Thursday, April 19, 2018

जीने का मज़ा लूट लेंगे ज़िन्दगी !

जितना सताएगी तू ज़िन्दगी
उतना ही प्यार करेंगे ज़िन्दगी
सितम हर तरह के तू ढायेगी
तब्बसुम से सेह लेंगे ज़िन्दगी
कठिनाईयाँ तो कई आएँगी
उतना ही कायल हमें पायेगी
हर घूँट में कड़वाहट भरी होगी
ज़हर पीने में मज़ा तभी आएगी
जितना हमें तू रोज़ तड़पायेगी
जीने का मज़ा लूट लेंगे ज़िन्दगी
कौन जीता है जीने के लिए ज़िन्दगी
तुझे झेलकर देखना है, क्या है ज़िन्दगी !

~ फ़िज़ा 
#happypoetrymonth

Wednesday, April 18, 2018

ऐ 'फ़िज़ा' चल दूर ही चलें कहीं !



इस जहाँ में कोई किसी का नहीं
पता है तब क्यों आस छोड़ते नहीं

नकारना ही है हर तरह जहाँ कहीं
गिरते हैं क्यों इनके पाँव पर वहीं

कोशिशें लाख करो सहानुभूति नहीं
क्यों इनकी मिन्नतें करते थकते नहीं

मोह-माया से अभी हुए विरक्त नहीं
बंधनों से अपेक्षा भी कुछ हुए कम नहीं

बंधनों को छुटकारा दिला दें कहीं 
वक्त आगया है बुलावा आता नहीं

ऐ 'फ़िज़ा' चल दूर ही चलें कहीं
प्यार न सही नफरत करें भी नहीं !

~ फ़िज़ा 
#happypoetrymonth

Tuesday, April 17, 2018

वक्त बे वक्त, वक्त निकल चूका !




वक्त बे वक्त, वक्त निकल चूका
सोचता हूँ मैं किधर जा चूका?

समय का क्या है चलता ही रहा
मुझे साथ क्यों लेकर चलता रहा?

जाना है वर्त्तमान से भविष्य की ओर
मुझे क्यों नहीं छोड़ दिया भूतकाल में?

वक्त भी बड़ा अजीब खिलाडी है
खेलते-खेलते हमें संग क्यों ले गया?

क्या कहें वक्त-वक्त की बात है
आजकल हमारा वक्त ही खराब है!

~ फ़िज़ा  
#happypoetrymonth

Monday, April 16, 2018

मेरा हर गुनाह अक्षम्य है!




मुझे सब तोहमतें मंज़ूर हैं,
मेरा हर गुनाह अक्षम्य है,
मेरा अस्तित्व ही भ्रष्ट है,
मुझे मेरी हर सज़ा मंज़ूर है,
मुझे मार दो या काट दो,
मुझे हर रेहम मंज़ूर है,
यूँ जीना इस तरह मेरा,
कम नहीं किसी दंड से,
मौत मेरे लिए है रेहम,
पता है न मिलेगी वो मुझे,
किये हैं जो दुष्कर्म मैंने,
जाएगी मेरे संग रहने,
खुद को न यूँ सज़ा दो,
ये बहुत कठिन मेरे लिए,
रेहम करो ज़िन्दगी पर,
जुड़े हैं ज़िंदगानी तुम पर,
ख़ुशी से सींच लो तुम,
जीवन अपना संवारकर !
~ फ़िज़ा 
#happypoetrymonth

Sunday, April 15, 2018

दर्द होता है सीने में मेरे भी मगर ...!




तड़पता है दिल किसी को देख के
कोई माने या न माने दुख होता है !

कभी चाहा नहीं जानकार क्रूरता
अनजाने में ही ग़लती हो जाती है !

दर्द होता है सीने में मेरे भी मगर
कैसे इज़हार करूँ जब मानोगे नहीं !

किसे सज़ा दे रहे हो ये जानते नहीं
प्यार करते हैं तभी तो दुखता है दिल !

क्यों बैर द्वेष से जीना है ज़िन्दगी
जब कुछ पल की ही है ज़िन्दगी !

जो कहो करने के लिए है तैयार फ़िज़ा
सब छोड़कर बस हुकुम तो करो ज़रा !  

~ फ़िज़ा 
#happypoetrymonth

Saturday, April 14, 2018

शर्मसार दुर्भाग्य




अमानवीय क्रूर जघन्य
लाचार मायूस मनहूस
बेबाक शर्मनाक खूंखार
सर्वनाश हिंसक हैवान
बलात्कारी जानवर
अन्याय असहनीय
शर्मसार दुर्भाग्य
बेटी माता-पिता
मजबूर इंसान
~ फ़िज़ा 
#happypoetrymonth

Friday, April 13, 2018

नारी जाती का कोई सम्मान नहीं है!




किताबों में पढ़ा था
ऐसा भी एक ज़माना था
औरत से ही जीवन चलता
और घर भी संभलता था !
फिर एक ज़माना वो भी आया
नारी शक्ति, नारी सम्मान
का एक चलन ऐसा भी आया
ऊँचा दर्ज़ा और सम्मान दिया !
फिर भी नारी का ये हाल रहा
"अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी
आँचल में है दूध, आँखों में पानी"
हाड-मांस की वस्तु बनी नारी!
फिर ये भी ज़माना आया
एक समान एक इंसान का नारा आया
जवान-बूढ़े-बच्चे सभी एक समान
फिर बलात्कार क्यों स्त्री पर ढाया?
मेहनत औरत भी करे, जिम्मेदारी भी ले
औरत कंधे से कन्धा मिलाकर चले
बस एक ही वजह से वो शिकार बने
दरिंदे औरत को हवस की नज़र से देखे !
पढ़ा है बन्दर से इंसान बना पर
बन्दर हमसे अक्कलमंद निकला
बोलना नहीं सीखा तो क्या हुआ
प्यार-मोहब्बत का इज्ज़्हार तो आया !
इंसान अपनी बुद्धि से मात खाया
अपने ही लोगों को समझ न पाया
औरत को समझने का भाग्य न पाया
बन्दर से इंसान दरिंदे का सफर पाया!
किसको दोश दें ऐसा वक़्त आया
बलात्कारी या उसको आश्रय देने वाला
गुनहगारों को सज़ा दें तो क्या दें
हर शहर हर गली की कहानी है !
"अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी
आँचल में है दूध, आँखों में पानी"
मैथिलि जी का लिखा आज भी सही है
नारी जाती का कोई सम्मान नहीं है!
~ फ़िज़ा

Thursday, April 12, 2018

यादों की बारात कुछ यूँ निकले...!


यादों की बारात कुछ यूँ निकले
बरसों भुलाये किस्से चले आये
वो पल जब इतने बड़े शहर में
अकेले नौकरी ढूंढ़ने हम निकले,
चारों तरफ मायूसी के आसार निकले !
रात भर बाइबिल से किस्से निकले
उसके बाद प्रार्थनाओं के लगे मेले
हर बात पर यीशु के गुणगान मिले
धर्म बदलने के और उसके फायदे सुने
हर कोई अपनी जेबें भरने में तुले !
वो पल भी आया जब सौदे होने लगे
यीशु के गुणगान को अनेक भाषाओँ में लिखें
वक्त मिलने पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाएं
रसोई में साफ़-सफाई और सब्जियां काटें
किराया देकर भी नौकरों सा काम करवाएं !
ऐसा भी एक पल था जब लोग हम से मिले
सूरत पर लिखवा के आये थे जो चाहे करलें
अच्छाई करने और नेक रहने की सज़ाएं मिले
घिसे बहुत पापड़ वक़त के रहे हमेशा सताए
एक चीज़ नहीं खोयी कभी हौसला बचाये रखे !

~ फ़िज़ा  
#happypoetrymonth

Wednesday, April 11, 2018

वर्षा की बौछार...!

शाम अकेली थी
थकी-जीती ज़िन्दगी,
हारी नहीं थी ;)
बच्चों से बतियाकर,
अपने कुत्ते के संग खेलकर,
जब ख़याल आया,
गरम-गरम फुल्के,
और वसंत-प्याज़ की सब्ज़ी,
मारे भूख के दौड़ने लगे चूहे,
फिर एक न देखा इधर-या उधर,
जैसे ही खाने बैठी,
वर्षा की बौछार,
लगी भूमि को तृप्त करने में,
जब तक प्यास रहे अंतर्मन में,
तब तक ही रहे कीमत सब में !
~ फ़िज़ा

Tuesday, April 10, 2018

इक्कीस साल पहले मुझे क्या पता था...!



इक्कीस साल पहले मुझे क्या पता था,
मैं कहाँ रहूंगी और क्या कर रही हूँगी,
इक्कीस साल पहले अपना शहर छोडूंगी,
वो भी अकेले बिना किसी के सहारे,
सोचा न था कभी इतना लम्बा सफर,
ज़िन्दगी जाने किस मोड़ ले आये,
मोड़ का क्या हर तरफ मुड़ती है,
बस ज़िन्दगी जाने किस से जोड़ती है,
किसे वजह और किसे अपना बनाती है,
फिर नए लोग और नए नाते पनपते हैं,
ऐसे ही दुनिया में लोगों से लोग मिलते हैं,
जाने कहाँ होंगी इक्कीस साल और बाद,
यहाँ, वहां या फिर किसी नए देश में,
ज़िन्दगी साथ देती है तब तक चलेंगे,
नए लोगों से नए रिश्तों से सजायेंगे सफर,
अभी बहुत दूर मुझे और जाना है,
इक्कीस साल का नज़ारा और देखना है,
शायद तब लिख सकूँ या न लिख सकूँ,
यादों के भवंडर में यूँ ही खो जाना है !
~ फ़िज़ा  
#happypoetrymonth

Monday, April 09, 2018

काश! लौट आता वो मधुर जीवन !



गगन में खुली आसमान में
पंछियों को उड़ते देखा जब
मधुर बचपन याद आया तब
परिंदों से कभी सीखा था मैंने
नील गगन में उड़ते-फिरते
एक डाल से दूसरे डाल पर
पकड़म-पकड़ाई खेलना और
पास आते ही फुर्र हो जाना
बातों से कुछ और याद आया
पेड़ों पर चढ़कर काली-डंडा
बंदरों की तरह झलांग लगाना
कितने ही विस्मर्णीय थे दिन
शामों को जब घर-आँगन में
दिया जलाते पीछे से बुलावा आये
हाथ-मुंह धोकर हाथ जोड़ लो
सद्बुद्धि के लिए दुआ कर लो
कितने मासूम थे वो पलछिन
आज परिंदों को देख याद आया
काश! लौट आता वो मधुर जीवन !
~ फ़िज़ा
#happypoetrymonth

जीने का मज़ा लूट लेंगे ज़िन्दगी !

जितना सताएगी तू ज़िन्दगी उतना ही प्यार करेंगे ज़िन्दगी सितम हर तरह के तू ढायेगी तब्बसुम से सेह लेंगे ज़िन्दगी कठिनाईयाँ तो कई आएँगी उतना ही ...