जीते रहो।
ज़िंदगी—
कोई किताब नहीं
जो एक बार पढ़ ली
और सब समझ आ गया।
हम सोचते थे—
स्कूल, कॉलेज, डिग्री…
बस, यहीं तक है सीखना।
लेकिन—
ज़िंदगी ने सिखाया,
कि असली क्लासरूम
तो हर दिन है।
हर गिरना—
एक लेसन।
हर संभलना—
एक जवाब।
हम बड़े तो हो गए—
पर समझदार?
अभी भी बन रहे हैं।
और हाँ—
ये सफ़र रुकता नहीं…
जब तक साँस है,
सीखना जारी है।
मंज़िल?
शायद मौत।
पर तब तक—
सीखते रहो,
जीते रहो।
~ फ़िज़ा

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