उम्मीदों से भरा...
महीना अगस्त का मानों उम्मीदों से भरा शिकस्त चाहे उस या फिर इस पार ज़रा वैसे भी कलियों के आने से खुश है गुलदान फूल खिले न न खिले उम्मीद रहती है बनी हादसे कई हो जाते हैं फिर भी आँधिंयों से लड़कर भी वृक्ष नहीं हटते अपनी जड़ों से कली को देख उम्मीद तो है गुलाब का रंग खिलकर बदल जाए तो क्या उम्मीद तो है कम से कम ! ~ फ़िज़ा