Wednesday, January 06, 2021

बस ढूंढ़ती फिरती हूँ

 



मोहब्बत सी होने लगी है अब फिर से 

लफ़्ज़ों के जुमलों को पढ़ने लगी हूँ जब से 

जाने क्या जूनून सा हो चला है अब तो 

बस ढूंढ़ती फिरती हूँ उस शख्स के किस्से 

अलग ही सही कुछ तो मिले पढ़ने फिर से

एक दीवानगी सा आलम है अब तो ऐसे 

जब से पढ़ने लगी हूँ एक शख्स को ऐसे 

~ फ़िज़ा  

Saturday, January 02, 2021

नये साल की शुरुवात...!


नये साल की शुरुवात कुछ इस ढंग से मैंने की 

प्रकृति के साथ और कुछ युवाओं के संग हुई 


कहते हैं पानी में रहकर मगर से न रखो कभी बैर 

सोचकर शामिल हुए बच्चों की टोली में करने सैर 


जंगलों में करने विचरण प्रकृति से कुछ बतियाने 

जीवन की तरह कुछ टेढ़े-मेढ़े मिले रास्ते राह में 


बिन मौसम बदलते पलछिन हरियाली झुंड पेड़ों के 

फिसलते ओस से लतपत मोड़ छत्रक सजीले छाल 


शुष्क हवाओं में सांस लेते हुए खुशगवार ये पल 

कैद किये यूँ इस साल फ़िज़ा ने कोरे कागज़ पर 


~ फ़िज़ा 

Thursday, December 31, 2020

ज़िंदा हो इसीलिए नया साल मुबारक ही समझना

 


हर साल आता है साल नया 

हर पुराने साल को करने विदा 

हर गुज़रे साल से सीखते नया 

मगर होता तो नहीं कुछ भी नया 

ये साल बहुत कुछ हमें सीखा गया 

क्या चाहिए और कितना बता गया 

रोज़ मिले या न मिलें हम दोस्तों से 

दिखा दिया कौन अपना और पराया 

पैसों की ज़रुरत कम इंसान काम आया 

घर की दाल-रोटी आम का अचार भला  

स्वस्थ और स्वादिष्ट खाना सीखा गया 

ज़रुरत तो वैसे कुछ भी नहीं जीने के लिए 

वक्त ने इंसान को फिर किसान बना दिया 

बगीचों में टमाटर धन्या अब उगने लगा 

रोज़ परिवार संग बैठकर योजना बनाने लगा 

छोटे से बड़ा घर का उत्तरदायी होने लगा 

कंपनियों को समझ आने लगा निष्ठावान का 

घर से हो या बगीचे से काम तो होने लगा 

वक्त के साथ स्वस्थ्य पर निगरानी रखने लगा 

इंसान आखिर इंसान पर भरोसा करने लगा 

ज़िन्दगी देता इंसान तो वही लेता भी जान 

मास्क न पहन गैर जिम्मेदार पार्टियां करने लगा 

अपना न सही मगर औरों को खतरे में डालने लगा 

बात भी सही है अब तो वज़न कम करो अपना 

कुछ न कुछ करो पृथ्वी पर न बनों बोझ इतना 

ज़िन्दगी में पाने के लिए खोना भी पड़ता है उतना 

फिर वो ज़िन्दगी, रिश्ते, वक्त या हो खज़ाना 

दो गज ज़मीन रोटी खाने को पीने को पानी 

ज़िन्दगी सादगी में भी वो अदा है कातिलाना 

कुछ न बदलना जो सीखा इस साल ऐ ज़माना 

अति आत्मविश्वास में अपना सब कुछ न खोना 

ज़िंदा हो इसीलिए नया साल मुबारक ही समझना  

ज़िंदा रहना औरों को ज़िंदा रेहने का प्रोत्साहन देना 

नया साल स्वस्थ सकुशल हो यही है कामना !


~ फ़िज़ा 

Tuesday, December 22, 2020

एहसास !

 

एहसास !

जो उस पल में रेहने संवरने के ख़ुशी में 

बाकि हर पल को भूल जाने या भुला देने में 

जो शायद उम्र भर फिर हो और 

इस पल के बाद फिर शायद कभी न हो  

इस बात का कोई आसरा न भरोसा हो 

मगर उस पल में सौ बार जीने मरने का 

एहसास !

वही एक पल है जो हर सीमाओं को 

लांघकर तल्लीन रह जाना सिर्फ 

उस एक पल के लिए जो दिला दे वो 

एहसास !

जो शायद लफ़्ज़ों का मोहताज़ नहीं 

जिसे सिर्फ महसूस किया जाये 

ये एक सांस है जो सिर्फ ली जाए 

उस सांस में जी और संभल भी जायें  

एहसास !


~ फ़िज़ा 

Wednesday, December 02, 2020

ख़याल से नहीं न वो गए!


 

कुछ दिनों से आ रही थी ख़याल में 

बीती हुई कुछ पलछिन हादसे यादें 

हम सोचते रेह गए बस शायद थोड़ा 

हाँ ! थोड़ा रूककर बात ही कर लेते 

आखिरी बार ही मगर अलविदा सही 

जानते थे के बीमार ज़िन्दगी है कब?

आज अफ़सोस हुआ खबर ये जानकर 

ख़याल आया उन पलों का जब संग थे 

ख़ुशी जो हम दे सके एक-दूसरे को 

शायद अब वो नहीं हैं सोचने के वास्ते 

वो सभी जो सीखा-सिखाया साथ में 

वो सभी अब यादें रेह गयीं मेरे हिस्से में  

अफ़सोस तो हुआ ज़रूर जब सुना के 

वो अब नहीं रहे !!! आज बहुत याद आये !

ख़याल से नहीं न वो गए!


~ फ़िज़ा 

Saturday, November 28, 2020

रहो संग किसानों के यही है मेरे दिल का नारा

 


तपते हैं धुप में तपते ज़मीन को जोतते हैं 

मेहनत जीजान से करके सोना उगलते हैं 


धुप-छांव हो बरसात फसल प्यार से उगाते हैं 

अपना पेट भरने से पेहले औरों का पेट भरते हैं 


सदियों से तो यही है पेशा किसान का जो हैं 

बैल-ट्रेक्टर या खुद ही हल-जोतना बीज बोना


काम लगन से करना अपने देश का पेट है भरना 

मिटटी से नाता रखने वाले ज़मीन से जुड़े हुए हैं 


इसीलिए हर किसी का पेट भरने के बाद भी  

किसान खुद भूखा है अनाज से अपने हक्क से 


सरकारें आयीं और गए भी हैं गद्दी से कई यूँ भी 

देशवासियों की विकास और तरक्की के बहाने  


ये वही देश हैं जहाँ नारे लगे थे स्वतंत्र भारत में 

'जय जवान जय किसान' वही आज लड़ रहे हैं 


कब किसान होगा आज़ाद इन सभी बंधनों से 

जहाँ उसे उसका हक़ मिलेगा वो जियेगा चेन से 


एक निवाला जब रोटी का डालो अपने मुँह में 

ज़रूर याद करना जिसने काटे फसल धान्य के 


देश का किसान जब भूखा होगा दुखी होगा ऐसे 

तो उस अन्न का क्या हर्ष होगा जो खाएं गर्व से 


विभिन्नता में एकता इसी में है सबकी सद्भावना 

रहो संग किसानों के  यही है मेरे दिल का  नारा 


~ फ़िज़ा 

Saturday, November 14, 2020

दीप जलाओ दीप जलाओ आज दिवाली रे !



कोरोना के दिन,महीने निकल गए 

इनके साथ त्यौहार जन्मदिन भी 

संभलते बचते-बचाते निकल गए 

सुना छह दिनों की दिवाली अब के 

एक-दो दिन ही मनाई गयी इस साल 

न आना और न ही किसी को बुलाना 

सभी अपने-अपने संतुष्टि के अनुसार 

मना रहे होली और ये आयी दिवाली 

सोशल मीडिया न होता तो त्यौहार भी 

इस कोरोना की तरह घरों में दब जाती 

एक बात का पता चल गया इस बार 

कुछ सजने-संवरने के बहाने ही सही 

घर की सफाई हुई और चार लालटेन 

दीयों के कतार रंगोलियों में सजने लगे 

मिठाइयां घर की न सही हलवाई से ही 

घरों में रोशन हुए दिवाली के संस्कार यूँही 

पटाखों की बात अलग है पर्यावरण को सोच 

समय निर्धारित ही सही मगर फुलझड़ियां 

खुशिओं के जलाये तो होंगे न इस बार भी?

दीप जलाओ -दीप जलाओ आज दिवाली रे 

उन विषादों से घिरे चंद यादें दीप संग जलाये 

नए वस्त्र, नए कानों में कुण्डल मगर वो पल कहाँ 

जब मिट्टी के किले बनाकर राजा, मंत्री घोडा सजाते 

रंगोली से सजी गद्दी पर महाराज शिवाजी को बैठाते

दिवाली तो हम तब मनाते अब सिर्फ रस्म हैं  निभाते 

दीपावली की मगर सबको हैं शुभकामनाएं देते 

एक दिया उनके लिए भी जलाना जो नहीं हैं साथ 

एक उनके लिए भी जलाना जो हैं सरहद पर खड़े 

खुशियाँ और त्यौहार हर किसी के हिस्से बराबर नहीं आते 

एक मिठाई उनके नाम की भी किसी को ज़रूर खिलाना 

दीप जलाओ दीप जलाओ आज दिवाली रे !


~ फ़िज़ा  

बस ढूंढ़ती फिरती हूँ

  मोहब्बत सी होने लगी है अब फिर से  लफ़्ज़ों के जुमलों को पढ़ने लगी हूँ जब से  जाने क्या जूनून सा हो चला है अब तो  बस ढूंढ़ती फिरती हूँ उस श...