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कप में सजी ये छोटी सी दुनिया

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  कप में सजी ये छोटी सी दुनिया, झाग में जैसे फूल खिला, हल्की-सी खुशबू कॉफी की, मन को चुपके से छू गई भला। संगमरमर की मेज़ पे रखी, ये प्याली कितनी प्यारी है, जैसे सुबह की पहली किरण, या माँ की मीठी फटकार सी न्यारी है। हर घूँट में है सुकून छुपा, जैसे घर की गर्माहट हो, थोड़ी-सी कड़वाहट भी इसमें, पर उसी में मिठास की आहट हो। पास रखी वो खाली कुर्सी, किसी अपने का इंतज़ार करे, या खुद से मिलने का मौका, कुछ पल दिल को उपहार करे। ये कॉफी नहीं, एक एहसास है, थोड़ा शहर, थोड़ा गाँव है, भागती दुनिया के बीचों-बीच, ये पल ही तो असली ठहराव है। ~ फ़िज़ा

ज़िन्दगी तेरे खेल भी निराले हैं

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  ज़िन्दगी भी क्या ज़िन्दगी है, ये कैसा इसका फ़साना है, हर मोड़ पर संग भी देती, फिर तन्हाई का ठिकाना है। दिल को हर किसी से जोड़ दे, ऐसी इसकी रवानी है, पास लाकर फिर सिखाती, दूरी ही असली कहानी है। जीना ही नहीं, जीने की चाह में हमें लालची बना देती, आदत पड़ते ही फिर ये, सबसे गहरी सीख सुना देती है। “अपनी राह खुद ही चुनो, औरों से थोड़ा जुदा रहो,” अकेले आए थे तुम यहाँ, अकेले ही मुस्कुरा के बहो। ये जीवन का खेल निराला, सबके अपने-अपने नियम हैं, यहाँ कोई किसी का सहारा नहीं, बस चलते अपने कदम हैं। उम्मीदों का बोझ न रखना, दिल को हल्का ही रहने दो, सुने कोई तो ठीक, न सुने—तो भी ख़ामोश ही रहने दो। न समझाने में उम्र गँवाओ, न किसी को मनाने में, ज़िन्दगी के रंग निराले हैं, बस खुद को पहचानने में। ज़िन्दगी तेरे खेल भी निराले हैं, हर मोड़ नया अफ़साना है, हर मोड़ पर संग भी देती, फिर तन्हाई का ठिकाना है। ~ फ़िज़ा 

ज़िन्दगी का ऐलान है।

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  ज़िन्दगी भी क्या ज़ोरदार है, हर साँस का यहाँ क़रार है, जीने के लिए हर पल मेहनत, यही इसका असली सार है। इंसान हो या कोई जीव, सबका एक ही व्यवहार है, हर साँस के पीछे छुपा, खुद की कोशिशों का आधार है। यहाँ हर किसी को अपना बोझ, खुद ही उठाना पड़ता है, इस सफ़र में हर राही को, खुद ही बनना हमसफ़र है। ज़िन्दगी किसी को नहीं बख़्शे, ये कैसा उसका व्यवहार है, हर किसी को देना पड़ता, साँसों का भी जैसे किरदार है। मेहनत की धूप में जलकर ही, मिलता सुकून का उपहार है, ये जीवन एक इम्तिहान है, और जीना ही इसका स्वीकार है। मैं भी इस राह का मुसाफ़िर, करता हर दिन संघर्ष अपार है, जीना है तो जीना होगा, यही ज़िन्दगी का ऐलान है। ~ फ़िज़ा 

अच्छा लगता है।

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  अपने संग रहना, अपने संग वक़्त बिताना अच्छा लगता है, ख़ुद से बातें करना, ख़ुद को समझाना अच्छा लगता है। जगह नई हो या पुरानी, अनजानों का भी साथ कभी, भीड़ में खोकर भी दिल को बहलाना अच्छा लगता है। चारों ओर नफ़रत, द्वेष की आग भले ही फैली हो, दिल में थोड़ी सी मोहब्बत बचाना अच्छा लगता है। सिर्फ़ बेजान पुतलों में ढूँढें जब लोग दोस्ती, ऐसे रिश्तों से दूरी बनाना अच्छा लगता है। कैसा वक़्त ये आ पहुँचा है दुनिया के आँगन में, सच को कह देना भी अब तो सताना अच्छा लगता है। खुशहाली, साफ़दिल और प्यार अगर हो दरमियाँ, एक-दूजे के लिए दिल से निभाना अच्छा लगता है। ‘फ़िज़ा’ जाने क्यों आजकल इंसानों से ज़्यादा, ख़ामोश पुतलों का साथ निभाना अच्छा लगता है। ~ फ़िज़ा

ये इश्क़ चाँद से

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  ज़िंदगी की चाह ने कुछ ऐसा कर दिया है, चाँद को बचपन से ही अपना हमसफ़र बना लिया है। किसी की दोस्ती का हो या न हो एहसास, चाँद के  मोहब्बत ने रूह तक छू लिया है। बचपन बीता, जवानी आई, बढ़ती रही ये लगन, हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा उसे दिल में बसा लिया है। आज वो आधा सा क्यों नज़र आता है मुझे, लगता है उसका आधा दिल मैंने ही ले लिया है। उम्मीद है एक दिन वो खुद चले आएगा यहाँ, जैसे मैं हर गली-नुक्कड़ उसका पीछा करती आई हूँ। ‘फ़िज़ा’ ये इश्क़ चाँद से यूँ ही नहीं हुआ, हर रात उसे देखकर दिल को समझा लिया है। ~ फ़िज़ा 

जीते रहो।

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  ज़िंदगी— कोई किताब नहीं जो एक बार पढ़ ली और सब समझ आ गया। हम सोचते थे— स्कूल, कॉलेज, डिग्री… बस, यहीं तक है सीखना। लेकिन— ज़िंदगी ने सिखाया, कि असली क्लासरूम तो हर दिन है। हर गिरना— एक लेसन। हर संभलना— एक जवाब। हम बड़े तो हो गए— पर समझदार? अभी भी बन रहे हैं। और हाँ— ये सफ़र रुकता नहीं… जब तक साँस है, सीखना जारी है। मंज़िल? शायद मौत। पर तब तक— सीखते रहो, जीते रहो। ~ फ़िज़ा 

मुस्कुराते रहो तुम यूँ ही जीवन भर !

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  कभी हाथों में समा जाते थे तुम नन्हे से हर रास्ते, आज गोद में भी न समाओ — बड़े हो गए हर रास्ते। माँ का दिल तब भी धड़कता था फ़िक्र के साये में, कहीं भूल न हो जाए मुझसे इस डर में हर रास्ते। मुत्तासी हँसकर कहती थी मेरी चिंता सुनकर, “बच्चे एक से ही होते हैं दुनिया में हर रास्ते।” सबसे छोटे थे तुम घर के प्यारे आँगन में, लाड़-प्यार भी बरसा तुम पर खुलकर हर रास्ते। पर तुमने कभी उस स्नेह का अभिमान न किया, सादगी ही रही तुम्हारे स्वभाव में हर रास्ते। खुश रहो सदा, किसी को दुःख न देना जीवन में, इंसानियत का हाथ बढ़ाना तुम भी हर रास्ते। 'फ़िज़ा' की दुआ है माँ के दिल की गहराइयों से, मुस्कुराते रहो तुम यूँ ही जीवन भर हर रास्ते। ~ फ़िज़ा 

करना है आरंभ !

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ज़िन्दगी में कुछ हसीन पल  यूँही चले आते हैं बिखेरने   खुशियां ! कभी कुछ सोचकर नहीं  यूँही एक पल में लिया हुआ  फैसला ! वो वक़्त भी आ गया जब  सीखे हुए कला का करना है   प्रदर्शन ! कई भावनायें हैं मन में गुरु दक्षिणा  एवम गुरु के आशीर्वाद से करना है  आरंभ !  ~ फ़िज़ा 

दोस्ती

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  दोस्ती क्या होती है कभी सोचा है? रोज़ न मिलें फिर भी स्नेह हो! रोज़ बातें न हों मगर विश्वास हो ! दोस्ती में सिर्फ एक नियम होता है~  प्यार और विश्वास बरकरार रहे ! ज़िन्दगी लंबी नहीं मगर अच्छी हो ! दोस्तों का साथ अपनों का साथ! ख़ुशी के चार बोल सहानुभूति से भरे ! जीने को और सुखद बना दें दोस्त ! किसी ने सच कहा है - 'दुनिया हसीनों का मेला, मेले में ये दिल अकेला ! एक दोस्त ढूंढ़ता हूँ मैं दोस्ती के लिए !' ~ फ़िज़ा 

वो भी क्या दिन थे...!

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 वो भी क्या दिन थे जब खुलकर मिला करते थे  अब मुस्कुराने से झिझकते हैं कहीं मसला न हो जाये ! एक वक़्त था जब घंटों बातें होती खूब हँसते गाते  अब तो बात नहीं बहस के लिए मुद्दे का होना ज़रूरी है ! एक समय सब अपनी राय साझा करते सुन लेते थे   अब तो सबकी राय में हाँ न मिलाये तो गद्दार कहलाते है ! जीवन के पथ पर बहुत कुछ सीखा और समझा है खुश रहने के लिए चीज़ें नहीं चंद खास की ज़रुरत होती है ! कम हैं दोस्त और दोस्ती भी कहाँ है आजकल किसी से  बस 'फ़िज़ा' रिवायतें है जो निभाई जाती हैं मज़बूरी में जैसे ! ~ फ़िज़ा 

ऐ दुनियावालों ...

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  कभी ऐसे सलाहकार मिलते हैं  जिन्हें कोई तज़ुर्बा होता नहीं है ! चिल्लाकर लोग सच जताते हैं  भूल जाते हैं खुदी में गड़बड़ है ! बातों की रट तो है कुछ ऐसे  खुद पे भरोसा ही नहीं जैसे !  आदमी शान से कहे परवाह नहीं  औरत सोचे तो समाज जीने न दे ! कभी खुद के गरेबान में भी देखना  फायदे में तुम भी और हम भी रहेंगे ! ऐ दुनियावालों बस बोरियत है यहाँ  कब अपनी सवारी आएगी, जाना है !! ~ फ़िज़ा 

लगता है जैसे हँसते हैं इंसानों पे !

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 जहाँ खुला आसमान उड़ते पंछी देखूँ  लगता है जैसे हँसते हैं इंसानों पे ! वक़्त ऐसा आ चला है जहाँ पर  बिना पिंजरे के बंधी बने हैं लोग ! अब तो हालत ऐसा है जनाब जाना चाहो वापस जाने न दें ! किसी के विरुद्ध क्या बोलोगे अब  कुछ कहने से पेहले ही बोलती बंद ! कटुक नीबूरि कहाँ कनक कटोरी  पिंजर बंध कनक तीलियाँ भी नहीं ! खूब हंसो तुम पंछी खूब हंसों   पैरों पर जो मारी है कुल्हाड़ी ! ~ फ़िज़ा 

ये वैलेंटाइन का दिन

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  ज़िन्दगी की भाग-दौड़ में गुज़र गए पल  कहाँ फुरसत सोचने की कैसा होगा कल ! हरदम साथ में हैं और सब कुछ साथ है  मुद्दे की बात न हो ऐसा भी अक्सर होता है ! अनियोजित मुलाकात कुछ ऐसा रंग लायी  ज़िन्दगी के बाकि हिस्से की तयारी हो गयी ! उसने कहा, ज़िन्दगी तो बस तुम्हारे ही साथ है  निवृत्ति से पहले हमें साथ दुनिया घूमना है ! कुछ लम्हों की मुलाकात और बातों ने मुझे  ज़िन्दगी-भर जीने की ऊर्जा और ख़ुशी देदी  ! ये वैलेंटाइन का दिन भी कितना गज़ब है  प्यार के नए बीज़ बोने की जगह बना गयी ! ~ फ़िज़ा 

उसके ग़ुस्से पर भी प्यार आता है

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  उसके ग़ुस्से पर भी प्यार आता है  क्यूंकि प्यार जो मुझ से ज्यादा है  !! उसका पेहल न करना अखलाता है  मगर मेरे पेहल का इंतज़ार करता है !! उम्मीद बनाये रखना भी प्यार ही है  वर्ना पलटकर सोते ही हाथ न पकड़ता !! खट्टा-मीठा प्यार कश्मीरी चाय जैसे स्वाद दोनों का मिले इश्क़ हो ज्यादा !! आज भी नयापन है रिश्ते में बरसों से  वो गुदगुदाहट जब वो धीमे से मुस्कुरा दे !! नयी कोपलें नयी चिंगारियाँ अदभुत सा  नये मौसम में मोहब्बत हौसलेमंद सा !! ~ फ़िज़ा 

मगर ये ग़ुस्सा?

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  जाने किस किस से ग़ुस्सा है वो ? अपनों से? ज़माने से? या मुझ से? क्या मैं अपनों में नहीं आती? उसकी हंसी किसी ने चुरा ली है  लाख कोशिशें भी नाकामियाब हैं  उसे हर बात पे गुस्सा आता है ! अब तो और कम बोलता है वो  रिवाज़ों में बंधा है सो साथ है  अकेलेपन से भी घबराहट है ! इसीलिए भी शायद साथ है  मगर ये ग़ुस्सा? ज़माने भर से है ! उम्मीद ही दिलासा दिलाता है  इस ग़ुस्से का कोई तो इलाज हो !!! ~ फ़िज़ा 

सहानुभूति !!!

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  ज़िन्दगी के चंद हसीन पल ज़िन्दगी बनाने में सफल हैं  वर्ना यहाँ आये दिन तीखे शब्दों के बाण क्या कम हैं? शुक्र है चंद ऐसे भी हैं जो न जानते हुए भी समझते हैं  वर्ना हर कोई अपनी अपेक्षाओं की थाली परोसे हैं ! कहाँ मिलते हैं लोग जो "मैं" को छोड़कर आप में बसे  यहाँ तो हर कोई खुदी में खुदा बना नज़र आता है ! जग से हर किसी को उठना है एक न एक दिन 'फ़िज़ा'  यहाँ इंसान एक दूसरे की नज़रों से ही उठा जा रहा है ! रेहम! दोस्तों ऐसे भी हैं जो अंदर ही अंदर कूटते हैं  कुछ सहानुभूति के अल्फ़ाज़ नहीं तो इशारा ही दे दें ! ~ फ़िज़ा 

क्रिसमस का चुम्बन

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  बिस्तर की सिलवटों से निकलते   कमरे से अंगड़ाई लेते हुए  जब कमरे में मैं आयी  उसकी नज़र मुझ पर पड़ी  'आई लव यू'  की सिली-सिली हवा  मेहकने लगी ! क्रिसमस के तोहफे समेटकर  वो सीधे कमरे की ऒर बढ़ा  दरवाज़े की चटकनी लगते ही  बाँहों में भर उसने जो चूमा  सीधे दूसरे कमरे ले जा  उसका असीम चूमना   सोचते रेह गयी साल ख़त्म  या शुरू हुयी इस तरह ! ~ फ़िज़ा 

ज़िन्दगी दे उम्मीद

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  ज़िन्दगी दे उम्मीद तु उसे नज़रअंदाज़ न कर  ये ज़िन्दगी के वो ईशारे हैं जो बुलंद कर दे ! हस्के मिलो सभी से दुश्मनी कहाँ है किसी से   खाली हाथ आये तो खाली हाथ ही जाएंगे ! दुरी रखो जहां तख़मीना हो जल जाने का  इंसान से क्या डरना जब मरना है सबको ! रिश्ते प्यार के बन भी जाये कभी विषाक्त  दोस्ती के नाम से हुतात्मा निरर्थक है दोस्त ! ज़िन्दगी है जब तक तू जीवित है फ़िज़ा  मरकर भी क्या कोई जी सका है यहाँ !! फ़िज़ा 

सुना है इलेक्शन बस एक खेल है !!

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  हर तरफ एक खौफ सा माहौल है  सुना है इलेक्शन का ये सब खेल है  अब तक इतनी उत्तेजना नहीं थी कभी  फिर आज-कल में क्या होगया ऐसा ? सुना है इलेक्शन का ये सब खेल है ! पेहले ये नहीं तो वो पार्टी जीतेगी बस  सब कुछ तो अच्छा ही चल रहा है  एक साल इसे तो दूजे में उसका राज  माहौल तो वोही है जैसे थे वैसे हैं  सुना है इलेक्शन का ये सब खेल है ! ये खौफ क्यों? इलेक्शन ही तो है  किसी ने कहा इस डर की वजह  यहां की जनता ही है जिसने चुना  ट्रम्प, निठल्ला नफरत फैलाने वाला   सुना है इलेक्शन का ये सब खेल है ! डरना तो पड़ेगा अपने हक़ की बात है  किसी बन्दर के हाथ में तलवार देकर   राजा भी खुद की नाक न बचा पाया  डरना क्या, वोट दो जनहित के लिए  कमला को लाओ इलेक्शन तो खेल है ! सुना है इलेक्शन बस एक खेल है !! ~ फ़िज़ा 

खुदगर्ज़ मन

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  आजकल मन बड़ा खुदगर्ज़ हो चला है  अकेले-अकेले में रहने को कह रहा है  फूल-पत्तियों में मन रमाने को कह रहा है  आजकल मन बड़ा खुदगर्ज़ हो चला है ! कुछ करने का हौसला बड़ा जगा रहा है  जीवन का नया पन्ना खोलने को कह रहा है  आजकल मन बड़ा खुदगर्ज़ हो चला है ! समझा रहा है बेड़ियाँ तो सब को हैं मगर  बेड़ियों की फ़िक्र क्यों जीने से रोके मगर  आजकल मन बड़ा खुदगर्ज़ हो चला है ! पंछी सा है मन रहता है इंसानी शरीर में  कैसा ताल-मेल है ये उड़ चलने को केहता है  आजकल मन बड़ा खुदगर्ज़ हो चला है ! घूमना चाहता है दुनिया सारी बेफिक्र होके  जाना सभी ने अलग-अलग फिर क्या रोके? आजकल मन बड़ा खुदगर्ज़ हो चला है ! मोह-माया के जाल में न धसना केहता है  जाना ही है तो मन की इच्छा पूरी करता जा  आजकल मन बड़ा खुदगर्ज़ हो चला है ! तू अपनी मर्ज़ी की करता जा खुश रह जा  दुनिया कहाँ सोचेगी जो तू दुनिया की सोचे है  आजकल मन बड़ा खुदगर्ज़ हो चला है ! अब मैंने भी मन से मन जोड़ लिया है  खुश, आज़ाद रेहने का फैसला कर लिया है  आजकल मन ही नहीं मैं भी खुदगर्ज़ हो चला हूँ !! ~ फ़िज़...