Thursday, February 14, 2019

इसे रोको इसे रोको !


गुलाबों का दिन था 
मोहब्बत का समां था 
सन्देश प्यार का था  
फिर हैवानियत कैसा? 
कितना क्रूर होगा वो 
वो पल, वो जानवर
पुलवामा में घुसकर 
चोरी से ठग कर मारे 
देश के जवानों को 
विस्फोटों से लथपथ 
जवानो की आहूति 
जिम्मेदार कौन? 
भरपाई करे कौन?
सस्ती है ज़िन्दगी 
खून का आदि है 
आतंकवाद !
क्यों न करें इस 
आतंकवाद का खून?
टूट गया वोही दिल 
जो गुलाबों और 
मोहब्बत से पाला था
दर्दनाक हिंसा जवानों पर 
निंदाजनक हादसा 
इसे रोको इसे रोको 
बहुत हुआ अब पडोसी का 
झगड़ा !

~ फ़िज़ा 

Wednesday, February 13, 2019

खिला चाँद गगन में !!!


भीगा मौसम है 
बहारों का गुलशन 
चमन में चहकते 
पंछियों की टोलियां 
भीड़ में सभी तो हैं  
फिर भी अकेला वो 
अकेले हम भी हैं 
बहारों के खिलने से 
मंडराते हैं कुछ भँवरे 
यहाँ खिलता गुलाब है 
मेहकती हुयी खुशबु है 
बस नहीं है कोई तो 
चाँद जो दूर बसा है 
गगन की गोद  में 
बादलों की आड़ में 
सिसकते हम भी हैं 
सिसकता वो भी है 
भीगा मौसम है 
भीगी हर सांसें हैं 
जज़्बात कोहरे में 
खिला चाँद गगन में !!!

~ फ़िज़ा 

Saturday, February 09, 2019

आ सको तो आजाओ तुम...!



आ सको तो आजाओ तुम 
लम्बा सफर रहा जुदाई का 
गए थे हंसी-ख़ुशी में यहाँ से
भेजा था हमने भी उत्साह से 
दिनों-हफ़्तों की बात और है  
महीना होने को यहाँ चला है 
आ सको तो आजाओ तुम 
लम्बा सफर रहा जुदाई का !
घर की बात और दफ्तर की 
काम सभी नियमित होते हैं 
सब का इंतज़ाम ठीक हुआ है 
शाम आती है सूनेपन को लेकर 
तुम, आ सको तो आजाओ  
लम्बा सफर रहा जुदाई का !
शुरुवात बच्चों की मर्ज़ी से ही 
चलता रहा दिनचर्या मस्ती से  
अब उसमें भी नीरसता आगयी 
सच कहूं तो दिल नहीं लगता 
हो सके गर तुमसे तो आजाओ  
जुदाई का सफर अब नहीं सहना !
आ सको तो आजाओ तुम 
लम्बा सफर रहा जुदाई का !!

~ फ़िज़ा 

Monday, January 28, 2019

मुझे ढूंढ़कर आये थे कुछ लोग ...!


मुझे ढूंढ़कर आये थे कुछ लोग 
जब इतिहास के पन्नों से पलटे 
कहानियां वीरों और वीरता की 
अनायास मस्तिष्क की नज़रें गयीं 
ढूंढ़ती स्कूल से उस कक्षा की ओर 
कक्षा छात्र-छात्रों से भरा हुआ था 
बुंदेले हरबोलों के मुंह से न सही 
अपनी टीचर के मुंह से सुन रहे थे 
सन सत्तावन की मर्दानी जो लड़ी थी 
झाँसी वाली रानी थी !
सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते अकस्मात 
सोच में पड़ जाते थे काश! उस वक्त 
हम भी उस सेना में भर्ती हो पाते थे 
मर्दानी जैसी न सही साथ उसका देते थे 
ऐसे वीर कहानियों से हौसले बुलंद होते 
स्कूल की घंटी बज भी जाती फिर भी 
मस्तिष्क में, खूब लड़ी मर्दानी वाली 
कविता याद आ जाती थी
किसी तरह वो स्वतन्त्र की चिंगारी 
हमरे अंदर भी जला जाती थी !
मुझे ढूंढ़कर आये थे कुछ लोग 
यूँही ख्यालों और ख्वाबों में वो लोग 
जो मातृभूमि के लिए वीरगति पा गयी थीं !!

~ फ़िज़ा 

Monday, January 14, 2019

हरियाली फैलाते ये बूँदें...!


ज़मीन पर गिरतीं हैं बूँदें 
जाने कितने ऊंचाइयों से 
कितने सपने संग लिए 
क्या-कुछ देने के लिए 
मचलती छलकाती हुई 
एक से दो, दो से हज़ार 
लड़ियाँ घनघोर बरसते 
कहलाते बरखा रानी 
जो जब झूम के बरसते 
ज़मीन को मोहित करते 
पेड़ों-गलियों में बसकर 
फूलों के गालों को चूमकर 
रसीले भवरों से बचाकर 
जैसे-तैसे गिरकर-संभलकर 
हरियाली फैलाते ये बूँदें 
कभी वर्षा, कभी वृष्टि 
बनकर सामने आते !

~ फ़िज़ा 

Thursday, January 03, 2019

ये सर्दियाँ मुझे बांध रखतीं !


सबकुछ तो अच्छा ही है 
हर तरफ ये हरियाली है 
बस, इन सबको देखूं मैं 
सुकून से और आराम से 
न कहीं जाने की जल्दी 
किसी के आने का भरम 
खाने की सुध नहीं जहाँ 
वक्त के अधीन नहीं वहां 
बस मैं और मेरी तन्हाईयाँ 
सुकून का आलंबन हो जहाँ 
मैं, फ़िज़ा और तुम वहां 
ऐसी कुछ आलस से भरी  
ये सर्दियाँ मुझे बांध रखतीं 
सबकुछ तो अच्छा ही है 
दिल घर-सीमित चाहता है 
छुट्टिंयों के कुछ लक्षण हैं 
कम्बल में सिकुड़ना चाहता है 
सबकुछ तो अच्छा ही है 
अब कुछ आराम चाहता है !

~ फ़िज़ा 

Wednesday, January 02, 2019

हर दिन एक नया चैप्टर हो !




क्या है ये नया साल ?
सब क्यों उतावले हैं ?
क्या कुछ बदल गया ?
क्या बदलने वाले हो ?
वही घिसेपिटे संकल्प दिखाने
के ?
जो कभी होते नहीं
पुरे ?
फिर भी एक लम्बी
सूचि बनती है
हर साल और हर बार
सूचि लंबी होती है
जब सबकुछ कल पर
छोड़ा है तब
नए साल और नया परिवर्तन
का हंगामा क्यों?
बेकार के ढकोसले, बेकार
के सब ड्रामे
बेफिक्र होकर हर पल
को जियें
मोहब्बत करने से न
कतराएं
ख़ुशी हाथ आये न आये,
दें ज़रूर किसी को
न कोई लिस्ट हो
न उसे पूरा करने का
स्ट्रेस हो 
बस हर दिन एक नया
चैप्टर हो !

~ फ़िज़ा

Friday, December 21, 2018

अभी रात ठेहर जाओ !!


ठण्ड ने कुछ यूँ पास सबको जकड रखा है
कम्बलों से जन्मों का नाता बना रखा है
कुछ इस कदर रिश्ता बना है सर्दियों में
ख्यालों में ऊन का मेला नज़र आता हैं
करीब रेहकर कम्बलों में नज़र आता है
उसका स्पर्श गरम बाहों का आसरा है 
ख़याल से गुद -गुदाहट, सुखद अनुभव है
चाँद, दीवाना आज कुछ ठान के आया है
चांदनी रात उसका साथ, फिर ये ठण्ड है
आँखों के सिलसिले कहानियों के ज़रिये है
अयनांत की रात पिया से मिलने जाना है
फ़ज़ाओं थोड़ा थम जाओ, सेहर तुम जाओ
अभी रात ठेहर जाओ !!
~ फ़िज़ा 

Monday, December 10, 2018

दोस्ती !!!


दोस्ती किसे कहते हैं? 
कभी सुना कहानियों में 
तो कभी देखा फिल्मों में 
ज़िन्दगी कई तरह से हमें 
दिखाए और सिखाये सीख 
बचपन के पले बढे साथी 
सालों बाद जब मिले दोस्त 
जस्बे में तो दिखाई दोस्ती 
दोस्ती निभाने में कर गए कंजूसी !
कुछ साल पहले मिले मेले में 
मचाया धुम खाया-पिया मज़े में 
वक़्त आया कुछ खरीदने की 
तो कहा मेरे लिए भी ले लो कुछ 
पैसे बदलकर डॉलर- रुपये में 
किसी ने जैसे कुछ सुना ही नहीं 
हँसते-खेलते तस्वीर खींचाते 
निकल आये मेले से हम दोस्त !
उंगलियां होतीं हैं अलग-अलग 
शायद यही मिसाल ली मैंने 
एक बिना कहे पूरी करे आरज़ू 
बदले में पैसे की बात न करना 
ऐसी धमकी देते हुए खरीद लिया 
दिल सोचते रेहा गया परेशान 
दोस्ती आखिर क्या है?
उम्र के इस दायरे में आकर 
जहाँ ज़िन्दगी को जी कर 
ज़िन्दगी को जानकर देखा 
फिर भी न कर पाए लोग फर्क 
इंसान और पैसों के वज़न में  
ज़िन्दगी शायद तेरा ही है कसूर 
कुछ लोग रेहा गए कुछ सीख गए 
दोस्ती आखिर क्या है बहुत कम समझे!

~ फ़िज़ा 

Thursday, December 06, 2018

कब ?

ज़िन्दगी मदहोश होकर चली
बारिश की बूंदो सी गिरती हुई
कभी जल्दी तो कभी हौले से
ठंडी टपकती तो कभी गीली
रोमांचक रौंगटे से चुभती हुई
गर्म बादलों की चादर ओढकर
सिकुड़कर सोने का ख्वाब वो
कब पूरा होगा?




सुहानी वो नींद सुबह के ५ बजे
घडी की अलारम कहे, उठो!
और दिल कहे, नहीं !
हाँ और न में गुज़रे कई पल
दिल और दिमाग़ की लड़ाई में                            
आखिर दिमाग का जितना
जिम्मेदारी का जितना और
एक बच्चे सा दिल का हारना
कब वो जीतेगा?
इंतज़ार में... !
~ फ़िज़ा

Thursday, November 22, 2018

अलविदा कहना अब इस वक़्त ठीक नहीं


ज़िन्दगी किसी की मोहताज़ नहीं
फिर भी इंसान शुक्रगुज़ार नहीं
जीना गर तुम्हारी फितरत में नहीं
किसी और की ज़िन्दगी बर्बाद भी नहीं
खुदगर्ज़ और खुदफहमी में रहना नहीं
साथ रहनेवालों को बेचैन, ज़िन्दगी नहीं
बहुत हुआ नेकी करनी सोचा अभी नहीं
वो वक्त गुज़रकर जाना यहाँ से दूर नहीं
अलविदा कहना अब इस वक़्त ठीक नहीं
उस दिन की आस ज़रूर है जब हम नहीं !
~ फ़िज़ा

इसे रोको इसे रोको !

गुलाबों का दिन था  मोहब्बत का समां था  सन्देश प्यार का था   फिर हैवानियत कैसा?  कितना क्रूर होगा वो  वो पल, वो जानवर पुलवामा...