Sunday, June 14, 2020

जीवन तो है चलने का नाम ...!



जीवन है चलने का नाम 
देते यही सबक और धाम  
कुछ लक्ष्य जीवन के नाम 
रख देते हैं समाज में पैगाम 
चंद गंभीरता से पहुँचते मुकाम 
मगर ज़िन्दगी के ख़ुशी के नाम 
कर देते अपने  आप को कुर्बान 
ज़िन्दगी इतनी सस्ती और कम 
कब हुई दोस्तों ऐसे सरे आम 
जीवन तो है चलने का नाम 

~ फ़िज़ा 
#shradhanjali #sushantsignrajput #manasikavasaad #mentalillness #depression #seekhelp

Sunday, June 07, 2020

इंसान नहीं न तू बना?



जातिवाद क्या है ये इस कदर अज्ञात था 
प्राथमिक कक्षा में रंगभेद तो पढ़ाया गया 
मगर तब उसे औरों की परेशानी बताया 
विशेषाधिकार में जीते हैं बहुत कम जानते हैं
शायद इसी वजह से जातिवाद, अस्पृश्यता 
एक कहानी, एक खबर और एक सबक 
जो पाठशाला में सभी को पढ़ाया जाता है 
कितने इन कहानियों से हकीकत को समझते ?
इसका तो कोई भी अनुमान नहीं लगाया 
मगर परीक्षा में अंक सभी को अव्वल मिला 
पढ़-लिखकर विद्वान तो बने मगर इंसान नहीं 
भेद-भाव के लिए कुछ नहीं तो कारण कई ढूंढे
रंग-भेद , तो जातिवाद, तो कभी धर्म-भेद 
जब इन सब से दिल भर जाए सभी का तो 
लैंगिक भिन्नता को ही एक खिलौना बना दिया 
सबसे अधिक अकल्मन्द ये कैसा तू बन गया ?
सबकुछ बन गया, बहुत कुछ कमा लिया मगर 
इंसान नहीं न तू बना? इंसान नहीं तू बना!

~ फ़िज़ा 
#blacklivesmatter , #NoJusticeNoPeace, #StopRacism 

Sunday, May 31, 2020

मुझे घुटन हो रही है ..!



मुझे घुटन हो रही है 
मैं सांस नहीं ले पा रहा हूँ 
मुझे तकलीफ हो रही है !
ये सुनकर भी ऐसा क्या 
घृणा और ग़ुस्सा होगा 
उस इंसान में 
जो के अपने घुटने 
उसके गले से बिना हटाए 
ज़ोर लगता रहा 
तब तक 
जब तक
उसकी सांसें 
ख़त्म नहीं होतीं !
मुझे घुटन हो रही है 
ये सब देखकर 
किस ज़माने में हूँ 
मैं !
कहाँ पुरातन काल में 
सुना था बुज़र्गों से 
तो इतिहास की 
कक्षा में और 
ये उम्मीद थी के 
कलयुग में सब कुछ 
अच्छा होगा 
न्याय होगा 
भेदभाव न होगा 
जाती-धर्म का 
बंधन घर तक सिमित होगा 
पर किसी के साथ 
अन्याय न होगा 
आज मुझे घुटन हो रही है 
ये किस ओर मानव-जाती 
बढ़ रही है 
क्यों एक दूसरे के 
खून के प्यासे हो 
चली है !
मेरा दम घुटता है 
ये सोचकर के 
#गेओर्गेफ्लॉयड 
की सांस घोटकर 
उसकी जान ले ली 
और कानून के रक्षक 
ये सब कर रहे थे और 
देख भी रहे थे 
इस अन्याय को!
मेरा दम घुट रहा है 
मेरा दिल टूटा है 
मैं अपने ही नज़रों में 
गिर गया हूँ 
मैं क्या ज़माना दे रहा हूँ 
अपने कल को ?
मेरा दम घुटता है !
मुझे सांसें लेने दो!
मुझे खुली आज़ादी में 
जीने दो !

~ फ़िज़ा 

Saturday, May 23, 2020

बचपन जवानी मिले एक दूसरे से...



मेरा बचपन याद आता है इस जगह 
वही पहाड़ वही वादियां वही राह 
वही पंछी झरना और वही राग 
खुश हो जाता है मन इन्हीं सबसे 
जब बचपन जवानी मिले एक दूसरे से !
कितने अच्छे थे वो दिन सब सादगी में 
जलते सब थे मगर रहते थे अपनी धुन में 
छोटी-मोटी चाह हर किसी के दिल में 
रहते थे अपने दायरे और फासलों में 
थी ही कितनी बड़ी वो दुनिया छोटी सी !
कम में भी एक सुकून सा था जीने का 
फ़िक्र थी भी तो इतना नहीं जीने का 
एक-दूसरे की क़द्र थी दिल से मुहब्बत का 
आजकल आडंबरी हैं अपने और अपनों का 
अपनी हस्ती का बवाल मचा रखा हर तरफ का !

~ फ़िज़ा 

Friday, May 22, 2020

ज़िन्दगी यही है और कुछ भी नहीं...



खुद  में जब कोई खामियां है 
ये जानलो तो लुटा दो सब कुछ 
उन खामियों को बदलने में 
ऐसा ही कुछ हुआ था मेरे संग 
जब टेलीमार्केटिंग में औरों के
मुकाबले मैं कम थी परिश्रम से 
एक अच्छी बिक्री प्रतिनिधि बनी 
जहाँ मेरी नौकरी ४ बजे से ११ थी 
वहीं मुझे दो-तीन और काम मिले 
अब मैं सुबह ८ बजे से ११ बजे तक 
काम ही काम, अलग-अलग उत्पाद 
उत्पाद में विश्वास हो तो काम आसान 
हर उत्पाद बिकने लगा वो भी तादाद में 
शायद मेरे ख्वाब में भी न सोचा हो मैंने 
क्रेडिट कार्ड से लेकर बीमा तो बिजली 
लम्बी दुरी पर फ़ोन करने के पैकेज 
ये चीज़ें कोई खरीदेगा? वो भी फ़ोन पर?
ताज़्ज़ुब की बात है मगर सही कहा है 
दिल से दिल को राह होती है सही में !
एक मजले से दूसरे मजला और फिर 
सारे ऑफिस में मैं जानी-पहचानी हुई 
कई दोस्त बने कई प्रशंसक भी हुए 
कितनों ने दिल दिए और कितने टूटे 
कामियाबी खुशियां लाती हैं मोहब्बत भी 
ज्यादा की उम्मीद तब भी नहीं थी 
ज़िन्दगी ज़िंदादिली का नाम है सो जी लिए 
मन में आस थी भारतीय क्रिकेट देखने कभी 
वो दिन भी आगया टोरंटो स्टार में खबर आयी 
हमने सोच लिया रविवार का मैच ज़रूर देखेंगे 
सोमवार से शनिवार तक का कॉल सेण्टर 
घंटे के प्रति १० डॉलर डूबते को तिनके का सहारा 
उस पर चार उत्पाद को बेचना ८ से रात के ११ 
भारत और पाकिस्तान का मैच सहारा कप 
देखने को मिला और सचिन और अज़हर को 
बैटिंग करते भी देखा जो एक आस थी पूरा हुआ 
आम इंसान और जाने-माने हस्तियों से 
हाथ मिलाकर बातें की और हाल-चाल पूछे 
रवि शास्त्री भी थे इसमें शामिल समीक्षक 
दादा, आज भी मगर एक दृश्य दिल मैं उतरी 
पाकिस्तानी और भारतीय खिलाड़ी एक साथ 
मैच-प्रैक्टिस और कसरत करते हुए मदत करते हुए 
ज़िन्दगी यही है और कुछ भी नहीं सिवाय मुहब्बत के !

~ फ़िज़ा 

Monday, May 18, 2020

मेरा पहला अनुभव था !



ज़िन्दगी अकेले जीने के मज़े अलग हैं 
जहाँ मौज समझते हैं वहीँ मायूसी भी 
लेकिन अगर अपना लक्ष्य साध लो 
फिर कोई तुम्हें नहीं रोक-टोक सकेगा 
मेरा लक्ष्य यहाँ तात्कालिक ठहरना था 
कॉल सेण्टर में सेल्स में ध्यान देना था 
प्रशिक्षण को गंभीरता से लिया और
उत्पाद को बेचना है उसे बेहतर जाना 
उसके फायदे को समझ अपने लिए सोचा 
एक बात अपने बारे में ये तैय थी 
अगर दिल को भा गया उत्पाद तो फिर 
किसी को भी बेचने में मुश्किल नहीं होती 
मैंने इसी तरह दिल से बेचे वो सारे उत्पाद 
जहाँ कभी भी बेचने का हौसला नहीं था 
वहीं दर्जनों के हिसाब से मैंने उत्पाद बेचे 
मेरी नौकरी अजीब थी बेचना काम था 
मगर शाम ४ बजे  ११ बजे तक रात के 
लोगों के घर पहुँचती जहाँ अभी ९ न बजे हों 
दर-दर जाकर सेल्स करते सुना था देखा भी 
मगर फ़ोन पर टेलीमार्केटिंग करते हुए ये 
मेरा पहला अनुभव था !

~ फ़िज़ा 

Thursday, May 14, 2020

समायोजित करलो !


प्रशिक्षण जिस तरह से दिया गया 
उस से लगा कुछ बिक्री करना है 
मेरी परिस्तिथि ऐसी भी नहीं थी  
मना करके निकल जाऊँ वहां से 
कभी-कभी लगता है वो अहंकार है 
मेरे लिए कोई और चारा भी नहीं था 
पढ़ाई यहाँ महंगी है बहुत ये जाना 
नसीब से सीखने मिला सीख लिया 
बात तय थी जहाँ से भी हो सीख लो 
उपयोग हर स्तिथि पर काम आएगा 
दो दिन के कठिन प्रशिक्षण के बाद 
हमसे कहा गया अपनी जान डाल तो 
कॉल सेण्टर में बिक्री करने के लिए 
जब हर कोई हमें राय दे रहे थे के सेल्स 
की नौकरी  करलो अंग्रेजी अच्छी बोलती हो 
तब पसीने छूटते थे, अब भी कम नहीं था 
अब तक ऑफिस के कपड़ों की ज़रुरत नहीं थी 
रेस्टोरेंट में वहां का यूनिफार्म था एप्रन था 
यहाँ तो रोज़ अच्छे सलीके से प्रोफेशनल होना है 
मराठी महिला से हमने अपनी दुविधा कही 
वो हमें लेकर गयी गुडविल की दुकान में 
यहाँ कपडे दान देते हैं फिर उसे बेचा जाता है 
कुछ एकाध कपडे खरीदे दफ्तर के लिए 
इन सब से महिला खुश नहीं थी कुछ 
उन्हें पता नहीं क्यों ऐसा लगा जैसे के 
मैं उनसे ज्यादा कमा लूंगी या कुछ और 
जो भी हो मुझे वहां से जल्दी ही निकलना पड़ा 
महिला ने एक दिन चेतावनी दी अपना घर देख लो 
फिर क्या था वहीं पास में २५ सेंट डेनिस ड्राइव पर 
एक अपार्टमेंट किराये पर ले लिया आठवां मंजिल 
यहाँ मेरी अपनी दुनिया और अपना नियम 
पेहले पहल तो डरती थी क्यूंकि नयी जो थी 
कभी अकेले रही नहीं अब तक यहाँ आकर 
पहले पादरी के घर तो अब मराठी महिला के घर 
इन दोनों को मेरा तेहे -दिल से शुक्रिया 
क्यूंकि आज मैं हर किसी को राय देती हूँ 
रहो तो अकेले वर्ना रूममेट्स के साथ 
समायोजित करलो  !

~ फ़िज़ा 

Wednesday, May 13, 2020

औरत को कौन जान पाया है?


औरत को कौन जान पाया है?
खुद औरत, औरत का न जान पायी 
हर किसी को ये एक देखने और 
छुने की वस्तु मात्र है तभी तो 
हर कोई उसके बाहरी खूबसूरती 
को ही निहारता है या फिर 
नुख्स निकालता है !
औरत को कौन जान पाया है?
खुद औरत, औरत का न जान पायी !
उसके पैदा होने से लेकर 
उसकी खूसबसुरति और नियति 
दोनों का ही भविष्य निर्धारित है 
या तो बहुतों के दिल जलायेगी 
या फिर खुद किसी दिन जल जाएगी !
औरत को कौन जान पाया है?
खुद औरत, औरत का न जान पायी !
उसके लड़कपन पहुँचने तक उसकी 
ज़िन्दगी हॉर्मोन्स की चपेट में आ जाता है 
उसकी खूबसूरती का अनुमान फिर लगाया जाता है 
उसके मुहांसे, उसका कद, उसका शरीर उसके लिए 
एक मापने का यन्त्र बन जाता है 
औरत को कौन जान पाया है?
खुद औरत, औरत का न जान पायी !
लड़कपन से कब जवानी आयी और गयी 
उसके तो हाथ भी पीले कर दिए और 
अब वो दो-चार बच्चों की माँ बन गयी 
तब भी बाहरी खूबसूरती की ही चर्चा रही 
उसके हॉर्मोन्स उसका पीछा नहीं छोड़ पायी 
औरत को कौन जान पाया है?
खुद औरत, औरत का न जान पायी !
उसकी जवानी, उसका अस्तित्व कौन जानें 
सब कुछ तो कोई और तैय करे 
बच्चे बड़े होगये तो क्या उसकी जिम्मेदारी वही
मगर हॉर्मोन्स के खेल अब भी कम नहीं हुए 
वो अब रजोनिवृत्ति के दायरे से गुजरने लगी 
औरत को कौन जान पाया है?
खुद औरत, औरत का न जान पायी !
वो इस तरफ तो कभी उस तरफ संतुलन के 
उसे खुद नहीं खबर उसके मानसिक हाल की 
आज आसमान ऊपर तो पल में नीचे है उसके 
उसकी जवानी के सिर्फ किस्से रेहा जाते हैं 
कभी जवानी में सराहे नहीं बल्कि अब याद दिलाये जाते हैं 
औरत को कौन जान पाया है?
खुद औरत, औरत का न जान पायी ! 
वो खुद भी नहीं जानती उसे क्या हो रहा है 
उसकी मानसिक और शारीरिक यातना 
क्यों बदलती है रोज़ अचानक 
क्यों उसकी उम्र होने पर भी 
उसकी तकलीफों का कोई अंत नहीं 
औरत को कौन जान पाया है?
खुद औरत, औरत का न जान पायी !


~ फ़िज़ा 

Monday, May 11, 2020

ज़िन्दगी में जोखिम तो उठाना पड़ता है ....



मेरे इन सभी प्रयासों और जूझने में 
कभी किसी का भी प्रोत्साहन नहीं था 
हर कोई कहता केशियर की नौकरी
जाने न देना रेस्टोरेंट में खाना तो है 
या तो लोग जो है उसमें खुश हैं
नहीं तो फिर कोशिश से ही डरते हैं 
मेरी मुसीबत मेरी बोरियत तो थी ही 
मगर पढ़ाई करके उसके अनुसार 
नौकरी नहीं तो फिर क्या चुनौती 
क्या नया कुछ सीखना या सीखाना 
ज़िन्दगी दूभर लगने लगी और मायूस 
अपने आपको चुनौती देना जोखिम उठाना 
ज़िन्दगी को रोज़ नए सिरे से महसूस करना 
शायद मेरे लिए ऐसा जोखिम उठाना ज़िन्दगी है 
महिला संग अच्छे - बुरे सब दिन बीते 
फिर वो दिन भी आया जब महिला को 
हमारे भविष्य उन्मुख होने पर नाराज़गी 
कुल मिलाके साढ़े तीन महीनों के बाद 
महिला ने अपना घर देखने के लिए कहा
यहाँ तक की खुद हमें एक जगह ले गयीं 
घर किराये पर लेने के लिए २०० डॉलर दिए 
महिला को यकीन नहीं था हम निकालेंगे 
एक तो नौकरी ऐसी के न्यूनतम तनख्वा 
ऊपर से २०० डॉलर लेकर भाग गए वो 
फ़ोन लगाकर देखा, वहां जाकर देखा 
कुछ नहीं हुआ आज तक नहीं समझे 
महिला ने क्यों हमें जबरदस्ती वहां ले गई 
इन सब बातों से वैसे वैसे ही जी कड़वा था
 इस बीन प्रशिक्षण शुरू हुआ और हमने 
मोवेनपिक को अलविदा कहा,
कुछ लोग मेरे लिए परेशां थे क्या होगा मेरा ?
तो कुछ लोगों को लगा निडर है 
खैर, ज़िन्दगी में जोखिम तो उठाना पड़ता ही है 
वर्ना क्या हासिल होता है ?



~ फ़िज़ा 

Sunday, May 10, 2020

हौसले को हमने डूबने नहीं दिया ...




इन सब के बीच मेरी कोशिश ज़रूर थी 
एक बेहतर नौकरी जहाँ अपने पढाई अनुसार 
जिसे करने में ख़ुशी और सीखने का मौका मिले 
तनख्वा इस तरह के गुज़ारा के बाद थोड़ा बचे 
आखिर ख्वाब देखना कोई बुरी बात तो नहीं !

सौ जगह अलग-अलग बायोडाटा भेजा तब 
सौ जहगों से अस्वीकार की चिट्ठियाँ आतीं 
मगर हार फिर भी नहीं मानी भेजना काम था 
एक दिन एक जगह से बुलावा आया फ़ोन पर 
बात बनी साक्षात्कार हुए सवाल-जवाब देने !

सब ठीक था मगर साक्षात्कारदाता को लगा 
मेरे पास सन्दर्भ कनाडा का नहीं है पर ज़रूरी है 
हमने भी तुनककर कहा कोई नौकरी दे तभी न 
सन्दर्भ की बात कभी तुम भी इसी स्थान पर थे 
एक मौका आप्रवासियों को मिले तो नसीब खुले !

उच्चाधिकारी के साथ साक्षात्कार हुआ हमारा 
बात तो सही हुई हमारी और उनकी मगर फिर 
उच्चदाहिकारी ने कहा ये प्रारंभिक प्रयास होगा 
कुछ साल बाद नयी औदे पर चली जाओगी 
इसीलिए ये नौकरी आपको नहीं दे सकते हम !

सूरज को उगते देखा है हमने अस्त होते भी देखा 
हिम्मत नहीं हारी कहीं बस एक चोर से दूसरे 
बायोडाटा भेजते रहे और दूसरी बार भी हमने 
आशा की किरण मास्टेक कंपनी ने दिखाई 
मुँह तक निवाला आते-आते झट से निकल गया !

ऐसे कई सूर्योदय का अस्त हमने देखा 
मगर जिस तरह सूरज फिर निकल आता है 
उसी तरह हौसले को हमने हमेशा डूबने नहीं दिया 
और नौकरी के पहले प्रशिक्षण का बुलावा आ गया
जहाँ प्रशिक्षण मिला और कॉल सेण्टर की नौकरी भी !

~ फ़िज़ा 

Friday, May 08, 2020

अपनी ज़िन्दगी अपने हाथ



इस बीच थोड़ी मेरी नौकरी की तरफ 
केशियर की ज़िन्दगी नोट गिनना नहीं 
खाना बनाना, झाड़ू लगाना बर्तन धोना 
कई बार लगा इतनी दूर आकर क्या किया 
विकसित देश में सोचा डिग्री काम आएगी 
यहाँ आप्रवासी को पापड़ बेलने पड़ते हैं 
खैर किस्सा एक दिन का ऐसा हुआ
शनिवार का दिन था गर्मी का मौसम 
रेस्टोरेंट में पर्यटकों की भीड़ होती थी  
कमाई भी बहुत हुई थी उस दिन 
हमारे कॅश ट्रे में अमरीकन डॉलर थे  
एक ग्राहक को मदत करते वक़्त 
पीछे से एक हाथ आया कॅश ट्रे पर 
हमने भी उस हाथ को दबोच लिया 
उसने झट हाथ में जितने पैसे आये 
लेकर फरार होने की कोशिश की 
हम कहाँ जाने देते उसे ऐसे पकड़ लिया 
राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में पले -बढे हैं  
यूँही थोड़ी किसी को आसानी से जाने देते 
जोश में पकड़ तो लिया था चोर को पीछे से 
७ फुट का इंसान और उसकी कमीज हमारे हाथ 
हम सिर्फ ५ फुट ४ इंच के मगर जोश कम न था 
बहादुरी से चोर को पकड़ा और उसे छोड़ भी दिया 
ये भारत देश नहीं जहाँ एक लड़की ने चोर को पकड़ा 
तो जनता उसकी मदत करके चोर को सजा दिलाये 
कम से कम भारत में एक वक्त ऐसा था जब हम वहां थे 
खैर चोर को पकड़कर मैनेजर पीटर को बुलाया पर नहीं आये 
तो छोड़ना ही बेहरत समझा क्यूंकि जनता मॉल में 
हमें घेरे तमाशा देख रही थी उस वक़्त 
हमने चोर से कहा जाओ जी लो ज़िन्दगी 
अंदर गए मैनेजर से पुछा आप मदत के लिए नहीं आये 
चोर पैसे लेकर भाग गया आप आते तो शायद बच जाते 
मैनेजर ने नज़रें न मिलाते हुए कहा, मैं काम में बिजी था 
क्या कहें वो तो पास्ता खा रहे थे तब 
ज़माना कुछ अजीब है यहाँ हमें पागल कहा गया 
खैर पुलिस आयी उन्होंने बात की जांच-पड़ताल 
हमारे हाथ में चोर के नाख़ून के निशान थे 
पुलिस ने कहा तुम किस्मतवाली हो बच गयी 
उसके जेब में बन्दूक होती और तुम पर चलती?
उस दिन एक नया सबक सीखा यहाँ 
कुछ भी हो जाये अपनी जान खुद बचानी है 
यहाँ कोई नहीं किसी का अपना अपना रास्ता 
जब घर पहुंची तो पता चला टीवी पर हम थे
एक बहादुर भारतीय लड़की मरते बची ! 

~ फ़िज़ा 

जीवन तो है चलने का नाम ...!

जीवन है चलने का नाम  देते यही सबक और धाम   कुछ लक्ष्य जीवन के नाम  रख देते हैं समाज में पैगाम  चंद गंभीरता से पहुँचते मुकाम  ...