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फिरती हूँ आजकल बेहकी-बेहकी

ऊपर है बादल,उसके ऊपर आसमान

अभी मैं कच्ची हूँ ...

एक घबराहट

खुली हवा में खिली हूँ इस तरह...

बहारों ने खिलना सीखा दिया मुझे ...!

कहाँ जाते हो रुक जाओ !

मुझे पढ़ने वाले कभी सामने तो आओ...!

कुछ लोग मोहब्बत करके... :)

क्यों न जाएं हस्ते-हस्ते उस पार हम भी?

जीने की राह है आज़ादी जब ...

तब आयी एक नन्ही कली...

जीवन का नाम है सिर्फ चलना !

हम दोनों हैं इंसान!

स्त्री को आम इंसानों जैसा जीने देना !

हाय-हाय करती 'फ़िज़ा' ऐसे सोच-विचार का

एक चेहरा ऐसा भी था भीड़ में ...

मुझको रोकने वालों ये बात कहनी थी तुमसे ...

ज़िन्दगी है तो हैं ज़िंदा वर्ना क्या है?