Saturday, October 06, 2018

किस्सा रोटी का

कण- कण जो दिखे सुनेहरा
कंचन फैला खेतों में लेहरा
दाना चुनकर गोदाम भरा
घर पहुंचा बोरियों में भरा
घर से चक्की तक सफर हमारा
पलभर का साथ है हमारा
आटा बनकर थैले में भरा
घर आते ही आटे को गुंधा
तेल, नमक, पानी से घुंधा
मसल कर अच्छे से गुंधा
मखमली होते ही उसे बेला
बेलकर गोल चाँद जैसा
तवे में ऐसा सेखा प्यार से
दुलार से वो भी फुल्के आया
कहते हैं जिसको यहाँ रोटी,
या फिर कोई कहे इसे फुल्का
गरम तवे में झुलसकर मानों 
और भी खूबसूरत बने ये न्यारा 
भीनी-भीनी खुशबु रोटी की
पेट में जाते ही स्वर्ग दिखाए
जिसे खेतों में बोया किसान ने
रोटी से उसने भरा पेट हमारा
देश हो या विदेश में फिरना
रोटी जैसा नहीं जीवन में दूसरा 
~ फ़िज़ा 

Sunday, September 30, 2018

जीने के लिए प्यार ही काफी है


जीने के लिए प्यार ही काफी है
ज़माने में ऐसा,ज़रा कम मानते हैं
इंसान को इंसान नहीं पैसों से मतलब है
फिर चाहे वो चिकित्सक हो या रोगी
हर कोई लूटने और लुटने को है तैयार
सिर्फ एक पल की ज़िन्दगी के लिए 
आराम और दर्दहीन होने के लिए
जीवन मूल्य चुकाने को होते हैं तैयार
भूल जाते हैं क्या चाहिए क्यों चाहिए
तब तक, जब तक मौत खड़ी न हो सामने
सुबह की शाम होने पर जैसे लौट आते हैं -इंसान
इंसान को चाहिए इंसान का प्यार और उसका साथ !

~ फ़िज़ा

Sunday, September 23, 2018

भेद-भाव का न हो कहीं संगम !






कविता पढ़ने -सुनने की नहीं है
इसे पहनो, पहनाने की ज़रुरत है
वक्त बे वक्त बरसों से ज़माने में हैं
महाकवि से लेकर राष्ट्र कवी तक हैं
देश के नागरिकों को जागरूक करते हैं
वीर रस की कवितायेँ लिखते हैं
इंसान को इंसान होने का एहसास दिलाते हैं
जाग मनुष्य तू किस लिए बना है ?
कीड़े-मकोड़ों सा जी-मरकर चले जाना है?
या अपनी मनुष्य जाती का मूल्य बचाना है ?
अरे! तू जाग अभी, वर्ना बहुत देर हो जाना है
लोगों के आँखों में धूल झोंकने का समां है
पुरानी रीती-रिवाज़ों को लेकर आना है
फिर वही 'बांटों और राज़' करो की भाषा है
हर पीढ़ी हर इंसान भुगत चूका है
हर कमज़ोर हर अनुगामी भुगतरहा है
तुम धैर्य का पथ पकड़ो और सवाल करो
क्यों इंसान - इंसान में भेद-भाव है
क्यों जाती-पाँति का रट आज भी है ?
क्यों धर्म की बातों से अधर्म का काम करते हैं
क्यों इंसानी रिश्तों में खून का रंग भरते हैं
अमन-शान्ति को क्यों नफरत से देखते हैं?
क्यों आखिर, इंसान सोचता नहीं?
क्यों इतिहास हमेशा दोहराता है?
क्यों न तुम आज तमन्नाओं को जगाओ
हर इतिहास को पलट कर नया ज़माना रचाओ
हर कोई इंसान और इंसानियत का हो धर्म
हर किसी के हिस्से में उसकी अपनी रोटी हो
अपना घर हो सबके लिए एक हो नियम
भेद-भाव का न हो कहीं संगम
ऐसा भी एक राष्ट्र हो जो ख्वाबों से उतरकर
आ जाएँ हकीकत में, जीवन के सरोवर में
इंसान कभी तो इंसान बन के जियो !!!

फ़िज़ा

Wednesday, September 05, 2018

मैं ज़िंदा हूँ शायद अभी कहीं से

 
मैं ज़िंदा हूँ शायद अभी कहीं से
के हर अन्याय और अत्याचार से
पसीजता है ये दिल कहीं अंदर से
कुछ न कर पाने की ये अवस्था से
जब देखते हैं नित-दिन अखबार से
सोशल-मीडिया भरा कारनामों से
गरीब वहीं आज भी बिलखते से
ज़िन्दगी इसके आगे नहीं कुछ जैसे
सेहता है अन्याय ऐसे मज़बूरी से
और अमीर वहीं अपने आडम्बरों से
पैसों से और उसके भोगियों से
नितदिन अत्याचार आम इंसान से
कभी तो अच्छे दिन के ख्वाब ही से
बड़ी-बड़ी बातों के ढखोसलों से
जी रहा कराह रहा काट रहा ऐसे
ज़िन्दगी एक ज़िम्मेदारी हो जैसे
इनकी बात आखिर कोई सुने कैसे ?

~ फ़िज़ा

Tuesday, August 28, 2018

जाग इंसान क्यों दीवाना बना ...!



सुना था जानवर से इंसान बना
मगर हरकतों से जानवर ही रहा  !
इंसान बनकर कुछ अकल्मन्द बना
मगर जात -पात  में घिरा रहा  !
वक़्त बे-वक़्त इंसान ज़रुरत बना
 
वहीं इंसान के जान का प्यासा रहा !
इंसान शक्तिशाली बलिष्ट बना
वहीं जानवर से भी नीचे जा रहा !
समय कुछ इस तरह है अब बना
जानवर से सीखना यही उपाय रहा !
यही तो आदिमानव से इंसान बना
फिर क्यों भूतकाल में बस रहा?
जाग इंसान क्यों दीवाना बना
वक़त सींचने का जब आ रहा !

~ फ़िज़ा

Thursday, August 16, 2018

कहीं आग तो कहीं है पानी ...!


कहीं आग तो कहीं है पानी
प्रकृति की कैसी ये मनमानी
हर क़स्बा, प्रांत है वीरानी
फैला हर तरफ पानी ही पानी
कहीं लगी आग जंगल में रानी
वहीं चाहिए बस थोड़ा सा पानी
मगर प्रकृति की वही मनमानी
संतुलन रहे पर ये है ज़िंदगानी
कहीं लगी है आग तो कहीं पानी 
दुआ करें बस ख़त्म हो ये अनहोनी
कभी नहीं देखी-सुनी ऐसी कहानी
कहीं आग तो कहीं है पानी
प्रकृति की कैसी ये मनमानी !

~ फ़िज़ा

Wednesday, August 15, 2018

ऐसा कहता है इतिहास हमारा

देश की एक सुन्दर छबि
मन में थी बचपन से कभी
कविताओं में तो उपन्यासों में
पढ़े आज़ादी के किस्से मतवाले
शहीदों की दिलेरी एक-दूसरे का दर्द
मानों सारा जहाँ एक परिवार हो
सुनहरे सपनों सा सुन्दर चित्रण
हुआ करता कभी किसी किताबों में
ऐसा कहता है इतिहास हमारा
जाने क्या हो गया उस देश को हमारा
पहले जैसा कुछ भी नहीं है बेचारा
न वो देशभक्ति न ही वो भाईचारा
हर कोई एक-दूसरे के खून का प्यासा
धर्मनिरपेक्ष राज्य था कभी ये प्यारा
अब हिन्दू - मुसलमान जान का मारा
न रहीं वो गलियां गुलजारा
जहाँ करते थे बच्चे खेला कभी
अमवा की वो डाली जिस पर
करती कोयल सबसे मधुबानी
अब तो वो दूकान भी नहीं हैं
जहाँ चाचा मुफ्त में दे दे गोली दो-चार
बहुत दुःख हुआ ये देख हर तरफ
मॉल, फ़ास्ट फ़ूड और विदेशी सामान
अब तो अपने देश में भी न मिले
देश की वो पहचान !!!

~ फ़िज़ा


Sunday, July 01, 2018

गर्मी वाली दोपहर...!


ऐसी ही गर्मी वाली दोपहर थी वो
हर तरफ सूखा पानी को तरसता हुआ
दसवीं कक्षा का आखिरी पेपर वाला दिन
बोर्ड की परीक्षा पढ़ाई सबसे परेशान बच्चे
मानसिक तौर से थके -हारे दसवीं के विद्यार्थी
पेपर के ख़त्म होते ही घर का रास्ता नापा
न आंव देखा न तांव देखा साइकिल पे सवार
घर पहुँचते ही माँ ने गरम-गरम खाना परोसा
भरपेट भोजन के बाद नींद अंगड़ाई लेने लगी
गर्मी के दिन की वो नींद भी क्या गज़ब की थी
बाहर तपती ज़मीन, आँखों में चुभते सूरज की लौ
घर के अंदर पंखे की ठंडी हवा की थपथपाहट
और पंखें की आवाज़ मानो लोरी लगे कानों को
एकाध बीच में कंकड़ों की आवाज़ जो की
कच्चे आमों से लगकर ज़मीन पर गिरती
मानो अकेलेपन को बिल्कुल ख़त्म करती
सुहाने सपने लम्बी गहरी नींद की लहरें
अचानक दोस्तों की टोली टपकती
पानी के छींटें बस नाक में दम था
आये थे बुलाने डैम में चलो नहाने
गर्मी का मौसम और ठन्डे पानी में तैरना
सोचकर उठा जाते-जाते बोल गया
'अभी आता हूँ अम्मा ' कहकर चला गया
फिर जब वो आया तो कफ़न ओढ़कर आया
अव्वल नंबर का तैराक था वो फिर क्या हुआ?
शायद बुलावा आगया परीक्षा जो ख़त्म हुआ
महीनो बाद रिजल्ट आया बहनों ने जाकर देखा
मुन्ना अव्वल दर्जे में पास हुआ था
काश, वो दोपहर ऐसे न होता तो
आज कैसा होता ?

~ फ़िज़ा

Tuesday, June 26, 2018

भयादोहन !



उसने सोचा नहीं था
ग़लती से पैर रखा था
निकालने से पहले उसने
नीचे खींच लिया था
सोचने में उसे अपनी
ग़लती लगी!
जिसका फायदा उसने
भी उठा लिया था
हर बात पर धमकाना
हर तरह का डर बसा देना
जब तंग आकर निडर हुई
तो और बातों से डराना
साल गुज़र गए लगा जैसे
ज़िन्दगी फँस सी गयी
जो भी हुआ
आज सांस लेने में
खुलासा हुआ !

~ फ़िज़ा

Saturday, June 16, 2018

हर उड़ान पर दी थप-थपाई...

दुआओं से मांगकर लाये
ज़मीन पर मुझे इस कदर
प्यार से सींचा निहारकर
भेद-भाव नहीं जीवनभर
हर ख्वाइश की पूरी खुलकर
उड़ने दिया हर पल पंछी बनकर
हलकी सी आंच आये तो फ़िक्र
ग़म को न होने दिया ज़ाहिर
हर उड़ान पर दी थप-थपाई
बढ़ाया हमेशा हौसला रहे कठोर  
उम्र का नहीं होने दिया एहसास
हर पल खैरियत पुछा मुस्कुराकर
ज़िन्दगी माली की तरह बिता दी
पिता ने बच्चों को सींच-सींचकर
बच्चे भी कितने खुदगर्ज निकले  
सोचते हैं काश! होते बच्चे अब तक !

~ फ़िज़ा

मोमबत्तियाँ...!



दूसरों को रौशनी देते हुए
पिघलती हैं मोमबत्तियां
कभी सोचा है, क्या गुज़रती है
क्या सोचती है ये मोमबत्तियाँ?
जल तो परवाना भी जाता है
शम्मा के पास जाते-जाते 
मगर मोमबत्ती रौशनी देते-देते 
खुद फ़ना हो जाती है
ज़िन्दगी कुछ लोगों की
सिर्फ मोमबत्ती बनकर
रेहा जाती है !
~ फ़िज़ा

किस्सा रोटी का

  कण- कण जो दिखे सुनेहरा कंचन फैला खेतों में लेहरा दाना चुनकर गोदाम भरा घर पहुंचा बोरियों में भरा घर से चक्की तक सफर हमारा पलभर का साथ है...