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गुमशुदा

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  बाहर सुनहरी धुप है  मौसम भी ठीक है  दिल कहीं मायूस  गुमशुदा हो चला है  कोई बात नहीं पर  दिल नासाज़ सा है  इस उदासी की वजह  ढूंढ़कर भी नहीं मिला  शायद बोरियत है  रोज़ वही दिनचर्या  वही लोग और सब  वही घर से बाहर  और बाहर से अंदर  बस पंछियों पर है  ध्यान अटका आजकल  देखा कल ओक पेड़ पे  दो घोसलों का निवास  ख़ुशी हुई कितनों को है  आसरा इस पेड़ से  अब तो बस उन्हें देखते  गुज़रता है वक्त सारा  काम तो व्यस्त रखे  मगर दिल कहीं खोया है ! ~ फ़िज़ा 

कठपुतली

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  ज़िन्दगी के खेल भी निराले हैं  अब ज़िंदा हैं तो मौत आनी है  रात है तो दिन को भी होना है  रोने वाला कभी हँसता भी है  धुप-छाँव से भरी ज़िन्दगी है  ऐसे में तय करे कब क्या है  क्या नहीं और क्या होना हैं  सब सोचा मगर होता नहीं है  ज़िन्दगी अपनी डोर उसकी है  ~ फ़िज़ा  

बहारों का चमन है ...

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बहारों का चमन है  नज़ारों का गमन है  ऐसे में गुमसुम ही   लहराता  नेहर है  जो सब देखता है  सुनता सुनाता है  संगीत की धुन में  कुछ कहा जाता है  कुछ देर ठहर कर  मैंने भी सुनना चाहा  हर धुन में कहा रही  दास्तां सदियों की  धीरे बढ़ो तुम धीरे  मगर धैर्य मत खोना  ये वक़्त है ठहरा कभी  किसी के लिए नहीं  मगर तुम ठहर सको तो  ठहरो, ये धुन हैं नयी  कुछ गुनगुना सको तो  वो भी सही, न तो वो भी  नज़ारों के लिए नज़र और ख़ुशी के लिए खुद  ज़िन्दगी ज़िंदा रहना है  ज़िंदादिली रेहना ज़िन्दगी है   बहारों का चमन है  नज़ारों का गमन है  ऐसे में गुमसुम ही   लहराता  नेहर है  ~ फ़िज़ा 

करोना मेरी किस्मत

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उसको मैं तकता रहा यूँही  लगा सालों बीत गए यूँही  दिल के अरमान रहे जवां  बस ख्यालों में जुड़ा रहा  हर पल रहा उसके संग  उठता-बैठता ख्यालों में  एक पल भी न रहा दूर  फिर ख़याल आया मुझे  क्यों न प्रोपोज़ ही करदूँ  यही सोचते-सोचते मैंने  बात उससे करने की ठानी  बस इसी ख़याल में था मैं  के कोरोना ने मेरा ये सपना  साकार होने से रोक दिया  अब न वो दिखती है मुझे   और न ही उसकी वो चमक  क्यूंकि हरदम वो उस मुये  मास्क से चिपकी रहती है !  ~ फ़िज़ा  

कॅरोना ने आज सभी को ज़ब्त कर लिया

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बचपन में सुनी थी कई कहानियां  कभी नानी कभी मासी की ज़ुबानियाँ  जब पड़ा  पृथ्वी पर ज़ुल्म की बौछारियाँ   और कई कारणवश हुए भी बरबादियाँ  तब निःसंवार करने पैदा हुए अवतरणियां  काल का क्या बदलना है समय के साथ  और इंसान की बदलती नियति के समक्ष   बिगड़ने लगा संतुलन और संयम प्रकृति का  एक बलवान रूप विषाणु हुआ पैदा इस बार  लगा मचलाने इंसान को हर कोने-कोने पर  रंगीला, फूलों सा सुन्दर खिला-खिला सा  नाम जिसका कॅरोना लगे हैं मोहब्बत सा  किसी के छूने से तो छींख से जकड ले ये  कमसिन मोहब्बत का बुखार हो किसी का  जो चढ़े तो फिर आग का दरिया सा ही लगे  पार जिसने भी लगाया जान लेकर ही रहा है  इंसान के अहंकार को प्रकृति की ललकार है  बहुत ऊँचा न उड़ रख तो डर किसी का नादाँ  इंसान और प्रकृति में बढ़ गया अस्मंजसियां   बिगड़ गया संतुलन प्रकृति और इंसान का   कॅरोना ने आज सभी को ज़ब्त कर लिया  सिमित दीवारों के बीच जैसे कालकोठरियाँ  फासले बनाये र...