जिंजर की अदा ..


 

मासूम सी आँखों में कितनी प्यारी शरारत है,
जिंजर की हर अदा में बसती मेरी मोहब्बत है।

कानों को यूँ खड़ा करके, जैसे कुछ कहना चाहती,
खामोशी में भी उसकी अपनी मीठी इबारत है।

छोटी-सी गेंदों संग बैठी, दुनिया से बेख़बर सी,
उसकी सादगी में ही छुपी खुशियों की दौलत है।

ना ताज चाहिए उसको, ना कोई बड़ी फरमाइश,
बस थोड़ा प्यार मिल जाए—यही उसकी हुकूमत है।

घर के हर कोने में उसकी मासूम चाल बसती,
जिंजर नहीं, वो दिल की धड़कन, मेरी राहत है।

~ फ़िज़ा

Comments

Popular posts from this blog

ऐ दुनियावालों ...

ज़िंदगी तेरे तो खेल निराले हैं

वो भी क्या दिन थे...!