Saturday, April 14, 2018

शर्मसार दुर्भाग्य




अमानवीय क्रूर जघन्य
लाचार मायूस मनहूस
बेबाक शर्मनाक खूंखार
सर्वनाश हिंसक हैवान
बलात्कारी जानवर
अन्याय असहनीय
शर्मसार दुर्भाग्य
बेटी माता-पिता
मजबूर इंसान
~ फ़िज़ा 
#happypoetrymonth

No comments:

भेद-भाव का न हो कहीं संगम !

कविता पढ़ने -सुनने की नहीं है इसे पहनो, पहनाने की ज़रुरत है वक्त बे वक्त बरसों से ज़माने में हैं महाकवि से लेकर राष्ट्र कवी तक हैं देश ...