मन को चुपके से छू गई भला। संगमरमर की मेज़ पे रखी, ये प्याली कितनी प्यारी है, जैसे सुबह की पहली किरण, या माँ की मीठी फटकार सी न्यारी है। हर घूँट में है सुकून छुपा, जैसे घर की गर्माहट हो, थोड़ी-सी कड़वाहट भी इसमें, पर उसी में मिठास की आहट हो। पास रखी वो खाली कुर्सी, किसी अपने का इंतज़ार करे, या खुद से मिलने का मौका, कुछ पल दिल को उपहार करे। ये कॉफी नहीं, एक एहसास है, थोड़ा शहर, थोड़ा गाँव है, भागती दुनिया के बीचों-बीच, ये पल ही तो असली ठहराव है। ~ फ़िज़ा

हर दिल अपनी कहानी गाए।

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  नीले आसमान की चादर तले, शहर खड़ा है सीना ताने, ऊँची-ऊँची इमारतों के बीच, नदी बहती अपने तराने। शांत जल में झलकती दुनिया, जैसे कोई सपना ठहर गया, लहरों की धीमी सरगोशी में, हर शोर कहीं बिखर गया। किनारों पर खड़ी ये इमारतें, वक़्त की कहानी कहती हैं, भागती ज़िन्दगी के बीच भी, एक ठहराव सा देती हैं। नावें जैसे ख्वाब तैरते, मंज़िल की ओर बढ़ती जाएँ, और ये पुल—रिश्तों सा कोई, दो किनारों को जोड़ते जाएँ। इस शहर में भी एक सुकून है, भीड़ में भी एक तन्हाई, जहाँ हर चेहरा अनजाना, पर हर नज़र में है गहराई। नीले गगन और हरे जल के बीच, ज़िन्दगी यूँ बहती जाए, शहर की इस चुप सी धड़कन में, हर दिल अपनी कहानी गाए। ~ फ़िज़ा

ज़िन्दगी तेरे खेल भी निराले हैं

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  ज़िन्दगी भी क्या ज़िन्दगी है, ये कैसा इसका फ़साना है, हर मोड़ पर संग भी देती, फिर तन्हाई का ठिकाना है। दिल को हर किसी से जोड़ दे, ऐसी इसकी रवानी है, पास लाकर फिर सिखाती, दूरी ही असली कहानी है। जीना ही नहीं, जीने की चाह में हमें लालची बना देती, आदत पड़ते ही फिर ये, सबसे गहरी सीख सुना देती है। “अपनी राह खुद ही चुनो, औरों से थोड़ा जुदा रहो,” अकेले आए थे तुम यहाँ, अकेले ही मुस्कुरा के बहो। ये जीवन का खेल निराला, सबके अपने-अपने नियम हैं, यहाँ कोई किसी का सहारा नहीं, बस चलते अपने कदम हैं। उम्मीदों का बोझ न रखना, दिल को हल्का ही रहने दो, सुने कोई तो ठीक, न सुने—तो भी ख़ामोश ही रहने दो। न समझाने में उम्र गँवाओ, न किसी को मनाने में, ज़िन्दगी के रंग निराले हैं, बस खुद को पहचानने में। ज़िन्दगी तेरे खेल भी निराले हैं, हर मोड़ नया अफ़साना है, हर मोड़ पर संग भी देती, फिर तन्हाई का ठिकाना है। ~ फ़िज़ा 

हमेशा मुस्कुराती रहें।

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(09-08-1933 - 04-11-2026)   गीतों की मल्लिका आज खामोश सी हो गई, सुरों की वो रानी जैसे कहीं खो गई। जो हर दिल को छूती थी, हर एहसास जगाती थी, दुःख-सुख, हँसी-खुशी में, अपनी आवाज़ से सहलाती थी— आज वही धड़कन जैसे थम सी गई। जिसकी तान पर दुनिया झूमती रही बरसों, जिसकी नकल में भी लोग ढूँढते थे सरगमों के किस्सों, कॉमेडी के रंग में भी जिसकी गूँज थी शामिल, वो अनोखी आवाज़ आज हो गई है ख़ामोश, बेहद ग़मगीन। आशा ताई, आपका यूँ चले जाना दिल को चीर गया, बचपन से लेकर आज तक, हर पल आपने ही तो घेर लिया। आपकी आवाज़ ने हमें थामा, सँवारा, सहारा दिया, हर मोड़ पर, हर दौर में, जीने का एक सहारा दिया। आज बस वही आवाज़ है, जो हवाओं में गूँजती रहेगी, अजर-अमर बनकर हर दिल में यूँ ही बसती रहेगी। ये दुनिया है—यहाँ बिछड़ना तो हर किसी की कहानी है, एक-एक कर सबको जाना है, यही जीवन की रवानी है। पर दुआ है दिल से—जहाँ भी हों आप, सुकून में रहें, अपने सुरों की दुनिया में, हमेशा मुस्कुराती रहें। ~ फ़िज़ा