Wednesday, November 29, 2006

वो राहगिर जगह-जगह घूम आयेगा

कभी-कभी प्‍यार इंसान को उस ऊँचाई तक ले जाती है
जब वो अपने दायरे को लाँघ कर आगे निकल जाती है
फिर वो किसी एक की नहीं रेह जाती....
रोज़मरे की बातों से हटकर कुछ गुलाबी एहसासों को
पिरोने की एकमात्र कोशिश है....
आप की राय की मुंतजि़र

तुम्‍हारे प्‍यार के बरसात की एक बूँद
समेट लिया है मैंने मेरे आँचल में
आज एक बीज बनकर ही सही
कल एक कँवल बन के खिलेगा

अपनी खुशियों की दास्‍तान
वो सुनायेगा सभी को
दिलाकर एहसास हमारे प्‍यार का
वो राहगिर जगह-जगह घूम आयेगा

~फिजा़

3 comments:

Anil Sinha said...

वाह। :-)

Pritika Gupta said...

pyar le jata hai hota hai le jati nahi hota.. u cud have used word "preet"

Marthyan said...

Kya baath hein Dawn ji

भंवरें भी गुंजन गायेंगे !

पतझड़ का मौसम आया  और चला भी जायेगा  पुराने पत्ते खाद बन कर  नए कोपलें शाख पर  सजायेंगे ! तन्हाई भी कभी रूकती नहीं     रहगुज...