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शिक्षा : सबसे बड़ा अस्त्र

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  कलम की स्याही से सभ्यताएँ जन्म लेती हैं, ज्ञान से राष्ट्र बनते हैं, और शिक्षा ही वह प्रकाश है जो जीवन की हर राह को रोशन करता है। मैं उस भारत की बेटी हूँ, जिसकी शिक्षा ने मुझे कनाडा और अमेरिका तक पहुँचने का साहस और सम्मान दिया। आज जो कुछ भी हूँ, उसमें मेरे गुरुओं, मेरे विद्यालयों और भारतीय शिक्षा की अमूल्य देन है। पर आज मन व्यथित है। जब विद्यार्थी अपने अधिकार—शिक्षा—के लिए सड़कों पर उतरते हैं, जब विद्यालयों के बंद होने की खबरें आती हैं, और जब एक बेटी को शिक्षा के लिए अपना जीवन गंवाना पड़ता है, तो यह केवल एक परिवार का नहीं, पूरे राष्ट्र का दर्द बन जाता है। याद रखिए... सबसे बड़ा अस्त्र न सत्ता है, न शस्त्र। सबसे बड़ा अस्त्र है— शिक्षा। यही एक बच्चे को गाँव से दुनिया तक पहुँचा सकती है। मैं उन सभी विद्यार्थियों के साथ खड़ी हूँ जो शिक्षा व्यवस्था में सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही की माँग कर रहे हैं। आज भी दिनकर की हुंकार उतनी ही प्रासंगिक है— "सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।" आइए, हर बच्चे का शिक्षा का अधिकार सुरक्षित करें, क्योंकि जब हर हाथ में किताब होगी, तभी हर राष्ट्र सच में...

हिंसा नहीं आवाज़ से विरोध करते हैं !

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सहने को तो लोग यूँ भी दर्द सहते हैं एक हद्द से ज्यादा हो तो काट देते हैं  इलाज़ भी देखिये कभी ऐसा होता है ! जुल्म का आलम देखिए कैसा होता है  सहते तो सब हैं मगर उसकी भी हद्द है  हिंसा नहीं आवाज़ से विरोध करते हैं ! जानें, शासन करने वाला भी इंसान हैं  शासन में लाने वाला भी इंसान ही है  देखिये,एकता में सत्ता पलटने की ताक़त है ! अनपढ़ शासक अन्धविश्वास जैसा है  सच को छुपाना और सब बहकावा है  पढ़े-लिखे बेहके दुःख इसी बात का है ! वक़्त आगया अब एकजुट हो जाना है  खुली आँख है मगर हकीकत दिखाना है  खाली करो सिंहासन जनता को जगाना है ! इंसान बनकर इंसान को शासन करना है  जब शासक ही शोषण करें तो डटना है  निडरता से आज़ादी का नारा लगाना है ! हम देखेंगे किसका पलड़ा अभी भारी है  क्रांति भी क्या इसी विरोध का चेहरा है  अब बहुत हुआ, शासन नए नस्ल की है  नयी सोच से सबका भला होना है ! ~ फ़िज़ा

जाग उठ कहीं बहुत देर न हो जाये

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कौन हैं हम कहाँ से आये हैं  क्या लेकर आये हैं साथ हम  जो आया है वो जायेगा भी  न कुछ तेरा है न ही कुछ मेरा  किस हक़ से मैं लूँ ये जगह  दिया नहीं मुझे किसी ने ये  कौन हूँ मैं तुझे हटाऊँ यहाँ से  जब ये धरती है हर किसी की  न सूरज न चाँद बांटे आसमां  न पेड़-पौधे न पशु-पक्षियां  सभी रहते  मिल-जुलकर  फिर हम इंसान को क्या हुआ ? जो अधिकार जताने लगे यहाँ  धर्म के नाम पर तो देश के नाम  कहाँ से आये कहाँ ले जाएंगे सब  इंसान कब आएगा इंसान के काम  कब वो करेगा एक दूसरे से प्यार  कब वो समझेगा अपनी सीमाएं  इंसान कब करेगा इंसान से प्यार  छोड़कर नफरत की दहशत की  फितरत ये इंसान की अहंकार की   खुद से खुदा हो जाने की ग़लतियाँ  जाग उठ कहीं बहुत देर न हो जाये  के पछताने के लिए भी न रहे समां ! ~ फ़िज़ा 

ऐसा कहता है इतिहास हमारा

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देश की एक सुन्दर छबि मन में थी बचपन से कभी कविताओं में तो उपन्यासों में पढ़े आज़ादी के किस्से मतवाले शहीदों की दिलेरी एक-दूसरे का दर्द मानों सारा जहाँ एक परिवार हो सुनहरे सपनों सा सुन्दर चित्रण हुआ करता कभी किसी किताबों में ऐसा कहता है इतिहास हमारा जाने क्या हो गया उस देश को हमारा पहले जैसा कुछ भी नहीं है बेचारा न वो देशभक्ति न ही वो भाईचारा हर कोई एक-दूसरे के खून का प्यासा धर्मनिरपेक्ष राज्य था कभी ये प्यारा अब हिन्दू - मुसलमान जान का मारा न रहीं वो गलियां गुलजारा जहाँ करते थे बच्चे खेला कभी अमवा की वो डाली जिस पर करती कोयल सबसे मधुबानी अब तो वो दूकान भी नहीं हैं जहाँ चाचा मुफ्त में दे दे गोली दो-चार बहुत दुःख हुआ ये देख हर तरफ मॉल, फ़ास्ट फ़ूड और विदेशी सामान अब तो अपने देश में भी न मिले देश की वो पहचान !!! ~ फ़िज़ा

खुश हूँ! चंद दोस्त हैं अब रह गए इस तरह...!!!

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मैं देखती हूँ इन नज़ारों को कुछ इस तरह  मानो मुंह दिखाई का रस्म हो जिस तरह  हर चीज़, जगह बदल चुकी है इस तरह  मानों जैसे मौसम बदलता हो किसी तरह  हर सेहर और पहर घूरतीं हैं मुझे इस तरह  मानों अजनबी हूँ इस शहर में किसी तरह !! खुश हूँ! चंद दोस्त हैं अब रह गए इस तरह  याद दिलातें हैं बचपन के खुशबु की तरह मस्ती और उनकी हस्ती सुनहरी धुप की तरह वो अब भी नहीं बदले गुज़रे वक़्र्त की तरह    हँसी की कल-कल बहती जल की धारा यही महसूस होता है ज़िंदा हैं हम इस तरह !!    ~ फ़िज़ा 

गणतंत्र दिवस की सुबह ...

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गणतंत्र दिवस की सुबह  का बेसब्री से इंतज़ार  बचपन हो या अब  साज और सोज़ वही  जस्बा देश-भक्ति का  जवानों की टोली  सीना चौड़ा कर  देश के चोरों को  सलामी देते हुए  अश्रु भर आते हैं  नयनों में के जानकार भी  चोरों की सत्ता है  जवान देश के लिए जाँ  कुर्बान करता है  दिल भर आता है  ये आँख बंद करके  कूद पड़ते हैं  ऐसी देश-भक्ति  को मेरा शत-शत प्रणाम  गणतंत्र दिवस एक  आँखों में नमी का एहसास  बहुत देर तक रेह जाती है   मन भावुक हो जाता है  शहीदों को सलाम  मेरे देश के सेनाओं को  सलाम! ~ फ़िज़ा