Wednesday, April 04, 2018

ख्वाब को कौन रोक सका है 'फ़िज़ा'


मेहकते हैं फूल मुरझाएं तो क्या
गंध फिर भी सुनहरी रेहा जाती है !

कुछ दिनों के लिए ही सही जानिये
अरमान संवर जाते हैं जीने के लिए !

कोई कली जब बाग़ में खिलती है
हों न हों ख्वाईशें जनम ले लेतीं हैं !

आसमान चाहे खिड़की से नज़र आये
उड़ने की चाह उसके भी मन में आये !

ख्वाब को कौन रोक सका है 'फ़िज़ा'
बंद ही नहीं खुली आँख से भी दिखते हैं !

~ फ़िज़ा 
#happypoetrymonth

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