एक था चिड़ा और एक थी चिड़ी...
एक था चिड़ा और एक थी चिड़ी
मज़बूरी कहिये या समाज की रीती
दोनों का ब्याह हुआ मिली दो कड़ी
चिड़ा था बावला चिड़ी थी नकचढ़ी
जितना चिड़ा पैर पकड़ता चिड़ी वहीँ पटकती
गुज़रते गए लम्हे कुछ साल यूँ चुलबुलाती
एक वो भी पल आया जब चिड़ा ने ली अंगड़ाई
बहार को आते देख चिड़ा ने दी दुहाई
रंगों की बदलती शाम उसपर ढलती परछाई
चिड़ी थी अब भी अपनी अकड़ में समायी
न जानी कब चिड़ा ने फेर दी नज़र हरजाई
चिड़ा था मस्त सपनो में चिड़ी थी व्यस्त करने में लड़ाई
तरह-तरह के प्रयोग करने लगी चिड़ी जादुई
कहाँ चिड़ा आता वो तो जीने लगा ज़िन्दगी ललचाई
चिड़ी भूल गयी, इस बार गधी पर नहीं परी पर है दिल आई !!!
~ फ़िज़ा
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