क्या रंग है अापका?


मुझसे न देखा गया 
उसका ढंग 
उसका ये तरंग 
सिर्फ काफी था उसका रंग !
अब सब साफ नज़र अाता था 
सभी तोहमतें उसपर 
सभी इल्ज़ाम उसपर 
क्यूंकि उसका था ही ऐसा रंग 
होश खो बैठा, करने लगा जंग  
देखा जो लाल खून उसका भी 
मेरा भी है तो एक जैसा ही रंग 
क्या मिलेगा काटकर अंग 
घूम हो जाएंगे इसमें  तंग
कल जब ढूँढोगे मुल्कों 
न मिलेगा कोई साथी-संग
तब लगेगा सबकुछ बेरंग 
तरसोगे लेके दिल की उमंग 
 क्या रंग है अापका?
क्या ढंग है अापका? 
जाने क्यूँ लगते हो 
जाने-पहचाने  रिश्ते का 
हैं तो सब अपने अम्मा के 
लाए क्यूँ नही वो प्यार 
जो लिया था मगर दिया नहीं 
किसी और को !
कहां रखते हो इतनी नफरत 
कहां लेके जाओगे 
इतनी नफरत जो खत्म न हो 
इस जहां में जब लोग ही खत्म हो जाएंगे !

~ फ़िज़ा 

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