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भटकते हैं ख़याल 'फ़िज़ा' कभी यहाँ तो कभी वहां हसास ....

विस्मरणिया है संगम ऐसा ...

'फ़िज़ा' ये सोचती रही कितना चाहिए जीने के वास्ते?