Sunday, April 28, 2019

पंछियों की गुफ्तगू


आज कहने को कुछ भी नहीं
पंछियों को गुफ्तगू करते देखा 
जहाँ दो साथी एक परिवार के 
गृहस्थी के रोज़मर्रे और ये झमेले 
दोनों निकले घर से बटोरने चने 
बटोरना तो मगर चुपके -चुपके 
क्यों न एक बटोरे चुपके-चुपके 
और दूजा देखे पेहरा देते-देते 
रंगीले जोड़ी की मिली-जुली  
हरकत तो देखो है एकता उनमें भी !

~ फ़िज़ा 

No comments:

ज़िन्दगी से कोई क्या गिला करे?

ज़िन्दगी से कोई क्या गिला करे? जब ज़िन्दगी ही कुछ न कर सके  बहती धारा की तरह निकलती है  सरे आम घूम-घाम कर बढ़ती है  और देखो तो ज...