ऐसा था कभी अपने थे सभी, हसींन लम्हें खुशियों का जहाँ !
राह में मिलीं कुछ तारिखियाँ, पलकों में नमीं आँखों में धुआँ !!
एक आस बंधी हैं, दिल को है यकीन एक रोज़ तो होगी
सेहर यहाँ !
ये कविता मैंने तब लिखी थी जब लेबन्न में लडाई छिङ गई थी । जहॉ बच्चों की लाशें गिर रही थीं...और इस तरफ एक मासूम बच्चा अपने पापा की ऊँगलियाँ पकड कर पारकींग लॉट पर चला जा रहा था.... ज़िंदगी तुझ से कोई शिकायत नहीं क्योंकि, तुने वो सब दिया जो कभी मैंने माँगा नहीं और जो कभी मैंने चाहा भी नहीं कितना इंसाफ है तेरी जूस्तज़ू में जो कभी अपना तो क्या पराया भी नहीं जताता मैं सोच में रेहती हूँ ज़िंदगी तू मेरा अपना है या पराया? तू तो हवा का झोंका है जो कभी ठंडी हवा से दिल मचला दे तो कभी तूफान बनकर खडा हो जाऐ। ज़िंदगी तेरे तो खेल निराले हैं तुझे मैं क्या कहूँ - आ देखें तेरी अगली चाल क्या है ।?। ~फ़िज़ा
कोरोना के दिन हैं और उस पर आज शुक्रवार की शाम, इरफ़ान खान की फिल्म "क़रीब क़रीब सिंगल" देखी, जो फिल्म पहली बार में हंसी-मज़ाक ले आयी थी वही दोबारा देखने पर हंसी तो ले आयी मगर दो आंसूं भी.. ! इस ग़म को भगाने के लिए दिल बेचारा - सुशांत सींग राजपूत की फिल्म भी देख ली ! अलविदा बहुत ही मुश्किल होता है, मगर लिखना आसान !!!! ये कविता उन सभी के नाम जो अपनों को खोकर अलविदा नहीं कह पाते !!! क्यों जुड़ जाते हैं हम जाने-अनजाने लोगों से न कोई रिश्ता न दोस्ती फिर भी घर कर लेते हैं दिल में जैसे कोई अपने ख़ुशी देते हैं जैसे सपने चंद फिल्में ही देखीं थीं बस दिल से अपना लिया कहानी को सच समझ कर उनके साथ हंस-रो लिया हकीकत की ज़िन्दगी सब अलग अपनी-अपनी होती हैं आज उनकी फिल्मों को देख उनके अपनों को सोच कर उनकी ज़िन्दगी के खालीपन और उनके बीते गुज़रे कल की यादों में रहकर जीने वाले सोचकर बहुत रो दिए! ~ फ़िज़ा
खूबसूरत हवाओं से कोई कह दो यूँ भी न हमें चूमों के शर्मसार हों माना के चहक रहे हैं वादियों में ये कसूर किसका है न पूछो अब बहारों की शरारत और नज़ाकत कैसे फिर फ़िज़ा न हो बेकाबू अब सजने-संवरने के लाख ढूंढे बहाने दिल की मर्ज़ी कब सुने किसी की आखिर हुस्नवालों बता भी दो वजह फूलों के मुस्कान पे फ़िज़ा डोरे न डालो ~ फ़िज़ा
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