युद्ध की पाठशाला
बचपन में स्कूल की किताबों में
युद्ध के किस्से पढ़े थे हमने—
ख़ून, तबाही,
और इंसानियत की हार के अध्याय।
इतिहास था वो—
बीते ज़माने की सीख,
जहाँ अध्यापिका कहती थीं—
“इतिहास से सीखो,
ताकि वही ग़लतियाँ दोहराई न जाएँ।”
पर आज—
वही पन्ने जैसे फिर खुल गए हैं।
तब भी थे नाम—
इंडिया-पाकिस्तान,
अमेरिका-इराक,
इज़राइल-फ़िलिस्तीन।
और आज—
रूस-यूक्रेन,
फिर अमेरिका-ईरान।
कहाँ गए वो लोग
जो इतिहास पढ़ते और पढ़ाते थे?
क्यों नहीं कोई
इनके कान खींचकर
सीखाता इन्हें—
कि ये ग़लत है!
ये खेल नहीं—
इंसानियत का अंत है,
वंशजों के लिए
दर्दनाक विरासत है।
क्यों नहीं कोई कहता—
गरीबी मिटाओ,
लोगों को जीने दो
एक सादा, सुकून भरा जीवन।
ये कैसी दुनिया है—
जहाँ सब जानते हैं
क्या सही है, क्या ग़लत,
फिर भी युद्ध छिड़ते हैं,
लोग मरते हैं।
कान सुन्न हो गए हैं,
आँखें जैसे मर चुकी हैं—
अब कोई चीख़,
कोई तबाही
हमें चौंकाती नहीं।
हम इंसान हैं—
या अंदर से शैतान?
या फिर
ज़िंदा लाश बन चुके हैं?
क्यों नहीं कोई
इन नेताओं को भी
प्रिंसिपल के दफ़्तर ले जाए,
सज़ा दे—
ताकि वे समझें
क्या होता है दर्द।
ताकि एक दिन—
इस युद्धग्रस्त दुनिया में
लोग डर नहीं,
सुकून की साँस ले सकें।
~ फ़िज़ा

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