Thursday, February 01, 2018

ऐ चाँद, दिलबर मेरे हमनशीं

चित्र अशांक सींग के सौजन्य से
चाँद की अठखेलियां देख 
आज कविहृदय जाग गया
उसकी चंचल अदाओं से 
मेरा दिल घायल हो गया 
अपना पूर्ण मुख प्रतिष्ठा 
और हलकी सी मुस्कान से 
घायल को ही बेहाल किया 
न चैन से सोने दिया रात भर 
न चैन से जगने दिया दिन में 
कामदेव की सूरत में चाँद 
प्यार में रत रहे फ़िज़ा संग 
हर वक़्त एक वासना सी 
सम्भोग का वो आलम जैसे 
हर ख़ुशी दर्शाये रंग से ऐसे 
मानो कभी परदे में छिपके 
तो अँधेरे की आड़ में ऐसे 
एक-दूसरे को समर्पण ऐसे 
तृप्ति मिली आलिंगन भर से 
सदियों से सताए रखा दूर से 
उस रात की रासलीला ने 
उम्मीद जगा दिया अब से 
हो न हो तुम हो उस जहाँ में 
इंतज़ार करूंगी इस जहाँ में 
अब तो मिलन है ज़रूरी 
आशा जिज्ञासा बढ़ गयी है 
ऐ चाँद, दिलबर मेरे हमनशीं 
तू मिलने आ इस चमन में 
तख्ती है राह तेरी फ़िज़ा 
फिर एक रात दोनों जवाँ 
बसेरा हो एक रात का 
जीवनभर का रहे फिर नाता !

~ फ़िज़ा 

Friday, January 19, 2018

मगर मैं क्या चाहूँ ये भी तो अभी पता नहीं !

नए साल की अनेक शुभकामनाएं मेरे सभी पाठकों को !
मेरे नए साल का पहला पद आज प्रस्तुत कर रही हूँ क्यूंकि ज़रा छुट्टियों के मौसम में यहाँ से भी छुट्टी ली या ऐसा कहूँ की तकनिकी सहूलियत की उपलब्धता नहीं होने की वजह से मैं अपनी कविता यहाँ पेश नहीं कर सकी!
आईये मेरी उलझी हुयी गुथी को ज़रा सुलझाइये :)


मैं ढूंढ़ती हूँ जिसे उसका पता भी नहीं 
चाहती हूँ कुछ करना पर ठिकाना नहीं 
सलाह-मश्वरा करूँ तो किससे पता नहीं 
मगर मैं क्या चाहूँ ये भी तो अभी पता नहीं !
जहाँ मैं हूँ अभी वो तो सही ठिकाना नहीं 
चाहत मेरे दिल में अभी बिलकुल भी नहीं 
ख़याल आये जगह की ख़ुशी रत्तीभर नहीं 
इतना पता है अब और नहीं बस और नहीं !
नए साल में पुरानी जगह कुछ ठीक नहीं 
नयी सोच का चलन पुरानी डगर में ठीक नहीं 
कुछ तो जुगाड़ करना है वर्ना ये सब ठीक नहीं 
कुछ करेंगे तो कुछ बनेंगे नहीं तो कुछ भी नहीं !!
सोच में डूबी हूँ के इंतज़ार अब और नहीं 
कुछ दिनों की और छुट्टी अब हकीकत नहीं 
काश! निकलती कहीं किताब लिखने मगर नहीं 
सख्त कदम उठाने पड़ेंगे,सिर्फ सोच कुछ नहीं !!!

~ फ़िज़ा 

Friday, December 22, 2017

यादों के काफिले घूमते रहे ऐसे...!


कुछ इस तरह दिन गुज़रते हैं 
यादों के काफिले घूमते हैं 
काले बादलों की तरह जैसे 
कब बरसें तो अब बरसें 
बदल यूँही मंडराते रहते हैं 
एक आस और अंदेशा जैसे 
दिलों को दिलासा दिए जाते हैं 
इस तरह, यादों के काफिले घूमते हैं !
पूछती है मुझसे हर कली बाग़ में 
किसे ढूंढ़ते हो क्यारियों में ऐसे 
जाने क्या सोचकर हंस दिए वो 
जब कहा मैंने बादलों के बरसे 
मोतियाँ बटोरने आया हूँ मैं कब से 
कली मुस्कुरायी और बोली मुझसे 
यहाँ फूल बन ने तक रखता है कौन? 
इस तरह , यादों के काफिले फिर घूमते रहे!
सुना है गुलदान में रखते हैं फूलों को सजाके 
चलो फिर गुलदान ही को ढूंढा जाए 
यूँही फिर सफर चलता रहा मगर ऐसे 
के यादों के काफिले घूमते रहे ऐसे !!

~ फ़िज़ा 

Thursday, December 14, 2017

मुलाकात अभी बाकी है ....!



ज़िन्दगी में बहुत दोस्त मिलते हैं 
मगर ऐसे बहुत कम मिलते हैं 
जो खुद को बहुत छोटा और 
दूसरों को बहुत ऊपर देखते हैं 
ऐसा महसूस कराने वाले 
ज़िन्दगी में कम मिलते हैं 
दोस्ती कैसे निभाते हैं कोई 
आपसे सीखे जो मीलों दूर 
महीनों बिना बतियाये फिर भी 
हाल-चाल की खबर रखते 
सफर जब घर की तरफ हो 
घर ठहराए बिना नहीं भेजते 
हमेशा छोटे बच्चों की तरह 
हर ख्वाइश पूरी करते रहते 
गर अकेला महसूस भी किया 
तो परिवारों के बारे में सोचा उनके 
जो काम करते थे दफ्तर में आपके 
जीवन से हताश न होना और साहस 
औरों को देना ज़िन्दगी की यही 
परिभाषा अपनायी आपने
जाने लोग कितनी भी उम्र लगालें 
आप उस मासूम बच्चे की तरह 
उत्सुक और नयी तरकीबों को 
सोचते रहे और फिल्म बनाते रहे 
आज भी सभी को इस कदर छोड़ा 
के सब ज़िन्दगी की यादों में 
बहक गए !
वाह ! नीरज, 
यहाँ भी अपने अंदाज़ में चले
चलो कोई नहीं मुलाकात 
अभी बाकी है उन सभी बातों के लिए 
जिसे पूरी करने की ख्वाइश 
हम दोनों ने की.
~ फ़िज़ा

Saturday, December 02, 2017

भंवरें भी गुंजन गायेंगे !


पतझड़ का मौसम आया 
और चला भी जायेगा 
पुराने पत्ते खाद बन कर 
नए कोपलें शाख पर 
सजायेंगे !
तन्हाई भी कभी रूकती नहीं    
रहगुजर मिल ही जायेगा 
नए साथी होंगे समझनेवाले  
ज़िन्दगी के स्केच में रंग 
भरेंगे!
ग़मों का बादल बरस गया 
हरियाली से चमन भर जायेगा
नयी खुशबु लिए मौसम ज़रा 
फूलों के संग भंवरें भी 
गुंजन गायेंगे !

~ फ़िज़ा    

Saturday, November 25, 2017

ज़िन्दगी भी कभी थमती नहीं है ...


ज़िन्दगी की शाम जब होती है 
तभी सुबह की तैयारी होती है 

बात सही मानो तभी होती है 
जब मुद्दा समझायी जाती है 

हर एक बात की हद्द होती है 
उसके बाद ज़िद्द ही होती है 

वक़्त बे-वक़्त समझ होती है 
तब तक बहुत देर हो जाती है 

हर शाम के बाद सुबह होती है 
सुबह से ज़िन्दगी शुरू होती है 

समय का क्या, रूकती नहीं है 
ज़िन्दगी भी कभी थमती नहीं है 

चाँद भी अब मुस्कुराता नहीं है 
जाने कितनी रातें आया नहीं है  

पतझड़ के पत्तों की तरह होती है 
नयी पंखुरी फिर निकल आती है 

~ फ़िज़ा 

Saturday, November 18, 2017

मना करें कब ये तैय करें कैसे?

धीरज की भी एक हद होती है 
उसके कुछ कायदे-कानून होते हैं 
किसी के रोंदने की चीज़ नहीं ये 
मना करें कब ये तैय करें कैसे?

जीना है ज़िंदादिली से ये सच है 
क्यों जीना छोड़कर तनाव में रहें?
तनावभरी ज़िन्दगी क्यों?जीने के लिए?
जीने के लिए जीना ये तैय करें कब?

प्रबंधक का शोषण होता नहीं बर्दाश्त
बात को सजकता से लेना आदत सही  
क्यों सहें और कैद करें डर को अंदर?
तोड़ दूँ ये शृंखला? जीना है जब निडर!

~ फ़िज़ा 

Friday, November 10, 2017

मेरा बचपन खो गया कहीं!


आज कहीं मेरा बचपन खो गया 
एक बहुत बड़ा हिस्सा बचपन का 
जिसे संवारने में मामा का प्यार था 
शांत किन्तु गंभीर स्वाभाव के थे 
मगर दिल के प्यारे और गुनी थे 
उनकी दुलारी सबसे प्यारी भांजी 
कोई और नहीं मगर मैं थी!
जहाँ भी रहे हम पास या दूर 
दिल में प्यार की गर्मी नहीं हुई कम 
वक़्त मिले जब भी मिलने आये हम 
फिर एक ऐसा भी वक़्त आया 
अस्वस्थ की खबर ले गया हमें फिर 
वहीं उनसे पुराने दिनों की यादों को 
संग लिए दिल में मिलने चले थे 
खुश था दिल वक़्त बे वक़्त ही सही 
नज़रों के सामने थे तो सही मगर 
ज़िन्दगी का भी एक ऐसा खेल है 
जब सब कुछ अच्छा हो ऐसा लगे 
तभी उसकी चाल बेहाल करे !
आज विदाई का दिन है ऐसा 
कहा जब मुझ से सवेरे सवेरे 
दिल एक पल के लिए हो गया 
बोझल, मेरा बचपन खो गया कहीं!
अब तो बस रहा गयीं यादें जो 
सताएंगी हमेशा मुझे!

~ फ़िज़ा 

Thursday, November 02, 2017

तुमसे बेहतर हम यहाँ ...!


शुष्क हवा में विचरण करते 
एक पंछी ने पुछा मुझ से 
ऐसा सुनने में आया है कब से 
बँधे हैं पैर खुले हैं हाथ तुम्हारे?
लिखना-पढ़ना सब जानते हो 
स्वतंत्र मन से कुछ नहीं करते!

सच बोलने और लिखने से 
मिलते हैं धमकियाँ क़त्ल के 
गाय का मांस खाने से 
गँवा बैठेंगे ज़िंदगियाँ ऐसे 
सरकार जो भी करे और कहे 
आज्ञा का पालन करते जाएं !

परिंदों ने हसंकर कहा 
तुमसे बेहतर हम यहाँ 
उड़ते इस मुक्त गगन में 
आज़ादी से खुशगवार 
तुम तो फिर भी बंधे हो 
सामाजिक बेड़ियों तले !
~ फ़िज़ा 

Monday, October 23, 2017

दूसरों के फटेहाल का आनदं ही कुछ और है !



दुनिया में लोगों के पास वक़्त ही नहीं  
औरों के झमेलों में जाने जाया कितना किया !

तमाशा कोई कितना करे या न करे मगर 
दुनिया औरों के तमाशे में मज़े खूब लेती है !

अपनी तो हालत है ही निराशाजनक किंतु 
दूसरों के फटेहाल का आनदं ही कुछ और है !

कितना हँसोगे औरों के ग़म में यारा तुम 
दो आंसूं अपने लिए भी बचाके रखना !

कहते हैं वो औरों से सब जानते हैं हाल हमारा 
'फ़िज़ा' को भी पता चले कौन है वो हमारा?

~ फ़िज़ा 

Thursday, October 19, 2017

वो शाम याद आती है मुझे ...!


वो शाम याद आती है मुझे 
जब रंगोली से भरा बरामदा 
और दीयों की कतार में 
रौशनी का हवा से बतियाना 
लोगों की चहल-पहल तो 
कहीं बच्चों का उल्लास 
हर तरफ रौशनी और 
हर किसी के मुख में मिठाई 
दोनों हाथों में भरा पटाखा 
कभी में जलाऊं तो कभी वो 
खेलते-खाते गुज़र जाते 
छे के छे दिन 
आता जब सातवे की सुबह 
हर तरफ कागज़ों की 
बिछी कालीन 
जमा करते सभी एक ओर 
लगते उसमें भी आग हलकी सी 
जाने कुछ बची हुई लड़ी ही सही 
आग सेख़ते -सेख़ते बज उठतीं 
यूँही दिवाली को करते अलविदा 
मिठाइयों की मिठास से 
करते परहेज़ खाने से 
फिर देखो थालियों से भरा 
मिठाई का डब्बा घर में आ चला 
देखते -देखते एक और साल 
निकल गया ! 

~ फ़िज़ा 

ऐ चाँद, दिलबर मेरे हमनशीं

चित्र अशांक सींग के सौजन्य से चाँद की अठखेलियां देख  आज कविहृदय जाग गया उसकी चंचल अदाओं से  मेरा दिल घायल हो गया  अपना पूर्ण मु...