रास्ते के दो किनारे
रास्ते के दो किनारे संग चलते
मिल न पाते मगर साथ रेहते
मैं इन दोनों के बीच चलती
भीड़ में रहकर तनहा सा लगे
किसी अनदेखे खूंटी से जैसे
अपने आपको बंधा सा पाती
छूटने की कोशिश कभी करती
फिर ख़याल आता किस से?
बहुत लम्बा है ये सफर मेरा
कब ख़त्म होगा कहाँ मिलेगी
ये राहें कहीं मिलेंगी भी कभी?
थकान सा हो चला है अब तो
किसी तरुवर की छाया में अब
विश्राम ही का हो कोई उपाय
निश्चिन्त होकर निद्रा का सेवन
यही लालसा रेहा गयी है मन में
तब तक चलना है अभी और
जाने कहाँ उस तरुवर का पता
जिसके साये में निवारण शयन का !
~ फ़िज़ा
Comments
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार (११-०९-२०२०) को '' 'प्रेम ' (चर्चा अंक-३८२२) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है
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अनीता सैनी
@ सुशील कुमार जोशी : आपका बहुत बहुत शुक्रिया मेरी इस कृति को सराहने का!