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अधूरा लगता है....

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तुझ से बात नहीं होती तो अधूरा लगता है  तेरा साथ  ना हो तो सफर अधूरा लगता है  फिर भी जब ये बात केहता हूँ तो पूरा लगता है सेहर के साथ मेरी शाम ढले लगता है  शाम आते ही सेहर पास लगता है  इस सेहर और शाम के फासले दूर लगता है  कब ये अधूरा पूरा हो यही अब सोचने लगता है  सफर में हूँ पटना से इंदोर व्यस्त लगता है  सफर में हमसफर भी हो साथ अच्छा लगता है  सफर में धूप भी एक  नमी  सा लगता है  ~ फ़िज़ा 

गुनेहगार 'फ़िज़ा' हो ....

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गुफ्तगू हो मुलाकात हो जो भी हो  किसी को ना चाहते हुये, परेशन वो हो मस्तियाँ हो, हॅसी-मज़ाक हो, संजीदा ना हो कोई एक भी हो  तो हर तरफ तूफान का अंदेशा हो ज़ेहन की बात आई हो मगर केहना ज़रूरी हो? ऐसी भी बात ना  हो वर्ना हादसे जाने कितने हो बातों से तंग करना कभी सताना भी हो  लेकिन इस खेल में चिंगारी हमेशा हो  किसी के इज़हार में कभी दिल्लगी हो  उसी की बातों में कभी सच्चाई हो बातों में इज़हार में अफरा तफरी हो एहसास में भी कुछ खास हो  हर सूरत हसीन हो, ना हाँ ना ना हो तब भी हरतरफ से गुनेहगार 'फ़िज़ा' हो  ~ फ़िज़ा

खयालों में बस गया बिन बताये मेहमान.. :)

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उम्र गुज़ारेंगे हम कभी यहाँ तो  वहां कभी  अधूरी मुलाकाते भी होती है यहाँ बातें चंद ही हुई हसते-मुस्कुराते जहां  ज़िंदगी भर की निशानी ले चले यहाँ से वहां आधी मुलाकात, अधूरी बात मगर हैरान खयालों में बस गया बिन बताये मेहमान ऐसा क्यूं के दूर जाकर ही समझे कोई अधूरी ज़ुबान कैसे और कब कोई ना जाने अधूरे हुये मेहरबान सोचे 'फ़िज़ा' इस अधूरे-आधे इज़हार-ए- सुभान होती है पेहचान भले ही अधूरे दिल जवान ~ फ़िज़ा