बरसाती एहसास


 बारिश की बूंदों में अश्क़ उतर आते है

दोस्तों के साथ से ग़म संवर जाते हैं !


आग दिल में जले तो नूर भी साथ लाती है,

हद से बढ़े तो ख़ुद को ही राख़ कर जाती है।


कभी लम्स बनकर बारिश रूह को छू जाए,

कभी सैलाब बनकर हर वहम बहा ले जाए।


ज़िंदगी की कश्ती मौजों के दरमियाँ चले,

कभी सजदे में झुके, कभी खुद में संभले।


बरसाती छाते सी हालत, उलट-पुलट का सफ़र,

फिर भी चलती रहती है साँसों की ये डगर।


साल आते हैं, जाते हैं, वक़्त का क्या गिला,

ज़िंदगी मुख़्तसर सही, इश्क़ से हो सिलसिला।


सूरज पैग़ाम-ए-हयात दे, चाँद भी ‘फ़िज़ा’ नूर लुटाए,

ज़िंदादिली में जो जी ले, वही मुकम्मल कहलाए।


~ फ़िज़ा 

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