Monday, May 21, 2018

दिल में पनपते प्यार के बोल

कभी कुछ गरजते बादल
मंडराते हुए छाए बादल
एहसासों के अदल -बदल
विचारों में विमर्श का दख़ल
असमंजस, उलझनों का खेल
रखते हमेशा आसमां से मेल
फिर वो भी आये कुछ पल
बरसते कारवां लिए बादल  
गुद -गुदाहट से भरे हलचल
दिल में पनपते प्यार के बोल   
बरसना चाहे बादलों से घनघोर
हर बूँद एक बोसा भीगे गाल
भीगे फ़सानों से लरज़ते बाल
मानों डूबकर बरखा है बेहाल
हर तरफ से शुक्रगुज़ार बहराल  
गरजने से बेहतर बरसते बादल
यहाँ दरअसल हैं मुस्कुराते बादल !

~ फ़िज़ा

Monday, April 30, 2018

चंद यादों के बगुले ...!

मुझे घेर रही हैं
चंद यादों के बगुले
कभी बहुत दूर तो
कभी बहुत करीब
करते हैं भावुक कभी
तो करते उत्सुक मुझे
बढ़ जातीं हैं आकांशा
जब जाते गहराई में  
खो देते हैं आज मेरा
जुड़ जाते हैं बगुले संग
उड़ान भरने जग सारा
आहट ने दस्तख दिया  
रूबरू आज से हुआ  
मुझे घेर रही हैं
चंद यादों के बगुले
कभी बहुत दूर तो
कभी बहुत करीब !

~ फ़िज़ा 
#happypoetrymonth

Sunday, April 29, 2018

कैसा हैं ये इंसान जगत भी ...!

एक कबूतर ने दूसरे से कहा
क्यों ये इंसान इतने लड़ते हैं
बात-बात पर हक़ जताते हैं
हक़ जताकर भी कितने मजबूर हैं
ये बात सुनकर दूसरे कबूतर ने कहा
इंसान होकर भी ये मजबूर हैं ?
किस बात का फिर हक़ जताते हैं?
इस पर पहले कबूतर ने कहा
बहुत ही मतलबी और स्वार्थी हैं
किसी भी जगह जाकर रहते हैं
और उस पर अपना हक़ जताते हैं
अपने ही जैसे अन्य किसी को
आने या रहने नहीं देते हैं
हर समय आज़ादी का नाम
मगर चारों तरफ पहरा रखते हैं
इतना स्वार्थी और डरपोक हैं
अपने ही जैसों को दूर करते हैं
इंसान एक दूसरे के खून के प्यासे
सीमाएं बनाकर रखते हैं
एक जगह से दूसरे जगह
हम तुम जैसे नहीं जाते हैं
इनकी हर जगह, हर राज्य
सीमाओं से बंधा हुआ है
दूसरा कबूतर दया के मारे
सोचता ही रहा गया तिहारे
कैसा हैं ये इंसान जगत भी
अकल्मन्द होकर भी जाने
क्यों अपने ही लोगों संग
यूँ व्यवहार करें, आखिर क्यों?

~ फ़िज़ा 
#happypoetrymonth

Saturday, April 28, 2018

एक भयानक सपना ...!




किसी के ख़याल में
मैं आज भी हूँ
कोई दूर है तो भी
सोचता है मुझे
सालों बात नहीं होती
अन्य माध्यम से
जानकारी रखली
खुश हुए
जब सवेरे की नींद में
बुरा सपना जो देखा
जिसमें मैं गंदे कमरे में
फँसी हुई कहीं जकड़ी हुई
लगे सवेरे-सवेरे फ़ोन करने
हाल-चाल पूछने
मेरी खैरियत की दुआ करने
शायद जीने का अर्थ मिल गया
शायद इस लायक तो मैं रही
किसी को मेरी खैरियत की
फ़िक्र, ख़याल, शुभिच्छा,
धन्य हूँ मैं इस जीवन में
कोई इस लायक तो समझा हमें
दोस्ती वही है और सिर्फ वही !

~ फ़िज़ा 
#happypoetrymonth

Friday, April 27, 2018

खोखले इंसान




खोखले मकान
खोखले दूकान
खोखले अरमान
खोखले इंसान
खोखली हंसी
खोखली दोस्ती
खोखली सोच
खोखली पहचान
जीवन व्यर्थ है
खोखलेपन में
व्यर्थ है दिखावा
दोहरी ज़िन्दगी
स्वयं खोखलेपन में
घूम हैं आज इंसान 

~ फ़िज़ा 
#happypoetrymonth

Thursday, April 26, 2018

कब होगा इंसान आज़ाद?

उसका सिर्फ पहनावा ही था
जो उसे किसी राज्य से
किसी जाती से
तो किसी धर्म से
किसी खास वर्ग से
होने का पहचान दें गयी !
पास बुलाकर जब
नाम पुछा तो
सब कुछ उथल-पुथल
तुम? हिन्दू?
या फिर मुस्लमान
हिन्दू से ब्याही ?
या फिर कहीं तुम
झूठ तो नहीं बोल रही?
इंसान कितने ही
आडम्बररुपी ज़ंजीरों से
बंधा है और असहाय है
कब होगा इंसान आज़ाद?
इन सब से, आखिर कब?

~ फ़िज़ा 
#happypoetrymonth

Wednesday, April 25, 2018

नाबालिग थी वो !



पहली बार जब बत्तमीज़ी की थी
तभी बहुत ही अजीब लगा था
समझ नहीं आया कैसे कहें
किस से करें शिकायत
जाने क्या ग़लत हो जाये
लोगों को पता चले तो
जाने क्या लोग कहेंगे
इसी असमंजस में
अपमान सहते रहे
और फिर एक दिन
जो हरकत की उसने
सिर्फ चीखें निकली
बाद में लाश !
कौन थी वो
सबने पुछा
नाबालिग थी वो !

~ फ़िज़ा 
#happypoetrymonth

Tuesday, April 24, 2018

श्याम की मखमली चादर



श्याम की मखमली चादर,
जैसे ही उसने बिछाई,
हल्का सा सुनेहरा रंग,
हर तरफ लहराई,
पंछियों को घर की याद आयी,
देर-सवेर दिन ढलती नज़र आयी,
सूरज का गोला झाड़ियों से,
मानों जाने की इजाज़त मांगता हो,
अपने आस-पास परछाइयों से
अलविदा कहता हुआ चलने लगा,
हर प्राणी को रात का एहसास दिलाता,
श्याम की चादर होने लगी काली,
इसी बहाने निशा लेने लगी अंगड़ाई!

~ फ़िज़ा
#happypoetrymonth

Monday, April 23, 2018

मंडराते भँवरे ने कहा कुछ ...!




झूमते फूंलों की डालियों पर
मंडराते भँवरे ने कहा कुछ
जाने क्या सुना कलियों ने
मुँह छिपकर हँसने लगीं
फूलों को शर्माते देख
माली डंडी लेकर भागा
भँवरे ने भी कसर नहीं छोड़ी
लगा मंडराने माली के कानों में
वही गीत जिसे सुनकर फूल शर्मायी
कहाँ कोई रोक सका है दीवानों को
जहाँ प्यार है वहां मस्तियाँ भी हैं
बगीया में कुछ इसी तरह का
जश्न फूलों के बीच चल रहा है !

~ फ़िज़ा 
#happypoetrymonth

Sunday, April 22, 2018

धुप - छाँव



धुप - छाँव
सूखा - गीला
हरा - भरा
काला - नीला
मीठा - खट्टा
अच्छा - बुरा
ऐसा ही होता है
ज़िन्दगी का गाना
सुबह - शाम
रात - दिन
अँधेरा - उजाला
हँसना  - रोना
बोलना - रूठना
यही है अब तो
रहा अफसाना
चलो ज़िन्दगी को
आज़माके देखें
वैसे भी यहाँ 
आज हैं - कल नहीं
ये भी है बेगाना !
~ फ़िज़ा 
#happypoetrymonth

Saturday, April 21, 2018

जो भी देना स्वार्थरहित करना ...!




प्यासे को पानी और भूखे को खाना
हर किसी की ज़रुरत,आये हैं तो जीना
यहाँ क्या तेरा या मेरा करना
जब सबको एक ही तरह है जीना
किसी का नसीब ज़रुरत से ज्यादा मिलना
किसी को ज़रुरत से भी कम संभालना
अहंकार के लिए नहीं है कोई ठिकाना
बस थोड़ी मदत कर प्यार निभाना
चाहे जिस तरह भो हो सेवा करना
अपने हिस्से का दान ज़रूर तुम करना
जो भी देना स्वार्थरहित करना
नाम और प्रसिद्धि के लिए कुछ मत करना
व्यर्थ का है दान-पुण्य का काम वर्ना !
~ फ़िज़ा 
#happypoetrymonth

दिल में पनपते प्यार के बोल

कभी कुछ गरजते बादल मंडराते हुए छाए बादल एहसासों के अदल -बदल विचारों में विमर्श का दख़ल असमंजस, उलझनों का खेल रखते हमेशा आसमां से मेल फिर व...