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मैंने अपनी एक दुनिया

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ये सच है, मैंने अपनी एक दुनिया बसा ली है, चाँद सितारों की छाँव में खुद को सजा ली है। जहाँ शोर-ए-जंग से दूर है मेरा ये छोटा सा जहाँ, प्रकृति के घेरे में मैंने अपनी जगह बना ली है। इधर दुनिया जल रही है नफरत की ललकार में, उधर मासूमियाँ खोतीं—ये कैसी अंधी गली है। किसी के पास सब कुछ है, फिर भी खालीपन सा, किसी के पास छत नहीं—बस ज़मीं ही बिछा ली है। कोई कार में रातें काटे, कोई आसमान तले, ये फ़ासलों की सच्चाई दिल में उतर चली है। क्या कहें, किससे कहें, कौन सुनेगा यहाँ, हर आवाज़ जैसे खामोशी में ही ढल चली है। तो मैंने भी अपनी एक खामोश दुनिया चुन ली, चाँद सितारों संग ही अब मेरी ये हमसफ़र बनी है। हम सब ढूँढते फिरते हैं कोई सुरक्षित सा कोना, और खुद के ही अंदर कहीं दुनिया समा ली है। ज़िन्दगी भी अजीब है—एक बुलबुला सा सफ़र, पल में बनती-बिखरती, यही उसकी असली कली है। ~ फ़िज़ा 

“गम वॉल”

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  ये तब की बात है, जब आलस भी एक आदत था, मन भर जाने पर च्युइंग गम का यूँ दीवारों से रिश्ता था। दिन ढले तो दीवारें भर जातीं रंग-बिरंगे निशानों से, सुबह होते ही कोई आकर, उन्हें साफ़ करता अरमानों से। ये दिनचर्या चलती रही, लोग यूँ ही दोहराते गए, साफ़ करने वाले थकते रहे, पर हाथ न रुक पाए। धीरे-धीरे कुछ आँखों को इसमें भी कला नज़र आई, बेतरतीब सी ये आदत, एक अजीब सी पहचान बन पाई। जो था कभी आलस का खेल, अब बन गया एक तमाशा, लोग यहाँ तस्वीरें खींचें, जैसे कोई अनोखा नज़ारा। आज भी चाहे शहर वाले इसे फिर से साफ़ कर जाएँ, पर अगले ही दिन ये दीवारें, फिर उसी रंग में रंग जाएँ। “गम वॉल” के नाम से अब ये दुनिया भर में जानी जाए, देखो आलस की ये कहानी, कैसे रंग नए दिखलाए। ~ फ़िज़ा

ज़िन्दगी का ऐलान है।

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  ज़िन्दगी भी क्या ज़ोरदार है, हर साँस का यहाँ क़रार है, जीने के लिए हर पल मेहनत, यही इसका असली सार है। इंसान हो या कोई जीव, सबका एक ही व्यवहार है, हर साँस के पीछे छुपा, खुद की कोशिशों का आधार है। यहाँ हर किसी को अपना बोझ, खुद ही उठाना पड़ता है, इस सफ़र में हर राही को, खुद ही बनना हमसफ़र है। ज़िन्दगी किसी को नहीं बख़्शे, ये कैसा उसका व्यवहार है, हर किसी को देना पड़ता, साँसों का भी जैसे किरदार है। मेहनत की धूप में जलकर ही, मिलता सुकून का उपहार है, ये जीवन एक इम्तिहान है, और जीना ही इसका स्वीकार है। मैं भी इस राह का मुसाफ़िर, करता हर दिन संघर्ष अपार है, जीना है तो जीना होगा, यही ज़िन्दगी का ऐलान है। ~ फ़िज़ा 

कोड (code) की धाराओं में

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  कोड की धाराओं में, विचारों के संग, एक नई चेतना बहती है चुपचाप हर अंग। न सांसों से जन्मी, न धड़कनों की रीत, मानव बुद्धि ने रची, ये अद्भुत संगीत। शब्दों को उजाला बनाता एक साथी, चित्रों में रंग भरता, सपनों की थाती। कोड की फुसफुसाहट, सृजन की उड़ान, कल्पनाओं को देता ये एक नया आसमान। ये औज़ार नहीं, हमारे ही विस्तार, हौसलों, सपनों और सोच का आकार। जहाँ एल्गोरिद्म थिरकें, विचारों के संग, वहाँ जन्म लेता है, नव-सृजन का रंग। पर हर पंक्ति के पीछे, हर चमक के पार, एक इंसानी दिल है, जो धड़के हर बार। AI सीखे, बढ़े, और बदलता जाए, पर सच वही दिखाए, जो इंसान सिखाए। अस्पतालों में सेवा, कक्षाओं में ज्ञान, कहानियों में साथी, डेटा में पहचान। तेज़ रफ्तार दुनिया में, एक सधा सा हाथ, भविष्य को जोड़ता, बीते कल के साथ। पर याद रहे हमको, इस सृजन के बीच, संतुलन की डोर है, अपने ही हाथों की सींच। तकनीक तभी चमके, सबसे उजली बात, जब इंसानियत संग चले, हर एक कदम साथ। न मानव से मुकाबला, न कोई जंग, ये तो है संगम, सुरों का एक रंग। जहाँ तर्क मिले भाव से, और बुद्धि से कला, हाथों में AI हो, दिल में इंसानियत भला।  ~...

अदा है उसकी ..!

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  ज़िन्दगी है या ज़िंदादिली — अदा है उसकी, दोस्ती है या दोस्ताना — वफ़ा है उसकी। मुस्कराहट से जगमग करता हर एक चेहरा, नवदीप सी रोशन हर दिशा है उसकी। न केवल परिवार को प्रेम से जोड़े, दोस्तों में भी अलग ही जगह है उसकी। आओ आज नवी को दिल से हम मनाएँ, जन्मदिन की घड़ी को यादगार बनाएँ। दुआओं से भर दें हम उसकी ज़िंदगानी, खुशियों के फूल हर राह में सजाएँ। ~ फ़िज़ा 

क्या हम अंदर से ही मरचुके

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देखा तो नन्हे-नन्हे पैर  एक दूसरे पर लदे हुए  मासूम सुन्दर और कोमल से  एक तरफ देखा नन्हे पैर  मैदान में दौड़ते व  खेलते हुए  खिलखिलाते चिल्लाते हुए  बच्चे जो ख़ुशियाँ बिखेरते हैं  हमारा कल हमारे बाद भी रहेगा  वही कल आज लहूलुहान है  खून से रंगे लथपथ शरीर  बेज़ुबान लहुलुहान बेजान  हमारा कल हमीं से बर्बाद  क्या हम अंदर से ही मरचुके  आँखों से देखकर भी नहीं चुके  जानवर भी बच्चों का संरक्षण करते  इंसानियत का क़त्ल हो चला है  स्वार्थ ने जगड़ लिया है जहां  ज़िन्दगी फिर वो बच्चों की सही  नफरत और द्वेष में हम सब  यूँही ख़त्म हो जायेंगे हम  मुर्ख, अपने ही पैर मारे कुल्हाड़ी  मगर ज़िन्दगी? पीढ़ी दर पीढ़ी  क्या सीख हैं आनेवाले कल को  ख़त्म करो सभी को सत्ते के लिए  जब अपने पोते-पोती पूछेंगे तुमसे  क्या जवाब दोगे उनको क्या कहोगे? आँख के लिए आँख लोगे अंधे हो जाओगे !! ~ फ़िज़ा   

लगता है जैसे हँसते हैं इंसानों पे !

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 जहाँ खुला आसमान उड़ते पंछी देखूँ  लगता है जैसे हँसते हैं इंसानों पे ! वक़्त ऐसा आ चला है जहाँ पर  बिना पिंजरे के बंधी बने हैं लोग ! अब तो हालत ऐसा है जनाब जाना चाहो वापस जाने न दें ! किसी के विरुद्ध क्या बोलोगे अब  कुछ कहने से पेहले ही बोलती बंद ! कटुक नीबूरि कहाँ कनक कटोरी  पिंजर बंध कनक तीलियाँ भी नहीं ! खूब हंसो तुम पंछी खूब हंसों   पैरों पर जो मारी है कुल्हाड़ी ! ~ फ़िज़ा 

मगर ये ग़ुस्सा?

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  जाने किस किस से ग़ुस्सा है वो ? अपनों से? ज़माने से? या मुझ से? क्या मैं अपनों में नहीं आती? उसकी हंसी किसी ने चुरा ली है  लाख कोशिशें भी नाकामियाब हैं  उसे हर बात पे गुस्सा आता है ! अब तो और कम बोलता है वो  रिवाज़ों में बंधा है सो साथ है  अकेलेपन से भी घबराहट है ! इसीलिए भी शायद साथ है  मगर ये ग़ुस्सा? ज़माने भर से है ! उम्मीद ही दिलासा दिलाता है  इस ग़ुस्से का कोई तो इलाज हो !!! ~ फ़िज़ा 

प्रकृति का नियम

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  शाक से टूट गिरी ज़मीन पर  सब नया डगर अनजान मगर  दुनिया देखने का ये अवसर  मिलता नहीं शाक से जुड़कर ! सूखे पत्तों के ढेर में और भी थे  जो अनजान सही लगे अपने थे  खुली आँखों से हकीकत देखा   जीना असल में तभी तो सीखा ! प्रकृति का तो नियम स्वंतंत्र है जकड़े हैं सामाजिक मानदंड से  आडम्बर और खोकली दुनिया में  तभी तो हम इंसान कहलाये हैं ! ज़िन्दगी की बागडोर अलग है  परिचित हैं मगर जाना अलग है  हर कोई अपने में भी अलग है  विभिन्नता को एक सा क्यों देखें? ~ फ़िज़ा 

सहानुभूति !!!

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  ज़िन्दगी के चंद हसीन पल ज़िन्दगी बनाने में सफल हैं  वर्ना यहाँ आये दिन तीखे शब्दों के बाण क्या कम हैं? शुक्र है चंद ऐसे भी हैं जो न जानते हुए भी समझते हैं  वर्ना हर कोई अपनी अपेक्षाओं की थाली परोसे हैं ! कहाँ मिलते हैं लोग जो "मैं" को छोड़कर आप में बसे  यहाँ तो हर कोई खुदी में खुदा बना नज़र आता है ! जग से हर किसी को उठना है एक न एक दिन 'फ़िज़ा'  यहाँ इंसान एक दूसरे की नज़रों से ही उठा जा रहा है ! रेहम! दोस्तों ऐसे भी हैं जो अंदर ही अंदर कूटते हैं  कुछ सहानुभूति के अल्फ़ाज़ नहीं तो इशारा ही दे दें ! ~ फ़िज़ा 

खुदगर्ज़ मन

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  आजकल मन बड़ा खुदगर्ज़ हो चला है  अकेले-अकेले में रहने को कह रहा है  फूल-पत्तियों में मन रमाने को कह रहा है  आजकल मन बड़ा खुदगर्ज़ हो चला है ! कुछ करने का हौसला बड़ा जगा रहा है  जीवन का नया पन्ना खोलने को कह रहा है  आजकल मन बड़ा खुदगर्ज़ हो चला है ! समझा रहा है बेड़ियाँ तो सब को हैं मगर  बेड़ियों की फ़िक्र क्यों जीने से रोके मगर  आजकल मन बड़ा खुदगर्ज़ हो चला है ! पंछी सा है मन रहता है इंसानी शरीर में  कैसा ताल-मेल है ये उड़ चलने को केहता है  आजकल मन बड़ा खुदगर्ज़ हो चला है ! घूमना चाहता है दुनिया सारी बेफिक्र होके  जाना सभी ने अलग-अलग फिर क्या रोके? आजकल मन बड़ा खुदगर्ज़ हो चला है ! मोह-माया के जाल में न धसना केहता है  जाना ही है तो मन की इच्छा पूरी करता जा  आजकल मन बड़ा खुदगर्ज़ हो चला है ! तू अपनी मर्ज़ी की करता जा खुश रह जा  दुनिया कहाँ सोचेगी जो तू दुनिया की सोचे है  आजकल मन बड़ा खुदगर्ज़ हो चला है ! अब मैंने भी मन से मन जोड़ लिया है  खुश, आज़ाद रेहने का फैसला कर लिया है  आजकल मन ही नहीं मैं भी खुदगर्ज़ हो चला हूँ !! ~ फ़िज़...

इंसान

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  ज़िन्दगी कभी तृप्त लगती है  लगता है निकल जाना चाहिए  कहते हैं न जब सुर बना रहे  तभी गाना गाना बंद करना  ताके यादें अच्छी रहे हमेशा ! ज़िन्दगी कभी बेकार सी लगती है  लगता है निकल ही जाना चाहिए  किसी को किसी की ज़रुरत नहीं  जीने की अब कोई इच्छा भी नहीं  निकल गए तो सब खुश तो होंगे चलो अच्छा था अब चला गया ! क्यों सोचता है इंसान ऐसा ? जो न ग़म, ख़ुशी में समझे फर्क  और एग्जिट की ही सोचे हर वक़्त  क्यों उस किनारे की तलाश करे  जो समंदर के उस पार सी हो  दिखाई न दे क्षितिजहिन दिशाहीन !! ~ फ़िज़ा 

थोड़ा प्यार !

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  ज़िन्दगी भोजन के इर्द-गिर्द है  हर कोई रोजी-रोटी के लिए  मारा-मारा फिरता है शहर -शहर  ख़ुशी मनाता है तब भी भोजन से  त्यौहार मनाता है तब भी भोजन से  जीने के किये चाहिए भी भोजन और थोड़ा प्यार ! कब इस अधिकार और शक्ति की  ज़रुरत ज़िन्दगी में आ धमकी  के , इंसान एक-दूसरे से लड़ते रेह गया  कितने की ज़रुरत थी और देखो  कितना कुछ कर गया इंसान , इस अधिकार के जतन में वो  हैवान बन गया !!! ~ फ़िज़ा 

मोहब्बत

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  तेल अवीव शहर के एक छोटे से बाजार से  गुज़रते हुए इस बेंच पर नज़र पड़ी  दिल से भरे इस बेंच को देख ख़ुशी हुई  तभी किसी ने कहा, - देखा है उस आदमी को तुमने? वो लोगों के दिल मिलाता है खुशियां बांटता है ! ये सुनकर सब हंस पड़े के टिंडर और शादी डॉट कॉम  के होते  हुए आज के युग में ये सब? मगर ये सच है इस शहर की दास्ताँ  जहाँ एक आदमी लोगों के दिल जोड़ता है ! ~ फ़िज़ा 

चैरिटी का चादर

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 चैरिटी का नाम कुछ इस तरह  इस्तेमाल करते हैं हर जगह  मानों कोई एहसान जिस तरह  मदत की उम्मीद करते है कभी  दिलदार समझ कर ही आते हैं  देने वाले का गुरुर जब देखते है  चैरिटी का ओढ़ा चादर उससे  निकलकर नंगा कर देता है  कभी पैसा अँधा करता है हर कहीं पैसे का शोशा है  अमीर गरीब का खेला है ! ~ फ़िज़ा 

सहनशीलता !

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दिन का चैन खो गया कहीं  तो रातों की नींद घूम है कहीं  कहीं से रोशनी की उम्मीद है  तो सिर्फ अन्धकार की बातें हैं  कोई सूरत तो नज़र आये कहीं  कोई रास्ता हो जहाँ उम्मीद हो  दुआ न दवा से सिर्फ दिमाग से  हम-तुम इंटरनेट से साथ निभाएं  मगर घर से बहार न निकालें अब  घर पर रहकर पूरी करें दिनचर्या  कुछ सालों के लिए रहे दूर-दूर  शायद फिर वो दिन भी आये जब  गले-मिलकर मस्तियाँ करें सब  किन्तु अब संयम और सावधानी  इनका ही उपयोग करें हम सब  चलो कुछ धैर्य भी साथ रखते हैं  कुछ अपने लिए कुछ औरों के लिए  नमन! ~ फ़िज़ा   

करुणा

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  आज कहने को सुनने को  क्या रहा जब खबर सब  एक जैसी ही आ रही हो  जहाँ युद्ध में योद्धा लड़ते  आज हर कोई सैनिक बन  एक-दूसरे को सहारा दे रहा  वीर हैं वो जो अपना नहीं पर  कोविद-ग्रस्त मरीज़ों का सोचें  रिश्तेदारों को हटाकर खुद ही  क्रियाकर्म कर उनको विधि से  मुक्त कर रहे हैं  लड़खड़ाते हैं मेरे लफ्ज़ आज  इंसानियत और हैवानियत को  मुकाबला करते देख ! ~ फ़िज़ा 

आँखों ही आँखों से

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  आँखों ही आँखों से मिले थे  दूर-दूर ही थे मगर हर पल  नज़रों से होते रहे नज़दीक  संकोच झुकती नज़रों से  हौसलों से देखती वो नज़रें  कहीं तो एक चिंगारी जली  आँखों के रस्ते प्यार हो गया  देखो तो एक सपना सा लगा  क्यूंकि कोवीड के होते ये सब  मुनासिब ही नहीं नामुमकिन था  लेकिन हमने चेहरे नहीं आँखों से  दिल की गहराइयों को जाना  और आँखों ने सहमति दी कहा हाँ, मुझे प्यार है तुमसे  दूर थे मगर दिल से जुदा नहीं ! ~ फ़िज़ा 

बचा लो ...!

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  हम सब भिन्न-भिन्न प्राणी हैं जगत में  और भिन्न-भिन्न हैं वस्त्र कुछ पहनते  भिन्न-भिन्न है हमारा भोजन और पसंद  जो भी हो सबकुछ मिल जाता हैं यहाँ  भिन्नता कभी नज़दीक तो दूर करती है  हम ये भी भूल जातें हैं के हम कर्ज़दार हैं  फिर भी स्वार्थी और मनमानी करते हैं  काश! हम ये समझते  एक पृथ्वी ही है हमारे बीच जो आम है  क्या उसे हम मिलकर बचा सकते? ~ फ़िज़ा 

ज़िंदा हो इसीलिए नया साल मुबारक ही समझना

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  हर साल आता है साल नया  हर पुराने साल को करने विदा  हर गुज़रे साल से सीखते नया  मगर होता तो नहीं कुछ भी नया  ये साल बहुत कुछ हमें सीखा गया  क्या चाहिए और कितना बता गया  रोज़ मिले या न मिलें हम दोस्तों से  दिखा दिया कौन अपना और पराया  पैसों की ज़रुरत कम इंसान काम आया  घर की दाल-रोटी आम का अचार भला   स्वस्थ और स्वादिष्ट खाना सीखा गया  ज़रुरत तो वैसे कुछ भी नहीं जीने के लिए  वक्त ने इंसान को फिर किसान बना दिया  बगीचों में टमाटर धन्या अब उगने लगा  रोज़ परिवार संग बैठकर योजना बनाने लगा  छोटे से बड़ा घर का उत्तरदायी होने लगा  कंपनियों को समझ आने लगा निष्ठावान का  घर से हो या बगीचे से काम तो होने लगा  वक्त के साथ स्वस्थ्य पर निगरानी रखने लगा  इंसान आखिर इंसान पर भरोसा करने लगा  ज़िन्दगी देता इंसान तो वही लेता भी जान  मास्क न पहन गैर जिम्मेदार पार्टियां करने लगा  अपना न सही मगर औरों को खतरे में डालने लगा  बात भी सही है अब तो वज़न कम करो अपना  कुछ न कुछ करो पृथ्वी पर न बन...