Tuesday, March 07, 2017

स्त्री को आम इंसानों जैसा जीने देना !


स्त्री सिर्फ देने का नाम नहीं 
कर्म से और कर्तव्य से कम नहीं 
हाव-भाव में बेशक तुम सी नहीं
फिर भी हर काम में किसी से कम नहीं !
बेटी का रूप लेकर कोई ग़म नहीं 
बेटी, बेहन बन फुली न समायी नहीं 
दुल्हन बन वो बाबुल को भुलाई नहीं 
ससुराल की बनकर रहने में शरमाई नहीं !
प्यार का भण्डार है वो कतराई नहीं 
सहारा देना पड़ा देने से घबराई नहीं 
मुसीबतों से लड़ने से कभी हारी नहीं 
हर काम करने से वो हिचकिचाई नहीं !
बेटी, बेहन, बीवी, बहु, माँ होने से डरी नहीं 
काली का रूप लेकर सीख देने से हटी नहीं 
स्त्री हर मुसीबत को सहने से झिझकती नहीं 
फिर स्त्री को पुरुष जैसी आज़ादी क्यों नहीं ?
कुछ लोग उसे खूसबसूरत कहते हैं 
कुछ लोग उसे चुड़ैल भी कहते हैं 
हर तरह के नाम देकर भी उसे पूजते हैं 
स्त्री को भी इंसान क्यों समझते नहीं ?
आखिर क्यों समझे इंसान स्त्री को 
जब वो सबसे अलग होकर भी अबला है 
सीता से लेकर दुर्गा की छवि रखती है 
हाँ ! हो सके तो स्त्री को आत्मनिर्भर रखना !
उसे अपने हक़ में भी हक़ अदा करने देना !!
स्त्री को आम इंसानों जैसा जीने देना !!!

~ फ़िज़ा 

No comments:

गर्मी वाली दोपहर...!

ऐसी ही गर्मी वाली दोपहर थी वो हर तरफ सूखा पानी को तरसता हुआ दसवीं कक्षा का आखिरी पेपर वाला दिन बोर्ड की परीक्षा पढ़ाई सबसे परेशान बच्चे म...