Wednesday, April 25, 2018

नाबालिग थी वो !



पहली बार जब बत्तमीज़ी की थी
तभी बहुत ही अजीब लगा था
समझ नहीं आया कैसे कहें
किस से करें शिकायत
जाने क्या ग़लत हो जाये
लोगों को पता चले तो
जाने क्या लोग कहेंगे
इसी असमंजस में
अपमान सहते रहे
और फिर एक दिन
जो हरकत की उसने
सिर्फ चीखें निकली
बाद में लाश !
कौन थी वो
सबने पुछा
नाबालिग थी वो !

~ फ़िज़ा 
#happypoetrymonth

No comments:

दिल में पनपते प्यार के बोल

कभी कुछ गरजते बादल मंडराते हुए छाए बादल एहसासों के अदल -बदल विचारों में विमर्श का दख़ल असमंजस, उलझनों का खेल रखते हमेशा आसमां से मेल फिर व...