Wednesday, May 13, 2020

औरत को कौन जान पाया है?


औरत को कौन जान पाया है?
खुद औरत, औरत का न जान पायी 
हर किसी को ये एक देखने और 
छुने की वस्तु मात्र है तभी तो 
हर कोई उसके बाहरी खूबसूरती 
को ही निहारता है या फिर 
नुख्स निकालता है !
औरत को कौन जान पाया है?
खुद औरत, औरत का न जान पायी !
उसके पैदा होने से लेकर 
उसकी खूसबसुरति और नियति 
दोनों का ही भविष्य निर्धारित है 
या तो बहुतों के दिल जलायेगी 
या फिर खुद किसी दिन जल जाएगी !
औरत को कौन जान पाया है?
खुद औरत, औरत का न जान पायी !
उसके लड़कपन पहुँचने तक उसकी 
ज़िन्दगी हॉर्मोन्स की चपेट में आ जाता है 
उसकी खूबसूरती का अनुमान फिर लगाया जाता है 
उसके मुहांसे, उसका कद, उसका शरीर उसके लिए 
एक मापने का यन्त्र बन जाता है 
औरत को कौन जान पाया है?
खुद औरत, औरत का न जान पायी !
लड़कपन से कब जवानी आयी और गयी 
उसके तो हाथ भी पीले कर दिए और 
अब वो दो-चार बच्चों की माँ बन गयी 
तब भी बाहरी खूबसूरती की ही चर्चा रही 
उसके हॉर्मोन्स उसका पीछा नहीं छोड़ पायी 
औरत को कौन जान पाया है?
खुद औरत, औरत का न जान पायी !
उसकी जवानी, उसका अस्तित्व कौन जानें 
सब कुछ तो कोई और तैय करे 
बच्चे बड़े होगये तो क्या उसकी जिम्मेदारी वही
मगर हॉर्मोन्स के खेल अब भी कम नहीं हुए 
वो अब रजोनिवृत्ति के दायरे से गुजरने लगी 
औरत को कौन जान पाया है?
खुद औरत, औरत का न जान पायी !
वो इस तरफ तो कभी उस तरफ संतुलन के 
उसे खुद नहीं खबर उसके मानसिक हाल की 
आज आसमान ऊपर तो पल में नीचे है उसके 
उसकी जवानी के सिर्फ किस्से रेहा जाते हैं 
कभी जवानी में सराहे नहीं बल्कि अब याद दिलाये जाते हैं 
औरत को कौन जान पाया है?
खुद औरत, औरत का न जान पायी ! 
वो खुद भी नहीं जानती उसे क्या हो रहा है 
उसकी मानसिक और शारीरिक यातना 
क्यों बदलती है रोज़ अचानक 
क्यों उसकी उम्र होने पर भी 
उसकी तकलीफों का कोई अंत नहीं 
औरत को कौन जान पाया है?
खुद औरत, औरत का न जान पायी !


~ फ़िज़ा 

No comments:

जीवन तो है चलने का नाम ...!

जीवन है चलने का नाम  देते यही सबक और धाम   कुछ लक्ष्य जीवन के नाम  रख देते हैं समाज में पैगाम  चंद गंभीरता से पहुँचते मुकाम  ...