ज़िन्दगी तेरे खेल भी निराले हैं
ज़िन्दगी भी क्या ज़िन्दगी है, ये कैसा इसका फ़साना है,
हर मोड़ पर संग भी देती, फिर तन्हाई का ठिकाना है।
दिल को हर किसी से जोड़ दे, ऐसी इसकी रवानी है,
पास लाकर फिर सिखाती, दूरी ही असली कहानी है।
जीना ही नहीं, जीने की चाह में हमें लालची बना देती,
आदत पड़ते ही फिर ये, सबसे गहरी सीख सुना देती है।
“अपनी राह खुद ही चुनो, औरों से थोड़ा जुदा रहो,”
अकेले आए थे तुम यहाँ, अकेले ही मुस्कुरा के बहो।
ये जीवन का खेल निराला, सबके अपने-अपने नियम हैं,
यहाँ कोई किसी का सहारा नहीं, बस चलते अपने कदम हैं।
उम्मीदों का बोझ न रखना, दिल को हल्का ही रहने दो,
सुने कोई तो ठीक, न सुने—तो भी ख़ामोश ही रहने दो।
न समझाने में उम्र गँवाओ, न किसी को मनाने में,
ज़िन्दगी के रंग निराले हैं, बस खुद को पहचानने में।
ज़िन्दगी तेरे खेल भी निराले हैं, हर मोड़ नया अफ़साना है,
हर मोड़ पर संग भी देती, फिर तन्हाई का ठिकाना है।
~ फ़िज़ा

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