Monday, October 16, 2017

मोहब्बत ही न होता तो मैं कहाँ होता?


मोहब्बत में मैं नहीं होता तो खुदा होता 
मोहब्बत ही न होता तो मैं कहाँ होता?

फ़िज़ा में दिन नहीं होता तो क्या होता? 
दिन नहीं जब होता तब रात ही होता 

दरख़्त में पत्ते,शगोफा, खार तो होता 
गर शगोफा होता तो गुल ज़रूर होता 

आसमां पर अफ़ताब दिन में ज़रूर होता 
शब् पे कोई हो न हो माहताब ज़रूर होता 

ज़िन्दगी मसरत नहीं होता गर ग़म न होता 
ज़िन्दगी क्या होता गर वफ़ात नहीं होता ?

~ फ़िज़ा   

Monday, October 02, 2017

क्यों? किस लिए? क्या पाया? क्या मिला?


एक आवाज़ और गोली ने भून दिया 
सबको छलनी-छलनी कर दिया 
हर तरफ लहू का गलीचा बिछा दिया 
चीखते-चिल्लाते, बिलखते बचते-बचाते 
सुर्ख़ियों में लरजते कुछ ज़िन्दगियाँ 
मरने वाला भी न रहा और मारने वाला भी 
जाने कौन देस से था वो हाड़ -मांस का 
किस बात की तमन्ना पूरी कर गया यूँ 
के बचे लोगों में सवाल बनके रहा गया 
क्यों? किस लिए? क्या पाया? क्या मिला?
सृष्टि का खेल या दिमागी असमंजस 
हैवानियत का एक और प्रदर्शन दूरदर्शन पर था!
  
~ फ़िज़ा 

Sunday, October 01, 2017

समय-समय की बात है धैर्य, सैय्यम 'फ़िज़ा'





कोई दूर होने के लिए दूर करता है 
कोई अपनी नफरत जताने के लिए ! 

किसी को नीचा दिखाकर मज़ा आता है  
कोई अपना बड्डपन जताकर करता है !

इंसान कहाँ तक जायेगा अहम् लेकर
खुद भी जलेगा, सिर्फ खुद ही जलेगा !

रंगमंच पर सभी आते हैं निभाने किरदार  
दृश्य भी बदल जायेगा स्थल के अनुसार !

ढूंढो तो जहाँ में क्या नहीं मिल जाता 
इंसान को इंसान मिलते लगती नहीं देर!

समय-समय की बात है धैर्य, सैय्यम 'फ़िज़ा' 
वक़्त आएगा जहाँ में कोई तो होगा अपना वहां !
  
~ फ़िज़ा 

Tuesday, September 05, 2017

अभिव्यक्ति की स्वंतंत्रता हक़ है हर एक का !!


हैवानियत पर उतर आये लोग 
जब किसीने दिखाया आईना
आईना था ही इतना भयंकर 
खुद भी न देख सके चेहरा 
प्रतिरूप देख कर सिर्फ 
हत्या ही बन पड़ा उनसे !
कब तक करोगे बंद आवाज़ 
कब तक करोगे हातपाई 
कब तक करोगे गुंडागर्दी 
आखिर कब तक ये सहेंगे भी 
एक से बढ़कर एक आवाज़ 
पैदा होगी जनतंत्र में कई यहाँ !
हर दबायी आवाज़ को बुलंद कर 
जहाँ आवाज़ को खामोश किया 
वहां कलम से तू काम कर, प्रहार कर  
निडर निर्मोही कर निर्लज अन्याय का 
प्रजातंत्र को न मायूस कर यूँ हैवान  
एक आवाज़ को दबाने वाले प्राणी !
सौ खड़े हो जायेंगे बनकर वही आवाज़ 
तर्कसंगत से बनेगा एक स्वच्छ समाज 
अभिव्यक्ति की स्वंतंत्रता हक़ है हर एक का !!   
  
~ फ़िज़ा 

Saturday, September 02, 2017

प्रेम-सागर का मंथन पाया !!!

दिल को वीरान रखा 
शरीफों सा रहना सीखा 
जैसा ज़माना कहता है 
वैसा रेहन -सेहन रखा !

सोचा कोई रखे न रखे  
ज़िन्दगी को दाव पे रखें 
सेवा में जीवन को परखें  
औरों की ख़ुशी में सुख देखें !!

निष्कलंक मन से की सेवा 
सुख के रूप में पाया मेवा 
वीरान दिल में था बस लावा 
प्रेम-सागर का मंथन पाया !!! 

~ फ़िज़ा 

Monday, August 21, 2017

कैसी अदभुद है ये मिलन ..!


मेरे मिलन की रैना सजाने 
ख़याल लेके आया दिन में 
कैसी अदभुद है ये मिलन 
जहाँ में मचा रखा कौतूहल 
हर उस शर्मीली अदा को 
समाबद्ध करते चले गए  
हर किसी की नज़र में 
प्यार नज़रबंद हुआ एल्बम में  
रह गया समय का ये खेल  
इतिहास के पन्नों पर जैसे 
हमेशा के लिए इस मिलन को  
दे दिया एक नाम सूरज और चाँद 
के ग्रहण की गाथा जैसे अमर-प्रेम!

~ फ़िज़ा 

Saturday, August 19, 2017

रंगों से परहेज़ न करो...!

कोरे कागज़ को देख 
मन मचल उठा यूँही
कुछ रंगो की स्याही 
छिड़क दिया उनपर 
लगे अक्षर जुड़ने 
बनकर एक कविता 
करने लगे इशारे 
झूमने लगे इरादे  
बरसने लगी वर्षा 
यूँही कुछ मोर 
झूमने लगे नाचने 
कुछ देर ही में जैसे 
रास-लीला होने लगे 
झूमती बहारों को देख 
सोचने 'फ़िज़ा' लगी 
कितने सूने से थे ये 
जब कागज़ था कोरा 
रंगों से परहेज़ न करो 
इनके बिना जग सुना 
लगे !

~ फ़िज़ा 

Friday, July 21, 2017

ज़िन्दगी से क्या चाहिए ...


ज़िन्दगी के धक्कों में 
कहीं जवानी और ज़िन्दगी 
दोनों खो गयीं
उम्र के दायरे में 
रहगुज़र करते-करते 
ज़िन्दगी से क्या चाहिए 
ये भी न जान पाए 
वक़्त कठोरता से 
बिना रुके चलते रहा 
देख के, के कब समझोगे 
और हम वहीं सोचते रहे 
यादों के काफिलों को 
गुज़रते हुए देखते रहे 
जब काफिले थम गए 
तो याद आया चलो 
अपने लिए न सही 
किसी और के लिए 
जियें!

~ फ़िज़ा 

Sunday, July 09, 2017

बहारों का मौसम है चाँद कहाँ है आज



बहारों का मौसम है चाँद कहाँ है आज 
बहारों का मौसम है यार कहाँ है आज 
छुपकर खेलने वाले अब तो न सता यूँ 
दिन ढले आ ही जाते हैं पंछी घोसलों में 
इंतज़ार की घड़ियाँ यूँही न बढ़ाओ सनम 
शाम के बाद रात भी बहुत देर कहाँ होगी 
वक़्त को रोक लें चलो आ भी जाओ यहीं 
फिर तुम वर्धमान हों या पूरे चाँद के रूप में 
संभाल लेंगे वक़्त को तुम आओ तो सही 
बहारों का मौसम है चाँद कहाँ है आज 
कहाँ है आज?

~ फ़िज़ा 

Friday, July 07, 2017

क्यों वो साथ फ़िज़ा का नहीं ?


पूछती है मेरे अंदर की सहेली मुझसे 
कब तक औरों की ख़ुशी के लिए जिए 
जब औरों को भी ऐसा नहीं लगता हो 
तो क्यों न अपने मन की ख़ुशी जियें ?
दिल कहता है कहीं दूर निकल जाएं
छोड़-छाड़ नगरी और यहाँ के लोग 
बसर कर अजनबियों के संग ज़िन्दगी 
क्या रोक रहा है जो न खुश है कहीं?
रोटी-पानी को बिलखता देख आँसू 
हर तरफ की मारा-मारी देख उदास 
दिल से यही आवाज़ कुछ मैं भी करूँ
किसका लहू है रोके मरते को देख?
हर तरफ है आशा-निराशा कहीं तो 
एक सहारा तो चाहिए जो है उम्मीद 
देने वाला चाहे कोई भी क्यों न हो 
क्यों वो साथ फ़िज़ा का नहीं ?

~ फ़िज़ा 

Tuesday, June 20, 2017

फिरती हूँ आजकल बेहकी-बेहकी


फिरती हूँ आजकल बेहकी-बेहकी  
गुमराह रास्तों पर अजनबी-अजनबी 
मुस्कुराते चेहरे अनजानी अजनबी सी 
क्या पता है क्या ठिकाना इस गली का 
पगडंडी से गुज़रती हुयी कतारों सी  
जहाँ कई पदचिन्ह पीछा करती हुयी  
किसे जाना है और कितनी जल्दी 
रास्ते हैं खुली बाँहों की तरह बुलाती 
कई मुसाफिर हैं तरंगों को रोकती 
कभी इठलाती तो कभी बहलाती 
मंज़िल तू है भी कहीं या यूँ ही बहकाती 
मुसाफिर हूँ मंज़िल की तलाश में 
फिरती हूँ आजकल बेहकी -बेहकी !

~ फ़िज़ा 

मोहब्बत ही न होता तो मैं कहाँ होता?

मोहब्बत में मैं नहीं होता तो खुदा होता  मोहब्बत ही न होता तो मैं कहाँ होता? फ़िज़ा में दिन नहीं होता तो क्या होता?  दिन नहीं जब हो...