Wednesday, February 15, 2017

एक चेहरा ऐसा भी था भीड़ में ...

चेहरा खिला गुलाब सा 
आँखें पुरनम सी हरदम 
उसकी हँसी में वो बांकपन 
उसकी खिलखिलाती हंसी 
सिर्फ एक ज़िन्दगी की आस
एक वो लम्हा हंस के मर जाने की 
तो जी उठने की वो लालसा फिर से 
दुनिया जीती थी उसकी इस अदा पे 
वो जो किसी को जीना सीखा दे 
उसका भी एक अक्स था छिपा सा 
जो शायद कोई देख न पाया 
या जीने की आस में सोच नहीं पाया ?
खिले चेहरे के पीछे एक हकीकत थी
उसकी आँखों में हमेशा एक नमीं थी
उसकी हंसी के पीछे एक राज़ था 
उसकी खिलखिलाहट में दर्द था 
जो सिर्फ जूझ रही थी जीने के लिए 
वो जो पल में जीकर मरजाने के लिए
हतेली पर लिए ज़िन्दगी चली थी कभी 
आज भी है उसकी वही लड़ाई ज़ारी
कर औरों को बुलंद इसी में रह गयी 
सोच न सकी कभी अपनी भलाई 
एक चेहरा ऐसा भी था भीड़ में 
जो कभी नहीं मुरझाई !

~ फ़िज़ा 

Tuesday, January 17, 2017

मुझको रोकने वालों ये बात कहनी थी तुमसे ...


मुझको रोकने वालों ये बात कहनी थी तुमसे 
बढ़ावा न दे सको तो न सही मज़ाक न बनो !
किसी की सबरी और बेसब्री तुम क्या जानो 
कभी सबर कर सको औरों की तरह तो जानो !
झोली हर कोई भरता है अपनी गोदामों की तरह 
धान्य सिर्फ गोदामों में रहे तो किस काम आये?
अपने पालतू सब होते हैं चाहे ग़लत हो या सही 
साथ भी तब तक देंगे जब तक गद्दी आपकी रही !
वक़्त नहीं लगता शीशे के महलों को ढेर होते - होते 
कदम जब भी रखो तो आहिस्ता-आहिस्ता से रखिये !
मुझको रोकने वालों ये बात कहनी थी तुमसे
वक़्त मेरा भी आएगा! हाँ, तब बात होती है तुमसे ;) 

~ फ़िज़ा