Posts

Showing posts from 2015

ज़िन्दगी जीने का नाम है ...!

क्या ग़म है मोहब्बत में जीना?

दरअसल राहें बदल गयीं इस करके भी....

सुलगती हुई ज़िन्दगी को दो उँगलियों के सहारे ...!!!

चला जा रहा था ...

इस ज़िन्दगी का क्या?

एक उड़ान सा भरा लम्हा जैसे ...!

स्वर्ग है या नरक ...!!!

दिखावे की मुस्कराहट से चेहरा नहीं खिलता ।

इंसान होना भी क्या लाचारी है!

पतझड़ में गिरा पत्ता...!

फिर काहे कड़ी से कड़ी जोड़ने की बात है ?

एक था चिड़ा और एक थी चिड़ी...

फिर उस मोड़ पर आगये हम ....!

कहाँ आगया, हाय इंसान!!!.....

कहो दिल से "जिए जा " मेरे चौथे सालगिरह पर ... :)

गुज़रते वक़्त के पन्नों को उलटकर देखा...

इजहार-ए -मुहब्बत यूँ भी करना ...!

बहुत सालों बाद बचपन लौट आया था

भटकते हैं ख़याल 'फ़िज़ा' कभी यहाँ तो कभी वहां हसास ....

विस्मरणिया है संगम ऐसा ...

'फ़िज़ा' ये सोचती रही कितना चाहिए जीने के वास्ते?

उसकी एक धुन पे चलने की सज़ा ये थी...

कुछ लोग यूँ आजकल मिलते हैं ...

न निकले बाहर न रहे भीतर सा

क्यों वक़्त ज़ाया करें ये एक जवाब बन जाता है !

कहाँ हम पहुंचे हैं किस ऒर जा रहे हैं और किसके वास्ते !?!

जाने क्यूं ?