Posts

तरुवर की माया

Image
  देखता सब है वो मगर नज़र उस पर नहीं  खबर सबकी है उसे जानता कोई भी नहीं ! ख्याल वो सबका रखता उसका कोई नहीं  उसके सहारे फलते मगर नाम उसका नहीं ! सेहता कोई भोगता कोई सच कोई जाने नहीं  मौज करता कोई वो कर्म करता कहता नहीं ! जैसा सभी को दिखता है वो असल में है नहीं  उम्र गुज़री धुप-छाँव में अब कोई पूछता नहीं !!   ~ फ़िज़ा 

बस ढूंढ़ती फिरती हूँ

Image
  मोहब्बत सी होने लगी है अब फिर से  लफ़्ज़ों के जुमलों को पढ़ने लगी हूँ जब से  जाने क्या जूनून सा हो चला है अब तो  बस ढूंढ़ती फिरती हूँ उस शख्स के किस्से  अलग ही सही कुछ तो मिले पढ़ने फिर से एक दीवानगी सा आलम है अब तो ऐसे  जब से पढ़ने लगी हूँ एक शख्स को ऐसे  ~ फ़िज़ा  

नये साल की शुरुवात...!

Image
नये साल की शुरुवात कुछ इस ढंग से मैंने की   प्रकृति के साथ और कुछ युवाओं के संग हुई  कहते हैं पानी में रहकर मगर से न रखो कभी बैर  सोचकर शामिल हुए बच्चों की टोली में करने सैर  जंगलों में करने विचरण प्रकृति से कुछ बतियाने  जीवन की तरह कुछ टेढ़े-मेढ़े मिले रास्ते राह में  बिन मौसम बदलते पलछिन हरियाली झुंड पेड़ों के  फिसलते ओस से लतपत मोड़ छत्रक सजीले छाल  शुष्क हवाओं में सांस लेते हुए खुशगवार ये पल  कैद किये यूँ इस साल फ़िज़ा ने कोरे कागज़ पर  ~ फ़िज़ा 

ज़िंदा हो इसीलिए नया साल मुबारक ही समझना

Image
  हर साल आता है साल नया  हर पुराने साल को करने विदा  हर गुज़रे साल से सीखते नया  मगर होता तो नहीं कुछ भी नया  ये साल बहुत कुछ हमें सीखा गया  क्या चाहिए और कितना बता गया  रोज़ मिले या न मिलें हम दोस्तों से  दिखा दिया कौन अपना और पराया  पैसों की ज़रुरत कम इंसान काम आया  घर की दाल-रोटी आम का अचार भला   स्वस्थ और स्वादिष्ट खाना सीखा गया  ज़रुरत तो वैसे कुछ भी नहीं जीने के लिए  वक्त ने इंसान को फिर किसान बना दिया  बगीचों में टमाटर धन्या अब उगने लगा  रोज़ परिवार संग बैठकर योजना बनाने लगा  छोटे से बड़ा घर का उत्तरदायी होने लगा  कंपनियों को समझ आने लगा निष्ठावान का  घर से हो या बगीचे से काम तो होने लगा  वक्त के साथ स्वस्थ्य पर निगरानी रखने लगा  इंसान आखिर इंसान पर भरोसा करने लगा  ज़िन्दगी देता इंसान तो वही लेता भी जान  मास्क न पहन गैर जिम्मेदार पार्टियां करने लगा  अपना न सही मगर औरों को खतरे में डालने लगा  बात भी सही है अब तो वज़न कम करो अपना  कुछ न कुछ करो पृथ्वी पर न बन...

एहसास !

Image
  एहसास ! जो उस पल में रेहने संवरने के ख़ुशी में  बाकि हर पल को भूल जाने या भुला देने में  जो शायद उम्र भर फिर हो और  इस पल के बाद फिर शायद कभी न हो   इस बात का कोई आसरा न भरोसा हो  मगर उस पल में सौ बार जीने मरने का  एहसास ! वही एक पल है जो हर सीमाओं को  लांघकर तल्लीन रह जाना सिर्फ  उस एक पल के लिए जो दिला दे वो  एहसास ! जो शायद लफ़्ज़ों का मोहताज़ नहीं  जिसे सिर्फ महसूस किया जाये  ये एक सांस है जो सिर्फ ली जाए  उस सांस में जी और संभल भी जायें   एहसास ! ~ फ़िज़ा 

ख़याल से नहीं न वो गए!

Image
  कुछ दिनों से आ रही थी ख़याल में  बीती हुई कुछ पलछिन हादसे यादें  हम सोचते रेह गए बस शायद थोड़ा  हाँ ! थोड़ा रूककर बात ही कर लेते  आखिरी बार ही मगर अलविदा सही  जानते थे के बीमार ज़िन्दगी है कब? आज अफ़सोस हुआ खबर ये जानकर  ख़याल आया उन पलों का जब संग थे  ख़ुशी जो हम दे सके एक-दूसरे को  शायद अब वो नहीं हैं सोचने के वास्ते  वो सभी जो सीखा-सिखाया साथ में  वो सभी अब यादें रेह गयीं मेरे हिस्से में   अफ़सोस तो हुआ ज़रूर जब सुना के  वो अब नहीं रहे !!! आज बहुत याद आये ! ख़याल से नहीं न वो गए! ~ फ़िज़ा 

रहो संग किसानों के यही है मेरे दिल का नारा

Image
  तपते हैं धुप में तपते ज़मीन को जोतते हैं  मेहनत जीजान से करके सोना उगलते हैं  धुप-छांव हो बरसात फसल प्यार से उगाते हैं  अपना पेट भरने से पेहले औरों का पेट भरते हैं  सदियों से तो यही है पेशा किसान का जो हैं  बैल-ट्रेक्टर या खुद ही हल-जोतना बीज बोना काम लगन से करना अपने देश का पेट है भरना  मिटटी से नाता रखने वाले ज़मीन से जुड़े हुए हैं  इसीलिए हर किसी का पेट भरने के बाद भी   किसान खुद भूखा है अनाज से अपने हक्क से  सरकारें आयीं और गए भी हैं गद्दी से कई यूँ भी  देशवासियों की विकास और तरक्की के बहाने   ये वही देश हैं जहाँ नारे लगे थे स्वतंत्र भारत में  'जय जवान जय किसान' वही आज लड़ रहे हैं  कब किसान होगा आज़ाद इन सभी बंधनों से  जहाँ उसे उसका हक़ मिलेगा वो जियेगा चेन से  एक निवाला जब रोटी का डालो अपने मुँह में  ज़रूर याद करना जिसने काटे फसल धान्य के  देश का किसान जब भूखा होगा दुखी होगा ऐसे  तो उस अन्न का क्या हर्ष होगा जो खाएं गर्व से  विभिन्नता में एकता इसी में है सबकी सद्भावना  रहो संग...