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अम्मा का प्यार

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दुःख क्यों होता है ये ऑंसूं क्यों नहीं रुकते  २००५ में मिली थी तुमसे न सोचा कभी  इस कदर स्नेह भर दोगी अपने वास्ते ! पहली मुलाकात और ढेर सारा प्यार  जहाँ भी जाती संग ले जाती हर जगह  अपनायियत और स्नेह से बांध लिया ! भेदभाव न किया बेटी और बहु में  जो भी दिया इज्जत और प्यार से  मुझ ही से मुझे छीन लिया इस कदर ! आज दिल रो रहा है यादों में समेटे हुए  कुछ मोहलत और मिल जाती हमें  कुछ और लम्हे बिता पाते संग तुम्हारे ! ढूंढ रहे हैं तस्वीरों में अब भी तुम्हें  आंसू मगर क्यों नहीं थमते मेरे  तुम्हारे चुटकुलों को सोच बहते हैं आँसू मेरे ! इस कदर छाप छोड़ गए हो दिल पर  तुम सा बनने की कोशिश करेंगे ज़रूर  जाते हुए भी प्यार की सीख दे गयी ! ~ फ़िज़ा   

यही थी मेरी सीख..!

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मेरे जीवन के एक कण  से  कल मेरे बेटे का राब्ता हुआ  देखकर गले लगा और फिर  फुट-फुट कर रोया दुलारा  उसके आँसुंओं को देखकर  लगा मेरा बेटा अब बड़ा हुआ  ज़िन्दगी के रास्ते सरल होते  जब माँ-पिता के संग रहते  अपनी दुनिया बसाने चलते  यही सीख दे सकी मैं उसे  ज़िन्दगी में वही करना जो  तुम्हें अच्छा लगे और वही  जो तुम्हें खुश रखे जीवन में  बाकी हर उस चीज़ से दूर  रहना जो जीवन में दुःख दें  ज़िन्दगी ज़िंदादिली का नाम  जीना जहाँ ख़ुशी हो साथ  यही थी मेरी सीख जो दी  बेटे को उसके तेरहवें साल  ~ फ़िज़ा 

माँ का जीवन सदा यही है

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दुनिया बड़ी ज़ालिम है  यही कहा था माँ ने  संभलना हर कदम में  यही कहा हरदम माँ ने  कभी अकेले न जाना रस्ते में  कोई बेहला के न ले जाए  गर कोई ले भी गया प्यार से  अपने कदमों में खड़े रहना अपने दम से  ये एक माँ ही केह सकती है बेटी से  गर्व है, सबकुछ तो नहीं सुना माँ का  मगर कुछ बातों का किया पालन  आज हूँ मैं अपने कदमों का बनके सहारा  दे सकूं किसी और को भी सहारा  सर उठाकर जी भी सकूं अकेले  चाहे रहूं मैं नकारा  मेरी माँ थी बढ़ी कठोर बचपन में  शायद मुझे कठोर बनाने के लिए  दिल से रही वो मोम रही पिघलती  रेहती  सुबह-शाम फ़िक्र में  समझ न पायी उसकी ये बेचैनी  जब तक मैं न हुई माँ बनके सयानी  माँ का जीवन सदा यही है  मृत्यु तक बच्चों का सौरक्षण  यही है जीवन की कहानी  यही है जीवन की कहानी ! ~ फ़िज़ा 

क्या ग़म है मोहब्बत में जीना?

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जब भी कभी मोहब्बत की आग जली  हर किसी ने उसे बुझाने की सोची   चाहे वो एक धर्म जाती के हों   या अलग-अलग धर्म प्रांतों के   समाज हमेशा पेहरे देने पर चली  रोकना, दखल देने में रही उलझी   कभी किसी ने भी अपने मन कि की  तब हर बार समाज की उठी उंगली  जाने क्या गलत है मोहब्बत में   हर कोई मारा गया मोहब्बत में  हीर-राँझा या रोमियो जूलिएट  बलिदान की सूली पर आखिर गुज़री  मरना तो हर किसी को है फिर  क्या ग़म है मोहब्बत में जीना?   ~ फ़िज़ा 

Maan ke aanchal mein samaya subh-o-sham

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Oske aane ki hulchul Har tarf rahi subh-o-sham Kis din, nis din yehi charcha Khule aam subh-o-sham Koi kasar na rakhi paalne mein Khilakar, lori sunakar subh-o-sham Raunak se bani mehafil saji Har pal kilkariyaan maarte subh-o-sham Khelte-khilaate dost banaate Maan ke aanchal mein samaya subh-o-sham Dheere –dheere ye pal bitenge Beta ho jayega bada subh-o-sham Apni hasi ke phavaare yoon hee rakhna Baant-te sabhi se subh-o-sham Bhed-bhav na karna kisi mein Jaise ab ho raho hamesha subh-o-sham Maan, behan ho, ya ho dost Sada rakhna onki shaan subh-o-sham Jis din tum aaye is duniya mein Yaad rakhiye oska mayna subh-o-sham Khush rehana aur rakhna sabhi ko Yaad rahe ye ek maa ka gyaan subh-o-sham ~ fiza