Monday, January 14, 2019

हरियाली फैलाते ये बूँदें...!


ज़मीन पर गिरतीं हैं बूँदें 
जाने कितने ऊंचाइयों से 
कितने सपने संग लिए 
क्या-कुछ देने के लिए 
मचलती छलकाती हुई 
एक से दो, दो से हज़ार 
लड़ियाँ घनघोर बरसते 
कहलाते बरखा रानी 
जो जब झूम के बरसते 
ज़मीन को मोहित करते 
पेड़ों-गलियों में बसकर 
फूलों के गालों को चूमकर 
रसीले भवरों से बचाकर 
जैसे-तैसे गिरकर-संभलकर 
हरियाली फैलाते ये बूँदें 
कभी वर्षा, कभी वृष्टि 
बनकर सामने आते !

~ फ़िज़ा 

Thursday, January 03, 2019

ये सर्दियाँ मुझे बांध रखतीं !


सबकुछ तो अच्छा ही है 
हर तरफ ये हरियाली है 
बस, इन सबको देखूं मैं 
सुकून से और आराम से 
न कहीं जाने की जल्दी 
किसी के आने का भरम 
खाने की सुध नहीं जहाँ 
वक्त के अधीन नहीं वहां 
बस मैं और मेरी तन्हाईयाँ 
सुकून का आलंबन हो जहाँ 
मैं, फ़िज़ा और तुम वहां 
ऐसी कुछ आलस से भरी  
ये सर्दियाँ मुझे बांध रखतीं 
सबकुछ तो अच्छा ही है 
दिल घर-सीमित चाहता है 
छुट्टिंयों के कुछ लक्षण हैं 
कम्बल में सिकुड़ना चाहता है 
सबकुछ तो अच्छा ही है 
अब कुछ आराम चाहता है !

~ फ़िज़ा 

Wednesday, January 02, 2019

हर दिन एक नया चैप्टर हो !




क्या है ये नया साल ?
सब क्यों उतावले हैं ?
क्या कुछ बदल गया ?
क्या बदलने वाले हो ?
वही घिसेपिटे संकल्प दिखाने
के ?
जो कभी होते नहीं
पुरे ?
फिर भी एक लम्बी
सूचि बनती है
हर साल और हर बार
सूचि लंबी होती है
जब सबकुछ कल पर
छोड़ा है तब
नए साल और नया परिवर्तन
का हंगामा क्यों?
बेकार के ढकोसले, बेकार
के सब ड्रामे
बेफिक्र होकर हर पल
को जियें
मोहब्बत करने से न
कतराएं
ख़ुशी हाथ आये न आये,
दें ज़रूर किसी को
न कोई लिस्ट हो
न उसे पूरा करने का
स्ट्रेस हो 
बस हर दिन एक नया
चैप्टर हो !

~ फ़िज़ा

Friday, December 21, 2018

अभी रात ठेहर जाओ !!


ठण्ड ने कुछ यूँ पास सबको जकड रखा है
कम्बलों से जन्मों का नाता बना रखा है
कुछ इस कदर रिश्ता बना है सर्दियों में
ख्यालों में ऊन का मेला नज़र आता हैं
करीब रेहकर कम्बलों में नज़र आता है
उसका स्पर्श गरम बाहों का आसरा है 
ख़याल से गुद -गुदाहट, सुखद अनुभव है
चाँद, दीवाना आज कुछ ठान के आया है
चांदनी रात उसका साथ, फिर ये ठण्ड है
आँखों के सिलसिले कहानियों के ज़रिये है
अयनांत की रात पिया से मिलने जाना है
फ़ज़ाओं थोड़ा थम जाओ, सेहर तुम जाओ
अभी रात ठेहर जाओ !!
~ फ़िज़ा 

Monday, December 10, 2018

दोस्ती !!!


दोस्ती किसे कहते हैं? 
कभी सुना कहानियों में 
तो कभी देखा फिल्मों में 
ज़िन्दगी कई तरह से हमें 
दिखाए और सिखाये सीख 
बचपन के पले बढे साथी 
सालों बाद जब मिले दोस्त 
जस्बे में तो दिखाई दोस्ती 
दोस्ती निभाने में कर गए कंजूसी !
कुछ साल पहले मिले मेले में 
मचाया धुम खाया-पिया मज़े में 
वक़्त आया कुछ खरीदने की 
तो कहा मेरे लिए भी ले लो कुछ 
पैसे बदलकर डॉलर- रुपये में 
किसी ने जैसे कुछ सुना ही नहीं 
हँसते-खेलते तस्वीर खींचाते 
निकल आये मेले से हम दोस्त !
उंगलियां होतीं हैं अलग-अलग 
शायद यही मिसाल ली मैंने 
एक बिना कहे पूरी करे आरज़ू 
बदले में पैसे की बात न करना 
ऐसी धमकी देते हुए खरीद लिया 
दिल सोचते रेहा गया परेशान 
दोस्ती आखिर क्या है?
उम्र के इस दायरे में आकर 
जहाँ ज़िन्दगी को जी कर 
ज़िन्दगी को जानकर देखा 
फिर भी न कर पाए लोग फर्क 
इंसान और पैसों के वज़न में  
ज़िन्दगी शायद तेरा ही है कसूर 
कुछ लोग रेहा गए कुछ सीख गए 
दोस्ती आखिर क्या है बहुत कम समझे!

~ फ़िज़ा 

Thursday, December 06, 2018

कब ?

ज़िन्दगी मदहोश होकर चली
बारिश की बूंदो सी गिरती हुई
कभी जल्दी तो कभी हौले से
ठंडी टपकती तो कभी गीली
रोमांचक रौंगटे से चुभती हुई
गर्म बादलों की चादर ओढकर
सिकुड़कर सोने का ख्वाब वो
कब पूरा होगा?




सुहानी वो नींद सुबह के ५ बजे
घडी की अलारम कहे, उठो!
और दिल कहे, नहीं !
हाँ और न में गुज़रे कई पल
दिल और दिमाग़ की लड़ाई में                            
आखिर दिमाग का जितना
जिम्मेदारी का जितना और
एक बच्चे सा दिल का हारना
कब वो जीतेगा?
इंतज़ार में... !
~ फ़िज़ा

Thursday, November 22, 2018

अलविदा कहना अब इस वक़्त ठीक नहीं


ज़िन्दगी किसी की मोहताज़ नहीं
फिर भी इंसान शुक्रगुज़ार नहीं
जीना गर तुम्हारी फितरत में नहीं
किसी और की ज़िन्दगी बर्बाद भी नहीं
खुदगर्ज़ और खुदफहमी में रहना नहीं
साथ रहनेवालों को बेचैन, ज़िन्दगी नहीं
बहुत हुआ नेकी करनी सोचा अभी नहीं
वो वक्त गुज़रकर जाना यहाँ से दूर नहीं
अलविदा कहना अब इस वक़्त ठीक नहीं
उस दिन की आस ज़रूर है जब हम नहीं !
~ फ़िज़ा

Sunday, November 11, 2018

ये ज़िन्दगी की भी क्या अजीब किताब है...!






ये ज़िन्दगी की भी क्या अजीब किताब है
हर साफा किसी न किसी से जूझता हुआ !

कोई इश्क़ में डूबा हुआ तो कोई मारा हुआ
कभी इश्क़ से मांगता हुआ तो लड़ता हुआ !

जीने के लिए लड़ता हुआ तो ललचाता हुआ
जीने के वजह से मरता हुआ तो मारता हुआ !

कोई जीने के लिए बन्दूक लेता तो कोई खाता
बारूद की बरसातें तो तेज़ाब के छींटों से भरा !

दो घडी की दीवानगी बरसों का झमेला हुआ
जो भी किया चंद सुकून परस्ती के लिए हुआ !

जाने ज़िन्दगी को जीता कहें या सेहता हुआ
हर सांस जीने  के लिए मरता-जूंझता हुआ !

ज़िन्दगी भी अजीब सी किताब है 'फ़िज़ा '
हर साफा बहादुरी से मरता हुआ  लगे !!

~ फ़िज़ा

Sunday, November 04, 2018

लिखकर ये चंद पंक्तियाँ एहसास जागे नए



ज़िन्दगी से बात हुई कुछ दिन हुए
काम में कुछ ज्यादा ही मसरूफ हुए
दुनिया की परेशानी मानो अपने हुए
ज़िन्दगी करीब होकर भी न रूबरू हुए
खुद को सम्भालो तो औरों की सोचिये
औरों का साथ कैसे दोगे जब अपने न हुए
लिखकर ये चंद पंक्तियाँ एहसास जागे नए
चलो ये एहसास ही ज़िन्दगी के पास लाए !

~ फ़िज़ा 


Saturday, October 06, 2018

किस्सा रोटी का

कण- कण जो दिखे सुनेहरा
कंचन फैला खेतों में लेहरा
दाना चुनकर गोदाम भरा
घर पहुंचा बोरियों में भरा
घर से चक्की तक सफर हमारा
पलभर का साथ है हमारा
आटा बनकर थैले में भरा
घर आते ही आटे को गुंधा
तेल, नमक, पानी से घुंधा
मसल कर अच्छे से गुंधा
मखमली होते ही उसे बेला
बेलकर गोल चाँद जैसा
तवे में ऐसा सेखा प्यार से
दुलार से वो भी फुल्के आया
कहते हैं जिसको यहाँ रोटी,
या फिर कोई कहे इसे फुल्का
गरम तवे में झुलसकर मानों 
और भी खूबसूरत बने ये न्यारा 
भीनी-भीनी खुशबु रोटी की
पेट में जाते ही स्वर्ग दिखाए
जिसे खेतों में बोया किसान ने
रोटी से उसने भरा पेट हमारा
देश हो या विदेश में फिरना
रोटी जैसा नहीं जीवन में दूसरा 
~ फ़िज़ा 

Sunday, September 30, 2018

जीने के लिए प्यार ही काफी है


जीने के लिए प्यार ही काफी है
ज़माने में ऐसा,ज़रा कम मानते हैं
इंसान को इंसान नहीं पैसों से मतलब है
फिर चाहे वो चिकित्सक हो या रोगी
हर कोई लूटने और लुटने को है तैयार
सिर्फ एक पल की ज़िन्दगी के लिए 
आराम और दर्दहीन होने के लिए
जीवन मूल्य चुकाने को होते हैं तैयार
भूल जाते हैं क्या चाहिए क्यों चाहिए
तब तक, जब तक मौत खड़ी न हो सामने
सुबह की शाम होने पर जैसे लौट आते हैं -इंसान
इंसान को चाहिए इंसान का प्यार और उसका साथ !

~ फ़िज़ा

हरियाली फैलाते ये बूँदें...!

ज़मीन पर गिरतीं हैं बूँदें  जाने कितने ऊंचाइयों से  कितने सपने संग लिए  क्या-कुछ देने के लिए  मचलती छलकाती हुई  एक से दो, दो से...