Monday, April 22, 2019

पृथ्वी दिवस की शुभकामनाएं !




फूलों से कलियों से 
सुनी है कई बार दास्ताँ 
खुशहाल हो मेरा जहाँ 
तो खुश हूँ मैं भी वहां 
जब पड़ती है एक चोट 
सीने में मेरे वृक्ष्य के तब 
जड़ से लेकर कली तक
गुज़र कर चलती है दर्द 
जिसे लग जाता है वक्त 
ज़ख्म भरने में और बढ़नेमें 
फूल अच्छे लगते हैं सभी को 
हमारी जड़ों को रखें सलामत 
हम और तुम रहे आबाद यूँही 
सोचो गर यही हाल कोई करे 
तुम्हारा या तुम्हारे वंश का 
खत्म होगा जीवन इस गृह का 
सही समय से सीख लें हम 
करें पालन सयम का और 
जीएं और जीने दें सभी को 
क्या तेरा क्या मेरा जो ले जाए 
आज है तो कल नहीं बस 
पल भर का ये साथ है अपना 
चलो मिलकर वृक्ष लगाएं हम 
अपने लिए स्वस्थ वातावरण 
और इनके लिए कुछ जंगलें 
पृथ्वी दिवस की शुभकामनाएं !

~ फ़िज़ा 

Sunday, April 21, 2019

सेहर यूँही आती रहे ..!



ज़िन्दगी की ख्वाइशें
यूँ सेहर बनके आयीं 
के एक-एक करके 
किरणों की तरह यूँ  
आँखों में गुदगुदाते 
मंज़िलों को ढूंढ़ते
यूँ निकल पड़े ऐसे 
जैसे परिंदों को मिले 
आग़ाज़ जो पहुंचाए 
उन्हें उनके अंजाम तक 
सेहर यूँही आती रहे 
अंजाम के बाद फिर 
नए आग़ाज़ के साथ 

~ फ़िज़ा 

कविता का ये महीना...!



कल आज में गुज़र गया 
ख़्याल था मगर भूल गया 
एक से एक तमाम होगया 
अंजाम ये के वक़्त खो गया 
बोलते सोचते निकल गया 
कल आज में बदल गया 
मेरी कविता का प्रण ये के  
आज एक नहीं दो होगया 
कविता का ये महीना अब 
यूँ ही सही  सफल हो गया !

~ फ़िज़ा 

Friday, April 19, 2019

कोई बुलाता है मुझे...!




कोई बुलाता है दूर मुझे ऐसे 
लेना चाहता हो आगोश में
कहता है कुछ जो रहस्य है 
बचाना चाहता है इस जहाँ से 
कहता है छोड़ दो इसे यहाँ 
ज़रुरत है मेरी कहीं और वहां
छोड़ दे ये जग है बेगाना 
यहाँ नहीं कोई जो अपना  
सागर की लहरें कहतीं है 
बार-बार दहाड़ -दहाड़ कर 
के चले भी आओ संग हमारे 
ले चलेंगे दूर लहरों के सहारे 
और फिर छोड़ आएंगे उस छोर 
नयी दुनिया नया ज़माना फिर 
इस जहाँ से अलग हैं लोग वहां 
प्राणी को प्राणी से परखते हैं 
न ऊंच-नीच न जाती-पाती 
सब समान एक जुट साथी 
लहरों को तरह मचलते 
हँसते-खेलते और लौट जाते 
चलो, चलो संग हमारे वहां 
तनहा कोई नहीं रहता वहां 
कोई बुलाता है दूर मुझे ऐसे 
लेना चाहता हो आगोश में
कहता है कुछ जो रहस्य है 
बचाना चाहता है इस जहाँ से 

~ फ़िज़ा 

Thursday, April 18, 2019

ये वृक्ष




बरसों से देख रहा है 
ये वृक्ष चुप-चाप सब
होनी - अनहोनियों को 
एकमात्र गवाह जो गुंगा है 
न कुछ बोल सकता है 
न रोक सकता है किसीको  
केवल देख सकता है 
अपनी खुली आँखों से 
न्याय और अन्याय 
सब देखके गुज़रे कल की 
कुछ कहती है झुर्रियां 
सुनाती है ये कहानी 
बरसों से देख रहा है 
ये वृक्ष चुप-चाप सब!

~ फ़िज़ा 

Wednesday, April 17, 2019

जन्मदिन की शुभकामना !


कब कैसे कहाँ 
वो इस कदर बड़ी 
के पता ही न चला 
मुझे लांघ कर बढी 
साल पर साल आएंगे 
गिनतियाँ चाहे कितनी 
उम्र का क्या है बढ़ना 
ये तो सालों साल का है 
ज़िन्दगी ज़िंदादिली से 
जियो खवाब सजाओ 
और बस हासिल करो 
जीवन में ऐसा कुछ नहीं 
जो न कर सको तुम  
बन जाओ उस परिंदे जैसे 
जो ऊँची उड़ान उड़े और 
जब शाम का वक़्त हो 
तो घर लौटना न भूलें 
खुशियों का खज़ाना 
रहे तुम्हारे पास बस ये 
तोहफा औरों को भी देना 
सलामत रहो तुम यही दुआ 
जन्मदिन की शुभकामना !

~ फ़िज़ा 

Tuesday, April 16, 2019

ये शाम



वो देखता है मुझे यहाँ 
मैं देखूं उसे यहाँ वहां 
ढूंढे न मिले ऐसा भी कोई 
जिसे कहते हैं लोग चाँद 
चुपचाप देखना कुछ न कहना 
मन के आँसूं यूँही पी जाना 
उसे एहसास है ये मगर 
बंधे हैं हाथ उसके भी ऐसे 
अपनी दिनचर्या के परे 
वो भी क्या कर सकता है 
जब उसे आना चाहिए 
तब वो आता और जब 
अमावस्या आये तो गायब 
भला चुप ही तो रहा जाए 
कुछ भी तो नहीं कहा जाये 
चाहे कोई यूँही चिल्लाये 
मचाये शोर-गुल खैर 
अपनी तो हर शाम 
ख़ामोशी में बीत जाए 
ये शाम और एक सही !

~ फ़िज़ा 

Monday, April 15, 2019

एक नोटर डायम जो जल रहा है !



झुलसकर राख बन गया सब 
इतिहास का वो सुनेहरा पन्ना 
हमेशा के लिए भस्म होगया 
सालों की मेहनत, कहानियां 
खो गयीं लपटों में ऐसे कहीं
बन के एक सदमा जैसे यूँही  
यादों के काफिले और इतिहास 
सालों तक दिलाएगा याद अब
एक मातम सा माहौल और 
एक नोटर डायम जो जल रहा है !

~ फ़िज़ा 

Sunday, April 14, 2019

दो दिल प्यार में



दो दिल प्यार में 
डूबे हुए भीगे हुए 
एहसास जो दबे 
भावनायें मचले हुए 
रहते दूर-दूर मगर 
दिल रहे आस-पास
जैतून के पेड़ पर 
रोज़ मिलने का बहाना 
और न मिले तो फिर 
देर-देर तक आवाज़ देना 
तुम्हारी याद आती है 
चले आओ की बैठक 
बुलाती है !

~ फ़िज़ा  

Saturday, April 13, 2019

शुक्रिया



फूलों का गुलदस्ता
नज़र आता है मुझे 
उसका चेहरा,
खिला हुआ रंग 
हँसता हुआ कमल 
नज़र आता है,
खूबसूरत बहुत
उसपर लाज की 
लालिमा कातिल, 
किसे कहें हम 
ज़ालिम अब 
बनानेवाले तेरा,
शुक्रिया अदा करे 
वो भी और 
हम भी!

~ फ़िज़ा  

Friday, April 12, 2019

हंसी के फव्वारे ...


बरसों बाद आज खूब हँसे 
कुछ हम-उम्र थे साथ और 
बड़े भी मगर फासले कम 
दोस्ती ज्यादा अपनापन भी
मिले थे भोजनालय में सब 
बातों की लड़ियाँ जो बनी 
बनती ही गयी एक से एक 
हंसी के फव्वारे निकल पड़े 
बस कुछ देर तक बचपन 
जवानी के पल यूँ लहराए  
वक़्त का न हुआ अंदाज़
कब घंटों बीत गए और 
याद आया एक मीटिंग 
जो है अब बॉस के साथ 
पल में सोचा भाग के पहुंचे 
फिर जल्दी से किया मैसेज 
थोड़ी देर में पहुँच रहे हैं जनाब 
दोपहर के भोजन में अड़के हैं 
और फिर वोही शरारत हंसी 
जन्नत की सैर कर आये थे 
और ऐसे एक झलकी जैसे 
सब ख़त्म हुआ और आगये
दफ्तर का मेज़ कुछ लोग 
और काम !

~ फ़िज़ा  

पृथ्वी दिवस की शुभकामनाएं !

फूलों से कलियों से  सुनी है कई बार दास्ताँ  खुशहाल हो मेरा जहाँ  तो खुश हूँ मैं भी वहां  जब पड़ती है एक चोट  सीने में मेरे ...