Saturday, December 02, 2017

भंवरें भी गुंजन गायेंगे !


पतझड़ का मौसम आया 
और चला भी जायेगा 
पुराने पत्ते खाद बन कर 
नए कोपलें शाख पर 
सजायेंगे !
तन्हाई भी कभी रूकती नहीं    
रहगुजर मिल ही जायेगा 
नए साथी होंगे समझनेवाले  
ज़िन्दगी के स्केच में रंग 
भरेंगे!
ग़मों का बादल बरस गया 
हरियाली से चमन भर जायेगा
नयी खुशबु लिए मौसम ज़रा 
फूलों के संग भंवरें भी 
गुंजन गायेंगे !

~ फ़िज़ा    

Saturday, November 25, 2017

ज़िन्दगी भी कभी थमती नहीं है ...


ज़िन्दगी की शाम जब होती है 
तभी सुबह की तैयारी होती है 

बात सही मानो तभी होती है 
जब मुद्दा समझायी जाती है 

हर एक बात की हद्द होती है 
उसके बाद ज़िद्द ही होती है 

वक़्त बे-वक़्त समझ होती है 
तब तक बहुत देर हो जाती है 

हर शाम के बाद सुबह होती है 
सुबह से ज़िन्दगी शुरू होती है 

समय का क्या, रूकती नहीं है 
ज़िन्दगी भी कभी थमती नहीं है 

चाँद भी अब मुस्कुराता नहीं है 
जाने कितनी रातें आया नहीं है  

पतझड़ के पत्तों की तरह होती है 
नयी पंखुरी फिर निकल आती है 

~ फ़िज़ा 

Saturday, November 18, 2017

मना करें कब ये तैय करें कैसे?

धीरज की भी एक हद होती है 
उसके कुछ कायदे-कानून होते हैं 
किसी के रोंदने की चीज़ नहीं ये 
मना करें कब ये तैय करें कैसे?

जीना है ज़िंदादिली से ये सच है 
क्यों जीना छोड़कर तनाव में रहें?
तनावभरी ज़िन्दगी क्यों?जीने के लिए?
जीने के लिए जीना ये तैय करें कब?

प्रबंधक का शोषण होता नहीं बर्दाश्त
बात को सजकता से लेना आदत सही  
क्यों सहें और कैद करें डर को अंदर?
तोड़ दूँ ये शृंखला? जीना है जब निडर!

~ फ़िज़ा 

Friday, November 10, 2017

मेरा बचपन खो गया कहीं!


आज कहीं मेरा बचपन खो गया 
एक बहुत बड़ा हिस्सा बचपन का 
जिसे संवारने में मामा का प्यार था 
शांत किन्तु गंभीर स्वाभाव के थे 
मगर दिल के प्यारे और गुनी थे 
उनकी दुलारी सबसे प्यारी भांजी 
कोई और नहीं मगर मैं थी!
जहाँ भी रहे हम पास या दूर 
दिल में प्यार की गर्मी नहीं हुई कम 
वक़्त मिले जब भी मिलने आये हम 
फिर एक ऐसा भी वक़्त आया 
अस्वस्थ की खबर ले गया हमें फिर 
वहीं उनसे पुराने दिनों की यादों को 
संग लिए दिल में मिलने चले थे 
खुश था दिल वक़्त बे वक़्त ही सही 
नज़रों के सामने थे तो सही मगर 
ज़िन्दगी का भी एक ऐसा खेल है 
जब सब कुछ अच्छा हो ऐसा लगे 
तभी उसकी चाल बेहाल करे !
आज विदाई का दिन है ऐसा 
कहा जब मुझ से सवेरे सवेरे 
दिल एक पल के लिए हो गया 
बोझल, मेरा बचपन खो गया कहीं!
अब तो बस रहा गयीं यादें जो 
सताएंगी हमेशा मुझे!

~ फ़िज़ा 

Thursday, November 02, 2017

तुमसे बेहतर हम यहाँ ...!


शुष्क हवा में विचरण करते 
एक पंछी ने पुछा मुझ से 
ऐसा सुनने में आया है कब से 
बँधे हैं पैर खुले हैं हाथ तुम्हारे?
लिखना-पढ़ना सब जानते हो 
स्वतंत्र मन से कुछ नहीं करते!

सच बोलने और लिखने से 
मिलते हैं धमकियाँ क़त्ल के 
गाय का मांस खाने से 
गँवा बैठेंगे ज़िंदगियाँ ऐसे 
सरकार जो भी करे और कहे 
आज्ञा का पालन करते जाएं !

परिंदों ने हसंकर कहा 
तुमसे बेहतर हम यहाँ 
उड़ते इस मुक्त गगन में 
आज़ादी से खुशगवार 
तुम तो फिर भी बंधे हो 
सामाजिक बेड़ियों तले !
~ फ़िज़ा 

Monday, October 23, 2017

दूसरों के फटेहाल का आनदं ही कुछ और है !



दुनिया में लोगों के पास वक़्त ही नहीं  
औरों के झमेलों में जाने जाया कितना किया !

तमाशा कोई कितना करे या न करे मगर 
दुनिया औरों के तमाशे में मज़े खूब लेती है !

अपनी तो हालत है ही निराशाजनक किंतु 
दूसरों के फटेहाल का आनदं ही कुछ और है !

कितना हँसोगे औरों के ग़म में यारा तुम 
दो आंसूं अपने लिए भी बचाके रखना !

कहते हैं वो औरों से सब जानते हैं हाल हमारा 
'फ़िज़ा' को भी पता चले कौन है वो हमारा?

~ फ़िज़ा 

Thursday, October 19, 2017

वो शाम याद आती है मुझे ...!


वो शाम याद आती है मुझे 
जब रंगोली से भरा बरामदा 
और दीयों की कतार में 
रौशनी का हवा से बतियाना 
लोगों की चहल-पहल तो 
कहीं बच्चों का उल्लास 
हर तरफ रौशनी और 
हर किसी के मुख में मिठाई 
दोनों हाथों में भरा पटाखा 
कभी में जलाऊं तो कभी वो 
खेलते-खाते गुज़र जाते 
छे के छे दिन 
आता जब सातवे की सुबह 
हर तरफ कागज़ों की 
बिछी कालीन 
जमा करते सभी एक ओर 
लगते उसमें भी आग हलकी सी 
जाने कुछ बची हुई लड़ी ही सही 
आग सेख़ते -सेख़ते बज उठतीं 
यूँही दिवाली को करते अलविदा 
मिठाइयों की मिठास से 
करते परहेज़ खाने से 
फिर देखो थालियों से भरा 
मिठाई का डब्बा घर में आ चला 
देखते -देखते एक और साल 
निकल गया ! 

~ फ़िज़ा 

Monday, October 16, 2017

मोहब्बत ही न होता तो मैं कहाँ होता?


मोहब्बत में मैं नहीं होता तो खुदा होता 
मोहब्बत ही न होता तो मैं कहाँ होता?

फ़िज़ा में दिन नहीं होता तो क्या होता? 
दिन नहीं जब होता तब रात ही होता 

दरख़्त में पत्ते,शगोफा, खार तो होता 
गर शगोफा होता तो गुल ज़रूर होता 

आसमां पर अफ़ताब दिन में ज़रूर होता 
शब् पे कोई हो न हो माहताब ज़रूर होता 

ज़िन्दगी मसरत नहीं होता गर ग़म न होता 
ज़िन्दगी क्या होता गर वफ़ात नहीं होता ?

~ फ़िज़ा   

Monday, October 02, 2017

क्यों? किस लिए? क्या पाया? क्या मिला?


एक आवाज़ और गोली ने भून दिया 
सबको छलनी-छलनी कर दिया 
हर तरफ लहू का गलीचा बिछा दिया 
चीखते-चिल्लाते, बिलखते बचते-बचाते 
सुर्ख़ियों में लरजते कुछ ज़िन्दगियाँ 
मरने वाला भी न रहा और मारने वाला भी 
जाने कौन देस से था वो हाड़ -मांस का 
किस बात की तमन्ना पूरी कर गया यूँ 
के बचे लोगों में सवाल बनके रहा गया 
क्यों? किस लिए? क्या पाया? क्या मिला?
सृष्टि का खेल या दिमागी असमंजस 
हैवानियत का एक और प्रदर्शन दूरदर्शन पर था!
  
~ फ़िज़ा 

Sunday, October 01, 2017

समय-समय की बात है धैर्य, सैय्यम 'फ़िज़ा'





कोई दूर होने के लिए दूर करता है 
कोई अपनी नफरत जताने के लिए ! 

किसी को नीचा दिखाकर मज़ा आता है  
कोई अपना बड्डपन जताकर करता है !

इंसान कहाँ तक जायेगा अहम् लेकर
खुद भी जलेगा, सिर्फ खुद ही जलेगा !

रंगमंच पर सभी आते हैं निभाने किरदार  
दृश्य भी बदल जायेगा स्थल के अनुसार !

ढूंढो तो जहाँ में क्या नहीं मिल जाता 
इंसान को इंसान मिलते लगती नहीं देर!

समय-समय की बात है धैर्य, सैय्यम 'फ़िज़ा' 
वक़्त आएगा जहाँ में कोई तो होगा अपना वहां !
  
~ फ़िज़ा 

Tuesday, September 05, 2017

अभिव्यक्ति की स्वंतंत्रता हक़ है हर एक का !!


हैवानियत पर उतर आये लोग 
जब किसीने दिखाया आईना
आईना था ही इतना भयंकर 
खुद भी न देख सके चेहरा 
प्रतिरूप देख कर सिर्फ 
हत्या ही बन पड़ा उनसे !
कब तक करोगे बंद आवाज़ 
कब तक करोगे हातपाई 
कब तक करोगे गुंडागर्दी 
आखिर कब तक ये सहेंगे भी 
एक से बढ़कर एक आवाज़ 
पैदा होगी जनतंत्र में कई यहाँ !
हर दबायी आवाज़ को बुलंद कर 
जहाँ आवाज़ को खामोश किया 
वहां कलम से तू काम कर, प्रहार कर  
निडर निर्मोही कर निर्लज अन्याय का 
प्रजातंत्र को न मायूस कर यूँ हैवान  
एक आवाज़ को दबाने वाले प्राणी !
सौ खड़े हो जायेंगे बनकर वही आवाज़ 
तर्कसंगत से बनेगा एक स्वच्छ समाज 
अभिव्यक्ति की स्वंतंत्रता हक़ है हर एक का !!   
  
~ फ़िज़ा 

भंवरें भी गुंजन गायेंगे !

पतझड़ का मौसम आया  और चला भी जायेगा  पुराने पत्ते खाद बन कर  नए कोपलें शाख पर  सजायेंगे ! तन्हाई भी कभी रूकती नहीं     रहगुज...