Monday, April 17, 2017

तब आयी एक नन्ही कली...


जहां में थी जब मैं अकेली 
तब आयी एक नन्ही कली 
सोचा न था, मैं हैरान हूँ पगली !
बस यकीन था खुद पर 
चलना,सफर गर ज़िन्दगी 
सोचा न था, मैं हैरान हूँ पगली !
तो साथ में हो मेरी सखी 
छोटी थी मेरी राजदार मगर 
सोचा न था, मैं हैरान हूँ पगली !
हर सुख-दुःख में निभानेवाली 
मेरी नन्ही कली, चंचल मतवाली 
सोचा न था, मैं हैरान हूँ पगली !
कभी हम ज़िंदादिली सीखाएं 
तो कभी वो हमें सीखाएं 
सोचा न था, मैं हैरान हूँ पगली !
है तो मेरी ही विस्तार 
मगर मैं मुड़कर देखूं पीछे 
सोचा न था, मैं हैरान हूँ पगली !
अपनी उम्र न कभी गिनी मैंने 
कब हो गयी ये फूल मेरी कली 
सोचा न था, मैं हैरान हूँ पगली !
फिर सोचूं क्यों मैं गिनूँ साल 
अब तो है मेरी बराबर की सखी 
सोचा न था, मैं हैरान हूँ पगली !

~ फ़िज़ा 

No comments:

मोहब्बत ही न होता तो मैं कहाँ होता?

मोहब्बत में मैं नहीं होता तो खुदा होता  मोहब्बत ही न होता तो मैं कहाँ होता? फ़िज़ा में दिन नहीं होता तो क्या होता?  दिन नहीं जब हो...