Monday, March 16, 2015

मौसम की तरह वो बहार बनके आया



मौसम की तरह वो बहार बनके आया
खिलता हुआ तो कभी फलता हुआ आया
जिसे देखता वो उन्हें अपने पास लाता गया 
मिलनसार था वो मौसमों की तरह लेहराता गया 
फिर ना चाहते एक वो मौसम भी आया 
पतझड की तरह वो उसे भी साथ ले गया 
दरख्त की तरह तो दरस की तरह यादें छोड़ गया 
बैठें हैं उसकी छाँव में आज यादें ही सिर्फ  रेहा गया 
~ फ़िज़ा 

No comments:

मोहब्बत ही न होता तो मैं कहाँ होता?

मोहब्बत में मैं नहीं होता तो खुदा होता  मोहब्बत ही न होता तो मैं कहाँ होता? फ़िज़ा में दिन नहीं होता तो क्या होता?  दिन नहीं जब हो...